78 देशों की आबादी के बराबर भारत में हर साल हो रहा बच्चों का जन्म!

केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय की हाल में आई रिपोर्ट बताती है कि भारत में 2021-22 में 2.03 करोड़ से ज्यादा बच्चों का जन्म हुआ. यानी, हर दिन औसतन 56 हजार से ज्यादा बच्चे पैदा हुए. दुनिया में इस समय सबसे ज्यादा तेजी से भारत की आबादी बढ़ रही है, जबकि चीन नें घटने लगी है. चीन में 2022 में 60 साल बाद आबादी घटी है. ऐसे में जानना जरूरी है कि बढ़ती आबादी कितनी चिंता की बात है?

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78 देशों की जितनी आबादी है, उतने बच्चे भारत में हर साल पैदा होते हैं. (फाइल फोटो-Getty Images) 78 देशों की जितनी आबादी है, उतने बच्चे भारत में हर साल पैदा होते हैं. (फाइल फोटो-Getty Images)

Priyank Dwivedi

  • नई दिल्ली,
  • 24 जनवरी 2023,
  • अपडेटेड 7:15 AM IST

दुनिया में सबसे ज्यादा आबादी वाला देश चीन है. लेकिन कुछ महीनों बाद भारत बन जाएगा. संयुक्त राष्ट्र ने पिछले साल अपनी रिपोर्ट में पहले ही दावा कर दिया था कि 2023 में भारत की आबादी चीन से ज्यादा होगी. हालांकि, कुछ रिपोर्ट्स में दावा किया जा रहा है कि भारत की आबादी चीन से ज्यादा हो चुकी है.

उसकी वजह क्या है? वजह है- भारत में सबसे ज्यादा बच्चों का पैदा होना. संयुक्त राष्ट्र का अनुमान है कि भारत में हर साल लगभग ढाई करोड़ बच्चों का जन्म होता है. वहीं, सबसे ज्यादा आबादी वाले चीन में भारत की तुलना में लगभग आधे बच्चे पैदा होते हैं. 2022 में चीन में 95 लाख बच्चों का जन्म हुआ था. 2021 की तुलना में ये लगभग 10 फीसदी की गिरावट थी.

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भारत के केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय की ताजा रिपोर्ट बताती है कि 2021-22 में सालभर में 2.03 करोड़ से ज्यादा बच्चों का जन्म हुआ. यानी, हर दिन औसतन 56 हजार बच्चे पैदा हुए. इससे पहले साल 2020-21 में दो करोड़ से कुछ ज्यादा बच्चों का जन्म हुआ था. इसका मतलब हुआ कि 2020-21 की तुलना में 2021-22 में 1.32 लाख ज्यादा बच्चों का जन्म हुआ. 

ये आंकड़ा इसलिए भी चौंकाता है क्योंकि अगर दुनिया के 78 देशों की आबादी को जोड़ दिया जाए तो ये संख्या दो करोड़ से कुछ ज्यादा ही बैठती है. इस लिहाज से कहा जा सकता है कि 78 देशों की आबादी के बराबर बच्चे तो भारत में हर साल पैदा हो रहे हैं.

भारत में हर साल 2 करोड़ से ज्यादा बच्चे पैदा होते हैं. (फाइल फोटो-Getty Images)

वहीं, चीन में अब आबादी घटने लगी है. चीन के सरकारी आंकड़ों के मुताबिक, 2022 में आबादी में साढ़े आठ लाख की कमी आई है. चीन के नेशनल ब्यूरो ऑफ स्टेटिक्स ने हाल ही में आबादी के आंकड़े जारी किए थे. इसके मुताबिक, 2022 के आखिर तक चीन की आबादी घटकर 1.4118 अरब पहुंच गई थी. जबकि, 2021 के आखिर तक चीन की आबादी 1.4126 अरब थी. 1961 के बाद ये पहली बार था जब चीन की आबादी में गिरावट आई. 

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भारत में आबादी बढ़ रही, चीन में घट रही... क्यों?

भारत में आबादी क्यों बढ़ रही है? इसके तीन बड़े कारण हैं. पहला- शिशु मृत्यु दर में गिरावट यानी एक साल से कम उम्र के बच्चों की मौत घट रही है. दूसरा- नवजात मृत्यु दर में कमी यानी 28 दिन की उम्र तक के बच्चों की मौत में कमी आ रही है. और तीसरा- अंडर-5 मोर्टेलिटी रेट कम होना यानी पांच साल से कम उम्र के बच्चों की मौतों की संख्या घट रही है.

केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय के हेल्थ मैनेजमेंट इन्फोर्मेशन सिस्टम (HMIS) की 2021-22 की रिपोर्ट बताती है कि भारत में शिशु मृत्यु दर, नवजात मृत्यु दर और अंडर-5 मोर्टेलिटी रेट में गिरावट आ रही है.

इस रिपोर्ट के मुताबिक, भारत में 2012 में शिशु मृत्यु दर हर एक हजार बच्चों पर 42 थी, जो 2020 में घटकर 28 पर आ गई. यानी, 2012 में पैदा होने वाले हर एक बच्चों में से 42 एक साल भी नहीं जी पाते थे.

इसी तरह प्रति हजार बच्चों पर नवजात मृत्यु दर भी 2012 में 29 थी जो अब घटकर 20 पर आ गई. वहीं, हर एक हजार बच्चों पर अंडर-5 मोर्टेलिटी भी 2012 में 52 थी, जो 2020 में घटकर 32 हो गई है. 

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दूसरी ओर चीन में जन्म दर कम हो रही है. चीन के सरकारी आंकड़े बताते हैं कि 2022 में देश में जन्म दर प्रति हजार लोगों पर 6.77 थी, जबकि 2021 में ये 7.52 थी. 1949 के बाद ये पहली बार था जब चीन में जन्म दर में गिरावट आई. 

अब जानिए पृथ्वी को कैसे नुकसान पहुंचा रहा इंसान?

- दुनिया पर इंसानों का बोझ लगातार बढ़ता जा रहा है. द वर्ल्ड काउंट के मुताबिक, अगर पृथ्वी के साढ़े चार अरब सालों को एक कैलेंडर ईयर समझ लिया तो जाए तो इंसान सिर्फ 37 मिनट के लिए ही यहां रहे हैं और मात्र 0.2 सेकंड में यहां के प्राकृतिक संसाधनों का एक तिहाई इस्तेमाल कर लिया है.

- आपको जानकर हैरानी होगी कि पृथ्वी पर जितने भी जीव हैं उसका एक फीसदी का भी एक फीसदी ही इंसान हैं. इसे ऐसे समझिए कि अगर 10 हजार जीव हैं तो उनमें से सिर्फ 1 इंसान है. लेकिन इंसान बहुत तेजी से प्राकृतिक संसाधनों का इस्तेमाल कर रहा है.

- द वर्ल्ड काउंट का अनुमान है कि जिस तेजी से जंगलों को काटा जा रहा है, अगर यही रफ्तार बरकरार रहती है तो अगले 100 साल में जंगल खत्म ही हो जाएंगे. इतना ही नहीं, सिर्फ 0.01% इंसानों ने ही जंगली जानवरों का 83 फीसदी और आधे पेड़-पौधों को खत्म कर दिया है. इसके अलावा, बीते 70 साल में इंसान इतना प्लास्टिक बना चुका है कि उससे पूरी पृथ्वी को ढंका जा सकता है.

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- 1971 में अमेरिकी केमिस्ट जी. टायरल मिलर ने एक स्टडी की थी. इस स्टडी में बताया था कि एक इंसान को जिंदा रहने के लिए सालभर में एक हजार टन घास की जरूरत पड़ती है. उन्होंने इस बात को ऐसे समझाया था कि एक इंसान सालभर में 300 मछलियां खाता है. ये 300 मछलियां 90 हजार मेंढक खातीं हैं. ये 90 हजार मेंढक 2.70 करोड़ टिड्डे खाते हैं. ये 2.70 करोड़ टिड्डे एक हजार टन घास खाते हैं.

स्टडी में सामने आया है कि इंसान तेजी से प्राकृतिक संसाधनों का दुरुपयोग कर रहे हैं. (फाइल फोटो-AP)

- एक स्टडी का अनुमान है कि इंसान सालभर में 250 अरब टन से ज्यादा केमिकल पदार्थों का उत्सर्जन करते हैं, जो न सिर्फ उनके लिए बल्कि पृथ्वी पर मौजूद सभी जीव-जंतुओं के लिए हानिकारक है.

