भारत ने अफगानिस्तान को एकमात्र टेस्ट मैच में पारी और 300 रनों के विशाल अंतर से हराकर अपनी ताकत का शानदार प्रदर्शन किया. तीसरे दिन सोमवार को मुकाबला समाप्त हो गया. अफगानिस्तान पहली पारी में 152 रनों पर सिमट गया और फॉलोऑन मिलने के बाद उसी दिन दूसरी पारी में महज 112 रनों पर ढेर हो गया.
स्कोरकार्ड पर नजर डालें तो यह भारत की एकतरफा जीत की कहानी है. लेकिन इस बड़ी जीत के पीछे एक ऐसा सवाल छिपा है जो शायद मैच खत्म होने के बाद और ज्यादा बड़ा हो गया है.
सच कहें तो अच्छा हुआ कि यह टेस्ट मैच तीसरे दिन ही समाप्त हो गया. अगर यह मुकाबला चौथे और पांचवें दिन तक पहुंचता, तो शायद चर्चा भारत की जीत से ज्यादा मुल्लांपुर की झुलसाने वाली गर्मी की होती. जून के महीने में उत्तर भारत की गर्मी किसी परिचय की मोहताज नहीं है. तापमान 42 से 45 डिग्री सेल्सियस तक पहुंचना सामान्य बात है और कई बार इससे भी ऊपर चला जाता है. ऐसे मौसम में पांच दिन का टेस्ट मैच आयोजित करना समझदारी भरा फैसला था या नहीं, यह सवाल अब पूरी मजबूती से सामने खड़ा है.
टेस्ट क्रिकेट को खेल का सबसे कठिन प्रारूप कहा जाता है. यहां तकनीक, धैर्य, मानसिक मजबूती और फिटनेस की असली परीक्षा होती है. लेकिन मुल्लांपुर में हालात ऐसे थे कि क्रिकेट की परीक्षा से पहले खिलाड़ियों को मौसम की परीक्षा देनी पड़ रही थी.
विडंबना यह है कि खिलाड़ी अभी-अभी दो महीने लंबे आईपीएल सीजन से निकले थे. मार्च के अंत से मई के आखिर तक लगातार मैच, यात्रा, अभ्यास और मानसिक दबाव झेलने के बाद उन्हें सीधे टेस्ट क्रिकेट में उतरना पड़ा. यह वही प्रारूप है, जिसमें शरीर और दिमाग दोनों की सबसे ज्यादा मांग होती है. ऊपर से जून की भीषण गर्मी ने इस चुनौती को और कठिन बना दिया.
क्रिकेट में कठिन परिस्थितियां हमेशा खेल का हिस्सा रही हैं. इंग्लैंड में स्विंग, ऑस्ट्रेलिया में उछाल और उपमहाद्वीप में स्पिन. लेकिन मौसम की चुनौती और खिलाड़ियों की सुरक्षा के बीच एक संतुलन भी होना चाहिए. सवाल यह नहीं है कि खिलाड़ी गर्मी में खेल सकते हैं या नहीं.सवाल यह है कि जब बेहतर विकल्प मौजूद हों, तब उन्हें ऐसी परिस्थितियों में खेलने की जरूरत क्यों पड़े?
अगर बीसीसीआई जून में ही यह टेस्ट आयोजित करना चाहती थी, तो उसके सामने सिर्फ डे-नाइट टेस्ट का विकल्प ही नहीं था. सबसे हैरानी की बात यह है कि बेहतर वेन्यू भी मौजूद था. मुल्लांपुर से कुछ ही घंटों की दूरी पर स्थित धर्मशाला दुनिया के सबसे खूबसूरत और दर्शक-अनुकूल टेस्ट केंद्रों में गिना जाता है. जून के महीने में वहां का मौसम उत्तर भारत के मैदानी इलाकों की तुलना में कहीं अधिक सुहावना रहता है और खिलाड़ियों के लिए भी परिस्थितियां कहीं ज्यादा अनुकूल होतीं.
.... जब धर्मशाला जैसा विकल्प उपलब्ध था
ऐसे में सवाल उठना स्वाभाविक है कि जब धर्मशाला जैसा विकल्प उपलब्ध था, तो मैच को मुल्लांपुर की भीषण गर्मी में कराने की जरूरत क्या थी? खासकर तब, जब यह कोई निर्णायक या हाई-स्टेक्स मुकाबला भी नहीं था. यह टेस्ट विश्व टेस्ट चैम्पियनशिप (WTC) का हिस्सा नहीं था, यानी इसके नतीजे का चैम्पियनशिप तालिका पर कोई असर नहीं पड़ना था. ऐसे में मौसम और दर्शक अनुभव जैसे पहलुओं को प्राथमिकता दी जा सकती थी.
