कातिल गेंदें, किंग और लेजेंड... क्रिकेट के 'ग्रीक गॉड' इमरान खान की कहानी

सुनील गावस्कर और कपिल देव समेत चौदह क्रिकेट लेजेंड्स ने पाकिस्तान सरकार से जेल में बंद इमरान खान के साथ अच्छा और इंसानी सुलूक करने की अपील की है. जिसमें कोई पाकिस्तानी खिलाड़ी शामिल नहीं है. हो सकता है कि जेन-Z और अल्फा को यह खबर उतनी कनेक्टेड न लगे. इसलिए, ये दास्तान उनके लिए ही है, क्योंकि राजनीति और जेल की कोठरी से बहुत पहले इमरान खान क्रिकेट मैदान पर मेन कैरेक्टर थे. और बाहर युवाओं, खासकर महिलाओं के चहेते.

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इमरान खान के मैदान के अंदर और बाहर दोनों तरफ सुर्खियां बटोरीं....(Photo, Getty) इमरान खान के मैदान के अंदर और बाहर दोनों तरफ सुर्खियां बटोरीं....(Photo, Getty)

संदीपन शर्मा

  • नई दिल्ली,
  • 19 फरवरी 2026,
  • अपडेटेड 2:35 PM IST

आइए, पुराने और नए क्रिकेट प्रेमियों, एक कहानी सुनिए. यह कहानी आपको थोड़ी अतिरंजित लगेगी. शायद आप हर बात पर यकीन न करें. लेकिन जो हुआ, वह सचमुच हुआ.

गेंदबाजी ऐसे करता था जैसे कोई पेशेवर शिकारी, जीता था किसी बादशाह की तरह, आकर्षण में किसी यूनानी देवता जैसा और जिद इतनी कि महज अपने इरादे के दम पर विश्व कप जीत ले. उसका नाम था-  इमरान खान.

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वह चाय पीते हुए जीत की भविष्यवाणी करता और मैदान में उसे सच कर दिखाता. उसने मर्दों, औरतों और पठानों, सबको अपना दीवाना बनाया. उन्होंने वसीम अकरम, वकार यूनिस और इंजमाम-उल-हक जैसे अनगढ़ पत्थरों को तराशकर हीरा बना दिया. वह सिर्फ कप्तान नहीं था, एक प्रभाव था.

वो जादुई कशिश

यह किस्सा इमरान के साथ अक्सर जुड़ने वाली एक अजीब बात से शुरू होता है. इसका श्रेय उनके साथी और ड्रेसिंग रूम के प्रतिद्वंद्वी जावेद मियांदाद को जाता है. मियांदाद ने शरारती अंदाज से कहा था, ’जब इमरान गेंद को अपनी ट्राउजर के आगे रगड़ते हैं, तो औरतें एक्साइटेड हो जाती हैं. और जब पीछे रगड़ते हैं तो पठान...’

इमरान खान: कातिल जैसी गेंदबाजी, किंग जैसी शान और ग्रीक गॉड जैसी मोहकता. (Photo, Getty)

सिर्फ मियांदाद ही ऐसा कह सकते थे और सिर्फ इमरान ही ऐसी बात के लिए प्रेरित कर सकते थे. यह एक वाक्य इमरान की उस जादुई शख्सियत को बयां करता है जिसने उन्हें अपनी पीढ़ी का सबसे आकर्षक क्रिकेटर बनाया. वह एक साथ सेक्स सिंबल भी थे और सबसे दमदार मर्द भी. वह जब कमरे में दाखिल होते थे, तो बिना कुछ बोले ही सबका ध्यान खींच लेते थे. उनके चर्चे लाहौर के बाजारों से लेकर लंदन के नाइट क्लबों तक एक जैसे ही होते थे.

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खूबसूरत शिकारी

मेरा पसंदीदा इमरान किस्सा 1982 का है. दिसंबर की एक सर्द सुबह, कराची में भारत एक टेस्ट बचाने की कोशिश कर रहा था. स्कोर 102 पर 1 था और क्रीज पर सुनील गावस्कर थे, जो उम्मीद का दूसरा नाम थे. दूसरे छोर पर दिलीप वेंगसरकर शानदार कवर ड्राइव लगा रहे थे.