- 2006 में दुनियाभर के वैज्ञानिकों ने एक स्टडी की थी. इस स्टडी में उन्होंने अनुमान लगाया था कि जिस तेजी से सीफूड की खपत बढ़ रही है, अगर यही ट्रेंड बरकरार रहता है तो 2048 तक समंदर में खाने लायक कुछ भी नहीं बचेगा. इतना ही नहीं, 2050 तक समंदर में मछलियों से ज्यादा प्लास्टिक रहेगा.

- जितनी तेजी से आबादी बढ़ रही है, उतनी ही तेजी से पानी भी खत्म हो रहा है. भारत को लेकर अनुमान है कि 2030 तक उपलब्ध पानी से दोगुनी मांग होगी. 2040 तक दुनियाभर में पानी का गंभीर सकट खड़ा हो सकता है. संयुक्त राष्ट्र ने अनुमान लगाया है कि 2050 तक दुनिया के 5 अरब लोगों के पास पीने का पानी नहीं रहेगा.

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- वैज्ञानिकों ने चेतावनी दी है कि जिस तेजी से इंसान पृथ्वी के प्राकृतिक संसाधनों का दुरुपयोग कर रहा है, उससे 2050 तक ऐसी स्थिति बन जाएगी जो 'दुनिया के अंत' की तरह होगी. समंदरों में मछलियां नहीं रहेंगी, जंगल नहीं बचेंगे जो कार्बन डाय ऑक्साइड का अवशोषण करते हैं, पीने के लिए साफ पानी नहीं मिलेगा, और प्रदूषण बेतहाशा बढ़ जाएगा.

2050 तक भारत की आबादी 166 करोड़ से ज्यादा होगी. (फाइल फोटो-PTI)

बढ़ती आबादी भारत का कितना टेंशन बढ़ाती है?

भारत की आबादी में कम से कम अगले तीन दशकों तक तो गिरावट का ट्रेंड नहीं है. संयुक्त राष्ट्र का अनुमान है कि 2050 तक भारत की आबादी बढ़कर 166 करोड़ से ज्यादा हो जाएगी. वहीं, चीन की आबादी घटकर 131 करोड़ तक पहुंच जाएगी.

भारत में जिस तेजी से आबादी बढ़ रही है, उससे आने वाले दिनों में गंभीर परेशानियां खड़ी होने का डर भी है. 2018 में नीति आयोग की रिपोर्ट आई थी. ये रिपोर्ट बताती है कि अभी भी 60 करोड़ भारतीय पानी के गंभीर संकट का सामना कर रहे हैं. यानी, इनके पास पीने का पर्याप्त पानी नहीं है. 

नीति आयोग का अनुमान है कि 2030 तक भारत में पानी की आपूर्ति से दोगुनी ज्यादा मांग होगी, जिस कारण लाखों लोग पानी के गंभीर संकट से जूझेंगे. इतना ही नहीं, 2030 तक 40 फीसदी भारतीयों के पास पीने का साफ पानी तक नहीं होगा.

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इतना ही नहीं, आबादी बढ़ने से खेती की जमीन भी कम पड़ रही है. वर्ल्ड बैंक के मुताबिक, 2001 में हर भारतीय के हिस्से में 0.15 हेक्टेयर खेती की जमीन थी, जो 2018 में घटकर 0.12 हेक्टेयर हो गई.

इसके अलावा, नौकरियों का संकट भी खड़ा हो सकता है. संयुक्त राष्ट्र का अनुमान है कि 2050 तक विकसित देशों में हर साल डेढ़ करोड़ युवा लेबर फोर्स में जुड़ जाएंगे. यानी, हर दिन 41 हजार से ज्यादा लोग ऐसे बढ़ जाएंगे जिन्हें नौकरी की जरूरत होगी. केंद्र सरकार के पीरियोडिक लेबर फोर्स सर्वे (PLFS) के मुताबिक, भारत में लेबर फोर्स तेजी से बढ़ रही है. 2017-18 में लेबर फोर्स में युवाओं की हिस्सेदारी 38 फीसदी थी जो 2020-21 में बढ़कर 41 फीसदी से ज्यादा हो गई.

बढ़ती आबादी की वजह से स्वास्थ्य सेवाओं पर भी बुरी तरह असर पड़ सकता है. 2019-20 के आर्थिक सर्वे में केंद्र सरकार ने माना था कि अगर आबादी ऐसी ही बढ़ती गई, तो आने वाले समय में अस्पतालों में बेड कम पड़ जाएंगे.

 

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