टीम इंडिया के मौजूदा अभियान में बहस का केंद्र लगभग पूरी तरह बल्लेबाजी बनी हुई है. पावरप्ले में स्ट्राइक रेट, स्पिन के खिलाफ अप्रोच, लेफ्ट-राइट संतुलन, आक्रामकता बनाम धैर्य- हर सवाल बल्ले के इर्द-गिर्द घूम रहा है. लेकिन इस शोर के बीच एक अहम मुद्दा अपेक्षाकृत शांत है- क्या गेंदबाजी उन निर्णायक ओवरों में उतनी प्रभावी रही है, जहां टी20 मैच हाथ से निकलते हैं?
टी20 क्रिकेट सिर्फ तेज शुरुआत या विस्फोटक फिनिश का खेल नहीं है. असली फर्क मिडिल ओवर्स और डेथ फेज में पड़ता है और यहीं भारत की कहानी थोड़ी जटिल नजर आती है.
आंकड़े क्या कहते हैं?
टी20 वर्ल्ड कप 2026 में टीम इंडिया के प्रमुख गेंदबाजों के आंकड़े इस प्रकार हैं -
वरुण चक्रवर्ती – 5 मैच, 10 विकेट, इकॉनमी 6.81
जसप्रीत बुमराह – 4 मैच, 7 विकेट, इकॉनमी 5.30
अक्षर पटेल – 3 मैच, 6 विकेट, इकॉनमी 6.63
हार्दिक पंड्या – 5 मैच, 5 विकेट, इकॉनमी 8.66
अर्शदीप सिंह – 4 मैच, 5 विकेट, इकॉनमी 7.42
शिवम दुबे – 3 पारियां, 4 विकेट, इकॉनमी 10.63
पहली नजर में विकेट कॉलम मजबूत दिखता है. वरुण और बुमराह ने नियमित ब्रेकथ्रू दिए हैं, अक्षर ने भी नियंत्रण दिखाया है. इसका मतलब साफ है- भारत विकेट लेने में पीछे नहीं.
लेकिन टी20 में सिर्फ विकेट पर्याप्त नहीं होते. रन नियंत्रण और लगातार दबाव बनाए रखना भी उतना ही अहम है.
मिडिल ओवर्स: दबाव बना या छूटा?
7 से 14 ओवर के बीच का चरण टी20 का रणनीतिक केंद्र होता है. यहां विपक्ष अक्सर पारी को स्थिर करता या गति पकड़ता है.
वरुण (6.81) और अक्षर (6.63) की इकॉनमी दर्शाती है कि स्पिन विभाग ने इस फेज में नियंत्रण रखा है. लेकिन टीम-स्तर पर 7+ इकॉनमी यह संकेत देती है कि दबाव हर मैच में समान नहीं रहा.
सुपर-8 के पहले मुकाबले में साउथ अफ्रीका के खिलाफ भारत ने 20 रन पर 3 विकेट लेकर शानदार शुरुआत की थी. लेकिन इसके बाद डेवाल्ड ब्रेविस और डेविड मिलर ने सिर्फ 51 गेंदों में 97 रन जोड़ दिए और मैच पूरी तरह जटिल हो गया. शुरुआती सफलता के बाद भी निरंतर दबाव बनाए रखना कितना जरूरी है, यह उदाहरण साफ दिखाता है.
डेथ ओवर्स: असली परीक्षा
टी20 का असली इम्तिहान आखिरी चार-पांच ओवरों में होता है. यहां यॉर्कर, वैरिएशन और सटीक निष्पादन की जरूरत होती है.
हार्दिक पंड्या (8.66 इकॉनमी) और शिवम दुबे (10.63) के आंकड़े यह दर्शाते हैं कि रन नियंत्रण पूरी तरह कसा हुआ नहीं रहा.
बुमराह (5.30) अपवाद हैं... लेकिन टी20 में डेथ ओवर की जिम्मेदारी सामूहिक होती है, एक गेंदबाज पूरे फेज का भार नहीं उठा सकता.
यहां बात 'रन लीक' के आरोप की नहीं, बल्कि अहम ओवरों में लगातार दबाव बनाए रखने की निरंतरता की है.
संतुलन का समीकरण
अगर टीम बल्लेबाजी मजबूत करने के लिए अतिरिक्त बैटर जोड़ती है, तो गेंदबाजी की गहराई प्रभावित हो सकती है. क्या छठा गेंदबाज पर्याप्त भरोसेमंद है? क्या ऑलराउंडर दोनों भूमिकाओं में प्रभावी योगदान दे पा रहा है?
टी20 में अक्सर फर्क 8-12 रन का होता है. अगर आप 180 बनाते हैं, लेकिन 190 दे देते हैं, तो बल्लेबाजी का श्रम व्यर्थ हो जाता है. भारत 170-180 के स्कोर तक पहुंच रहा है. असली सवाल यह है- क्या गेंदबाजी उस स्कोर को पर्याप्त बना पा रही है?
सुपर-8 की पहली हार ने मुश्किल बढ़ाई
टी20 वर्ल्ड कप 2026 के सुपर-8 में साउथ अफ्रीका के खिलाफ पहला मुकाबला गंवाकर टीम इंडिया मुश्किल में है. अब दो अलग-अलग समीकरण सामने हैं-
दोनों मैच जीतना- भारत को चार अंक मिलेंगे, जो सामान्यतः सेमीफाइनल के लिए पर्याप्त होते. लेकिन अगर साउथ अफ्रीका एक मैच जीतता है और वेस्टइंडीज vs जिम्बाब्वे का विजेता भी उसे हरा देता है, तो तीन टीमें चार अंकों पर आ सकती हैं और फैसला नेट रन रेट से होगा.
सिर्फ एक मैच जीतना- भारत को साउथ अफ्रीका के बाकी सभी मैच जीतने की जरूरत होगी. साथ ही उसकी एकमात्र जीत वेस्टइंडीज और जिम्बाब्वे के बीच के विजेता के खिलाफ होनी चाहिए. ऐसी स्थिति में नेट रन रेट निर्णायक होगा.
फिलहाल चर्चा बल्लेबाजी पर केंद्रित है, लेकिन आंकड़े बताते हैं कि गेंदबाजी के कुछ चरणों में निरंतरता की जरूरत है. भारत के पास विकेट लेने वाले गेंदबाज हैं, नियंत्रण की क्षमता भी है, लेकिन टी20 वर्ल्ड कप जैसे टूर्नामेंट में सफलता उन टीमों को मिलती है जो शुरुआती झटकों के बाद मैच को पूरी तरह बंद कर देती हैं और डेथ ओवर में रन नहीं बहने देतीं.
विश्व मोहन मिश्र