उस समय हमारे शहर में टीवी नहीं था, बस रेडियो पाकिस्तान पर चिश्ती मुजाहिद की आवाज सुनाई दे रही थी. मुजाहिद की एक आदत थी, वह हर खिलाड़ी का पूरा नाम लेते थे. उन्होंने ऐलान किया, ’इमरान खान नियाजी गेंदबाजी के लिए वापस आए हैं. तीन स्लिप, गली और फॉरवर्ड शॉर्ट लेग. सुनील मनोहर गावस्कर सामना करेंगे.’ हर भारतीय प्रशंसक के दिल से एक दुआ निकली.

उस दौरे में  इमरान दहशत का पर्याय बन चुके थे. वह लहराते बालों और खूबसूरत चेहरे के साथ दौड़ते हुए आते, चीते की तरह छलांग लेते और आग उगलती गेंदें फेंकते. पहली ही गेंद गावस्कर के बल्ले के पास से तेजी से निकली. भारत की 'ग्रेट वॉल' को चेतावनी मिल चुकी थी. कुछ ही गेंदों बाद, इमरान ने बाहर गेंद फेंकी, गावस्कर डिफेंस के लिए पीछे हटे, पर गेंद सांप की तरह अंदर आई और स्टंप उड़ा गई.

आसिफ इकबाल ने कमेंट्री में कहा, ’बहुत ही आला गेंद थी. तेजी के साथ अंदर आई.’ पूरे भारत में सन्नाटा छा गया. तब भारतीय बल्लेबाजी का मतलब गावस्कर ही थे. उनके जाते ही हार का सिलसिला शुरू हो गया. इसके बाद जो हुआ वह तबाही थी. गुंडप्पा विश्वनाथ, मोहिंदर अमरनाथ, संदीप पाटिल और कपिल देव, सब धराशायी हो गए. इमरान ने पारी में 8 विकेट लिए और भारत पारी से हार गया. उस पूरे दौरे पर इमरान को खेलना नामुमकिन था. उन्होंने 6 टेस्ट में 40 विकेट लिए.

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मैदान के शिकारी... इमरान की आग उगलती गेंदें. (Photo, Getty)

कह के लूंगा

इमरान के पास वो 'जिगरा' था जो एक लड़ाकू में होता है. 'गैंग्स ऑफ वासेपुर' का गाना मशहूर होने से बहुत पहले, इमरान ने ’कह के लूंगा’ की कला में महारत हासिल कर ली थी. सुनील गावस्कर बताते हैं कि कैसे इमरान ने उन्हें 1986 में संन्यास लेने से रोका था. इमरान ने कहा था, ’हम 1987 में भारत आ रहे हैं और मैं तुम्हारी मौजूदगी में भारत को हराकर जीतना चाहता हूं.’

1982 में वापस चलते हैं. दौरे से एक महीने पहले, इमरान ने वो किया जो किसी पाकिस्तानी क्रिकेटर ने कभी नहीं किया था. वह एक ’निजी यात्रा’ पर भारत आए. कहा जाता है कि वह बॉम्बे में एक मशहूर बॉलीवुड अभिनेता के साथ रुके थे. उन्होंने दिल्ली और कलकत्ता में इंटरव्यू दिए और बड़ी शांति से कहा कि पाकिस्तान यह सीरीज बुरी तरह जीतेगा. उन्होंने यह बात बिना किसी घमंड के कही. मानो मौसम की भविष्यवाणी कर रहे हों.

जब सीरीज शुरू हुई, तो मैदान पर वही हुआ जो उन्होंने ड्राइंग रूम में कहा था. भारत तीनों टेस्ट हार गया. फिर 1987 में उन्होंने अपनी बात सच कर दिखाई. बैंगलोर के आखिरी टेस्ट में उन्होंने कड़े फैसले लिए, मियांदाद से ओपनिंग कराई और खुद 39 रन बनाकर भारत को मुश्किल लक्ष्य दिया. गावस्कर ने अपनी आखिरी पारी में 5 घंटे संघर्ष किया और 96 रन बनाए, पर अंत में इमरान की टीम ही जीती. उनके लिए जंग पहले दिमाग में जीती जाती थी, मैदान पर तो बस उसे पूरा करना होता था.

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महिलाओं की महक

इमरान सिर्फ बल्लेबाजों का शिकार नहीं करते थे. उनके बारे में कहा जाता था कि वह मैदान पर 'मेडन ओवर' फेंकते थे और मैदान के बाहर 'मेडन' (युवतियों) को अपना दीवाना बना लेते थे. वह इतने खूबसूरत थे कि देव आनंद उन्हें अपनी फिल्म में हीरो लेना चाहते थे. इमरान ने मना कर दिया, पर वह एक भारतीय साबुन का चेहरा बनने को तैयार हो गए.