और अगर धर्मशाला किसी कारण उपलब्ध नहीं था, तो डे-नाइट टेस्ट का विकल्प भी मौजूद था. पिंक बॉल टेस्ट शाम और रात के अपेक्षाकृत ठंडे मौसम में खेला जा सकता था. इससे खिलाड़ियों को राहत मिलती, दर्शकों की संख्या बढ़ सकती थी और टेस्ट क्रिकेट को भी नया आकर्षण मिलता. दुनियाभर में क्रिकेट बोर्ड दर्शकों और खिलाड़ियों के अनुभव को बेहतर बनाने के लिए नए प्रयोग कर रहे हैं, लेकिन यहां ऐसा लगा जैसे मौसम को योजना बनाते समय प्राथमिकता ही नहीं दी गई.
दर्शकों की तस्वीर भी कम दिलचस्प नहीं थी. टेस्ट क्रिकेट पहले ही दर्शकों को स्टेडियम तक खींचने के लिए संघर्ष कर रहा है. ऐसे में जब मौसम ही सबसे बड़ा अवरोध बन जाए, तो उत्साह अपने आप कम हो जाता है.
लेकिन कैमरे का एंगल हकीकत नहीं बदल सकता
सच तो यह है कि इस तपती गर्मी में स्टेडियम तक पहुंचने का उत्साह भी दम तोड़ता नजर आया. मुल्लांपुर के स्टैंड्स में खाली सीटें उतनी ही चर्चा का विषय थीं, जितनी भारत की बल्लेबाजी. प्रसारण के दौरान कैमरे बार-बार उन चुनिंदा दर्शकों पर फोकस करते रहे जो मैदान में मौजूद थे, ताकि टीवी पर माहौल जीवंत दिखे. लेकिन कैमरे का एंगल हकीकत नहीं बदल सकता. जब मौसम ही दर्शकों का सबसे बड़ा प्रतिद्वंद्वी बन जाए, तो टेस्ट क्रिकेट का उत्सव अधूरा लगने लगता है.
और यहीं पर सबसे बड़ा सवाल खड़ा होता है. क्या मुल्लांपुर को भारत के नए टेस्ट सेंटर के रूप में स्थापित करने की जल्दबाजी में बीसीसीआई ने मौसम और परिस्थितियों जैसे बुनियादी पहलुओं को नजरअंदाज कर दिया? आखिर भारत में टेस्ट क्रिकेट के लिए वेन्यू की कोई कमी नहीं है. बेहतर विकल्प मौजूद थे. मैच का WTC पर भी कोई असर नहीं पड़ना था. ऐसे में मुल्लांपुर में जून के महीने में टेस्ट कराने का फैसला क्रिकेटीय जरूरत से ज्यादा एक प्रशासनिक संदेश जैसा लगता है...कि नए स्टेडियम को हर हाल में टेस्ट क्रिकेट के नक्शे पर स्थापित करना है.
इसमें कोई बुराई नहीं कि मुल्लांपुर को भविष्य का प्रमुख क्रिकेट केंद्र बनाया जाए. आखिर यह आधुनिक सुविधाओं वाला शानदार स्टेडियम है. लेकिन किसी वेन्यू की पहचान उसके उद्घाटन से नहीं, बल्कि वहां खेले गए मैचों के अनुभव से बनती है. अगर खिलाड़ियों, दर्शकों और प्रसारकों के लिए परिस्थितियां अनुकूल न हों, तो नया टेस्ट सेंटर बनाने की कवायद अपने उद्देश्य से भटक सकती है.
भारत ने मैच जीत लिया. लेकिन इस मैच के खत्म होने के बाद सबसे बड़ी चर्चा स्कोरकार्ड नहीं, बल्कि शेड्यूलिंग और योजना को लेकर है. क्योंकि टेस्ट क्रिकेट की असली लड़ाई बल्लेबाज और गेंदबाज के बीच होनी चाहिए, खिलाड़ियों और 45 डिग्री तापमान के बीच नहीं.
विश्व मोहन मिश्र