भारत और स्वीडन ने अंतरिक्ष क्षेत्र में नया समझौता किया है. 17 मई 2026 को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की स्वीडन यात्रा के दौरान गोथेनबर्ग में दोनों देशों के बीच यह समझौता हुआ. स्वीडन का Venusian Neutrals Analyzer नाम का यंत्र भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (ISRO) के शुक्रयान-1 मिशन के ऑर्बिटर पर सवार होगा. यह यंत्र शुक्र ग्रह के वायुमंडल और सूर्य के कणों के बीच होने वाले रिएक्शन की स्टडी करेगा.
शुक्रयान-1 भारत का पहला शुक्र मिशन है, जिसकी लॉन्चिंग मार्च 2028 में प्रस्तावित है. इस मिशन में कुल 19 वैज्ञानिक पेलोड लगाए जाएंगे, जिनमें कई देशों के यंत्र शामिल होंगे. मिशन की अवधि पांच साल होगी. इस दौरान वैज्ञानिक शुक्र ग्रह की सतह, उसके मोटे बादलों और सूर्य के साथ उसके संबंधों का स्टडी करेंगे. शुक्र पृथ्वी का सबसे निकटतम पड़ोसी ग्रह है, लेकिन उसकी सतह का तापमान 460 डिग्री सेल्सियस तक पहुंच जाता है. उसका वायुमंडल बेहद घना और जहरीला है.
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भारत और स्वीडन पहले भी 2008 में चंद्रयान-1 मिशन पर सफलतापूर्वक साथ काम कर चुके हैं. स्वीडन का Venusian Neutrals Analyzer यंत्र सौर कणों का पता लगाएगा और समझाएगा कि ये कण शुक्र के वायुमंडल को कैसे प्रभावित करते हैं. इस अध्ययन से वैज्ञानिकों को शुक्र ग्रह की जलवायु, उसके वायुमंडल के विकास और सौर मंडल के अन्य ग्रहों के बारे में बेहतर जानकारी मिल सकेगी.
शुक्रयान-1 का महत्व
शुक्रयान-1 मिशन भारत की बढ़ती वैश्विक अंतरिक्ष क्षमता को दर्शाता है. ISRO अब केवल चंद्रमा और मंगल तक सीमित नहीं है, बल्कि सौर मंडल के अन्य ग्रहों की ओर भी कदम बढ़ा रहा है. इस मिशन की सफलता भारत को अंतरराष्ट्रीय अंतरिक्ष सहयोग के नक्शे पर और मजबूती से स्थापित करेगी.
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कई देशों के 19 पेलोड के साथ यह मिशन वैश्विक सहयोग का बेहतरीन उदाहरण बनेगा. यह मिशन न सिर्फ वैज्ञानिक खोज के लिए महत्वपूर्ण है, बल्कि भारत की आत्मनिर्भरता और वैश्विक नेतृत्व की दिशा में भी एक बड़ा कदम है. मार्च 2028 में जब शुक्रयान-1 लॉन्च होगा, तो पूरी दुनिया इसकी ओर देखेगी.
आजतक साइंस डेस्क