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गोवा में जेलीफिश का हमला, इसके बारे में ये 10 बातें आपको चौंका देंगी

aajtak.in
  • 25 नवंबर 2020,
  • अपडेटेड 1:51 PM IST
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पांच-छह दिन पहले गोवा के समंदर के किनारे छुट्टियां मना रहे लोग अचानक शिकार बनने लगे. दो दिनों में करीब 90 लोगों को एक समुद्री जीव ने डंक मारा. तत्काल इनका इलाज किया गया. इस जहरीली मछलियों की फोटो सोशल मीडिया पर वायरल भी हो रही थीं. जिस समुद्री जीव से लोग परेशान हुए वो है जेलीफिश (Jellyfish). आइए जानते हैं जेलीफिश के बारे में 10 फैक्ट्स जो आमतौर पर लोग नहीं जानते.

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सबसे जहरीले समुद्री जीवों में से एकः जेलीफिश सबसे जहरीले समुद्री जीवों में से एक होती हैं. लेकिन इनमें से एक प्रजाति बेहद खतरनाक है. इस प्रजाति की जेलीफिश ऑस्ट्रेलिया और इंडो-पैसिफिक समुद्र में मिलती है. ये चौकोर डिब्बे जैसे दिखते हैं. इन्हें बॉक्स जेलीफिश कहते हैं. इनके टेंटिकल्स यानी सूंड में जहरीले डार्ट होते हैं. ये डार्ट एक वयस्क इंसान को चंद मिनट में मार सकते हैं. या फिर दिल का दौरा दिला सकते हैं. 

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जेलीफिश के शरीर में सिर्फ पानी होता हैः जेलीफिश के शरीर में 95 फीसदी पानी ही होता है. ये ढांचागत प्रोटीन, मांसपेशियों और तंत्रिका तंत्र से बनी होती हैं. लेकिन ये सब मिलाकर इनके शरीर का सिर्फ 5 फीसदी हिस्सा ही बनता है. बाकी शरीर में 95% पानी होता है, जबकि इंसानों के शरीर में 60 फीसदी पानी होता है. 

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जानवरों के समूह का एक नाम होता, इनके समूह के कई नाम होते हैंः जैसे गायों और भेड़-बकरियों के समूह को झुंड या हर्ड कहा जाता है. लेकिन जेलीफिश के समूह के तीन नाम हैं. जेलीफिश के समूहों को ब्लूम, स्मैक या स्वार्म कहते हैं. 

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जेलीफिश से लगे घाव पर पेशाब करने से आराम नहीं मिलताः एक भ्रांति ये भी है कि अगर जेलीफिश का डंक लग जाए तो उस पर पेशाब करने से आराम मिलता है. लेकिन ऐसा नहीं है. मेयो क्लीनिक के अनुसार अगर आपको जेलीफिश काट ले या डंक मार दे तो सबसे पहले उसके डंक को संभालकर बाहर निकालें. उसके बाद गर्म पानी डाले. अगर डंक का असर ज्यादा हो और शख्स बेहोश होने लगे तो तुरंत उसे अस्पताल ले जाएं. 

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जेलीफिश मछली नहीं होतीः जेलीफिश के नाम में जरूर फिश लगा है लेकिन ये मछली नहीं होती. मछलियों के शरीर में हड्डियां होती हैं. वो पानी में रहने के लिए गिल्स का उपयोग करती हैं. जबकि, जेलीफिश बिना हड्डियों की जीव हैं. इनमें कोई रीढ़ की हड्डी नहीं होती. ये अपने मेंब्रेन के जरिए यानी त्वचा के जरिए ऑक्सीजन सोखती हैं. 

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2000 जेलीफिश ने अंतरिक्ष में पैदा किए 60 हजार जेलीफिशः साल 1991 में 2000 से ज्यादा जेलीफिश को अंतरिक्ष में भेजा गया था. ऐसा इसलिए किया गया था ताकि उनके ऊपर अंतरिक्ष में होने वाले असर का अध्ययन किया जा सके. वहां इन 2000 से ज्यादा जेलीफिश ने अंतरिक्ष में 60 हजार से ज्यादा जेलीफिश पैदा किए. लेकिन जब इन सभी जेलीफिश को धरती पर लाया गया तो अंतरिक्ष में पैदा हुई जेलीफिश धरती पर सही से काम नहीं कर पा रही थीं. 

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जेलीफिश की 25 प्रजातियां खाई भी जाती हैंः दुनियाभर में जेलीफिश की 25 प्रजातियां है जिनका उपयोग बतौर व्यंजन किया जाता है. इनकी सलाद, अचार बनता है. साथ ही उनका उपयोग नूडल्स के साथ ज्यादा होता है. लोग कहते हैं इनका व्यंजन बनाते समय नमक की जरूरत नहीं पड़ती क्योंकि ये खुद बहुत नमकीन होती हैं. 

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एक प्रजाति कभी मरती नहीं हैः दुनिया भर के वैज्ञानिकों का मानना है कि जेलीफिश की एक प्रजाति कभी मरती नहीं है. ये है टूरिटोपसिस डॉर्नी (Turritopsis dohrnii). इस प्रजाति की जेलीफिश जब बुजुर्ग हो जाती है तो समुद्र की सतह से चिपक जाती हैं. इसके बाद कुछ सालों में जेनेटिकली खुद को जीवित कर लेती हैं. फिर से युवा जेलीफिश बन जाती हैं. अगर इन्हें खाना नहीं मिलता या चोट लगती है तब भी ये अपने शरीर से दूसरी जेलीफिश पैदा कर देती हैं, जो एकदम क्लोन होता है. 

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50.5 करोड़ साल पुरानी जेलीफिशः जेलीफिश की हड्डियां नहीं होती. इसके बावजूद प्राचीन जेलीफिश के जीवाश्म मिले हैं. ये करीब 50.5 करोड़ साल पुराने जीवाश्म हैं जो ये बताते हैं कि ये डायनासोर के जमाने से ज्यादा समय से धरती पर मौजूद हैं. मतलब ये डायनासोर से भी पुराने जीव हैं जो धरती पर आजतक मौजूद हैं. 

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जेलीफिश चमकती भी हैंः कुछ जेलीफिश बायो-ल्यूमिनिसेंट होती हैं यानी ये रात में चमकती भी हैं. जेलीफिश हर समुद्र में मिलती हैं. ये समुद्र में मौजूद छोटे पौधे, श्रिंप और छोटी मछलियों को खाती हैं. छोटो जीवों को खाने के लिए ये पहले उन्हें डंक मारकर बेहोश करती हैं. 

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