भारत दौरे के समय होटल की लॉबी औरतों से भरी रहती थी जो सिर्फ उन्हें देखने आती थी. वसीम अकरम बताते हैं कि इमरान उन्हें लंदन के नाइट क्लब ले जाते, जहां वह सिर्फ एक गिलास दूध पीते और औरतें इमरान से हाथ मिलाने के लिए लाइन लगाती थीं. लंदन के 'ट्रैम्प' नाइट क्लब को उनका ’लिविंग रूम’ कहा जाता था, जहां मॉडल और रईस उनके इर्द-गिर्द घूमते थे. एक मॉडल ने कहा था, ’इमरान में एक ऐसी महक है जो औरतों को अपनी ओर खींचती है.’

इमरान खान: दुनियाभर की कई युवतियों को मंत्रमुग्ध कर दिया था. (Photo, Getty)

डॉलर्स की दीवानगी

औरतों के अलावा इमरान को पैसा की भी चाहत थी. 1977 में जब कैरी पैकर ने 'वर्ल्ड सीरीज क्रिकेट' शुरू की, तो इमरान और उनके कुछ साथियों ने इंग्लैंड के खिलाफ टेस्ट छोड़कर वहां जाने का फैसला किया. आसिफ इकबाल, जहीर अब्बास और मुश्ताक मोहम्मद ने भी खुद को पाकिस्तान के इंग्लैंड दौर के लिए अनुपलब्ध बता दिया. मैनेजमेंट नाराज था, लेकिन इमरान को कोई फर्क नहीं पड़ रहा था.

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वर्ल्ड सीरीज क्रिकेट ने फास्ट बॉलर्स को ग्लेडिएटर्स वाली पहचान दिलाई. वो डेनिस लिली, माइकल होल्डिंग, एंडी रॉबर्टस और इमरान को योद्धा की तरह प्रेजेंट कर रहे थे. अब वो सिर्फ स्पोर्टसपर्सन नहीं थे.

खेल चल रहा था रोशनी में नहाई रातों में. सफेद कपड़े रंगीन हो चुके थे. पर्सनालिटी के इर्द-गिर्द मार्केटिंग हो रही थी. यह एक ऐसा मंच था जहां इमरान एक मैग्नेट की तरह उभरे. पूरी कायनात उन्हें असाधारण बना रही थी.

उस दौर में इमरान ’बिग बॉयज प्ले एट नाइट’ वाली टी-शर्ट पहनकर एक अंतरराष्ट्रीय स्टार के रूप में उभरे. वह पैसा बांटने में भी पीछे नहीं रहते थे, हालांकि शुरुआत में वह अपनी जीत की रकम साझा करने में हिचकिचा रहे थे.

’बिग बॉयज प्ले एट नाइट’ वाली टी-शर्ट में इमरान....

हीरे की परख

महान कप्तान मैच जीतते हैं, पर बिरले कप्तान जेनरेशन बनाते हैं. इमरान ऐसे ही थे. उन्होंने वसीम अकरम को नेट पर देखा और तुरंत चुन लिया. वकार युनिस को उन्होंने टीवी पर एक लोकल मैच में गेंदबाजी करते देखा और अगले दिन नेट पर बुला लिया. इंजमाम को उन्होंने सिर्फ 5 मिनट नेट पर खेलते देखा और तय कर लिया कि वह 1992 वर्ल्ड कप खेलेंगे.

जख्मी शेर...

1992 तक कई लोगों ने उन्हें चुका हुआ मान लिया था. वह 39 साल के थे और कंधे की चोट से जूझ रहे थे. पाकिस्तान की टीम शुरुआती मैच हार रही थी. तब इमरान ने ड्रेसिंग रूम में अपनी टीम से कहा, ’एक घिरा हुआ शेर (Cornered Tiger) दुनिया का सबसे खतरनाक जानवर होता है.’

