लाइन ऑफ एक्चुअल कंट्रोल (एलएसी) पर भारत और चीन की सेना के बीच हिंसक झड़प हुई है. इस झड़प में एक भारतीय अधिकारी और दो जवान शहीद हो गए हैं. ये घटना तब हुई जब सोमवार रात को गलवान घाटी के पास दोनों देशों के बीच बातचीत के बाद सबकुछ सामान्य होने की स्थिति आगे बढ़ रह थी.
दरअसल, गलवान घाटी लद्दाख का क्षेत्र है. यहीं पर गलवान नदी भी बहती
है. 1962 के युद्ध में भी गलवान घाटी में भारत-चीनी सैनिकों के बीच टकराव
हुआ था. विवादित क्षेत्रों में टेंट लगाना पिछले कई वर्षों से चीन की सेना
पीपुल्स लिबरेशन आर्मी (पीएलए) की रणनीति का हिस्सा रहा है. जह यहीं पर
सेना ने ऐसा करने से रोका तो बीते दिनों भी झड़प हुई थी.
गलवान घाटी में चीनी इन्फ्रास्ट्रक्चर:
गलवान
नदी पूर्वी लद्दाख के उन क्षेत्रों में से एक है, जहां चीन को भारतीय ध्वज
दिखाने के लिए और क्षेत्र पर स्वामित्व सेना की चौकियों की स्थापना की गई
थी. इन चौकियों पर तैनात सैनिकों के हौसले और मजबूत इरादों से अलग हटकर
देखा जाए तो इन चौकियों पर मानवसंसाधन और फायरपावर को लेकर मजबूती की कमी
थी जो बेहतर चीनी सेनाओं को कोई सार्थक प्रतिरोध देने में सक्षम हों.
सैटैलाइट
तस्वीरों से पता चलता है कि 2016 तक, चीन ने गलवान घाटी के मध्य बिंदु तक
पक्की सड़क का निर्माण कर लिया था. यह माना जा सकता है कि मौजूदा समय में,
चीन इस सड़क को सेक्टर में एलएसी के पास स्थित किसी बिंदु तक बढ़ा चुका
होगा.
इसके अलावा, चीन ने नदी घाटी में छोटी-छोटी चौकियों का
निर्माण किया है, जो कि संभवत: चीनी सैनिकों के गश्त करने के लिए फॉरवर्ड
पोजीशन्स का काम करती हैं. सबसे बड़ा चीनी बेस हेविएटन में है, जो कि 48
किलोमीटर नॉर्थ-ईस्ट है.
ताजा विवाद भी इसी गलवान घाटी में हुआ है.
इससे पहले 5-6 मई को चीन के सैनिक लद्दाख के पैंगोंग त्सो झील के पास
भारतीय सैनिकों से भिड़े थे.इस घटना के बाद से भारत और चीन सीमा के उन
इलाकों में चौकसी और जवानों की संख्या बढ़ा दी गई है जहां अक्सर दोनों
देशों के जवानों में विवाद होता रहता है.
यह सब तब शुरू हुआ जब मई
महीने की शुरुआत से ही चीनी सैनिकों ने भारत द्वारा तय की गई LAC को पार कर
लिया था और पेंगोंग झील, गलवान घाटी के पास आ गए थे. चीन की ओर से यहां पर
करीब पांच हजार सैनिकों को तैनात किया गया था, इसके अलावा सैन्य सामान भी
इकट्ठा किया गया था.