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इसके बाद जो हुआ वह इतिहास है. पाकिस्तान ने एक के बाद एक मैच जीते. इंजमाम ने सेमीफाइनल में न्यूजीलैंड को हरा दिया और फाइनल में वसीम अकरम ने जादुई गेंदबाजी की. इमरान ने अपनी आखिरी महान पारी में 72 रन बनाए. जब आखिरी गेंद फेंकी गई, तो वह एक विजेता के रूप में मैदान से बाहर निकले. उन्होंने पीछे एक महान मिसाल और एक खालीपन छोड़ दिया. प्रशंसक आज भी उन्हें याद करते हैं. औरतें और पठान भी.

..और ताकत बन गई कमजोरी

क्रिकेट के मैदान पर किस्मत ने उन्हें वो मुकाम दिया, जिसके वह हकदार थे. लेकिन जिंदगी में एक दूसरा चैप्टर उनका इंतजार कर रहा था, जिसे शायद किसी त्रासदी लिखने वाली कलम ने लिखा था. राजनीति में इमरान का जीवन विडंबना से भरा रहा. जो खूबियां और गुण उनकी पहचान थे, वही उनकी सबसे बड़ी कमजोरी (fatal flaws) बन गए.

वे उसी जोश, उसी न झुकने वाले अंदाज और पीछे न हटने के उसी जुनून के साथ राजनीति में आए. जहां दूसरे नेता बंद कमरों में सौदेबाजी करते थे, चुपचाप हार मान लेते थे और सुरक्षित निर्वासन में रहकर अगले मौके का इंतजार करते थे. इमरान अपनी जगह डटे रहे. कोई गुप्त बातचीत नहीं. लंदन या दुबई के लिए कोई आधी रात की उड़ान नहीं पकड़ी. वे पिच पर डटे रहे और सेना के नेतृत्व वाली सत्ता को खुद तक आने की चुनौती दी. और वे आए.

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पाकिस्तानी उपन्यासकार मोहम्मद हनीफ ने 'टाइम' पत्रिका में इस अंजाम को बड़ी बारीकी से लिखा है. उन्होंने बताया कि पाकिस्तान की सेना के पास उन प्रधानमंत्रियों से निपटने का एक तरीका (प्लेबुक) है जो अपने पद को गंभीरता से लेने लगते हैं. यही कारण है कि पाकिस्तान की राजनीति पर नजर रखने वालों को उम्मीद थी कि खान जेल पहुंचेंगे. ऐसा लगता था कि हर किसी को इसका अंदाजा पहले से था.

इमरान खान....अब उनके लिए 14 कप्तानों ने अपील की. (Photo, AP)

लेकिन इमरान ने गलत दांव खेल दिया. हनीफ लिखते हैं कि सेना से निपटने के लिए इमरान के पास एक योजना थी- ‘बस पाकिस्तान के चार बड़े शहरों में से प्रत्येक में 20,000 लोगों के बाहर निकलने की जरूरत है, और इन जनरलों को समझ नहीं आएगा कि क्या करना है.’

और यहीं सबसे बड़ी त्रासदी छिपी है. वह शख्स जो बाउंसर से कभी नहीं डरा, क्रीज पर तब भी खड़ा रहा जब बाकी सब चले गए. उसने अपने विरोधियों की हार की भविष्यवाणी की. जिसने एक देश को उठ खड़े होने के लिए कहा. वह अब यह सीख रहा है कि जनता, जब सही वक्त आता है, तो अक्सर वापस बैठ जाती है.

इसलिए, वे एक कोठरी में बैठे हैं, अकेले. एक आंख से उन्हें लगभग धुंधला सा दिखता है. मैच खत्म हो चुका है, स्टेडियम खामोश है, और अपने जीवन में पहली बार इमरान खान नियाजी उस भीड़ का इंतजार कर रहे हैं जो नहीं आ रही है. सियासत में उतरने के बाद इमरान हाथों में तस्वीर रखने लगे थे, आयत पढ़ते हुए जिसके एक एक मोती को आगे बढ़ाया जाता है. जेल की कोठरी में इमरान की बेबस अंगुलियां अब भी तस्वी पर होगी. कि कोई करिश्मा हो जाए. यही इमरान अपने प्राइम दौर में जब गेंद की सीम पर अपनी अंगुलियां रखते थे, उसे उनके इशारे पर स्विंग होना होता था.


(संदीपन शर्मा, हमारे अतिथि लेखक, क्रिकेट, सिनेमा, संगीत और राजनीति पर लिखना पसंद करते हैं. उनका मानना है कि ये सभी एक-दूसरे से गहराई से जुड़े हुए हैं.)

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