प्रशांत महासागर में मिला एलियन जैसा नीला ऑक्टोपस... 10 साल की स्टडी के बाद पता चली प्रजाति

प्रशांत महासागर में गैलापागोस द्वीपों के पास 1,800 मीटर गहराई में एक नया छोटा नीला ऑक्टोपस मिला है. मात्र 5 सेंटीमीटर लंबा यह कार्टून जैसा जीव नई प्रजाति का है.

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ये है वो नीला ऑक्टोपस जो प्रशांत महासागर में गहराई में मिला. (Photo: Charles Darwain Foundation/AFP) ये है वो नीला ऑक्टोपस जो प्रशांत महासागर में गहराई में मिला. (Photo: Charles Darwain Foundation/AFP)

आजतक साइंस डेस्क

  • नई दिल्ली,
  • 26 मई 2026,
  • अपडेटेड 7:44 PM IST

प्रशांत महासागर की गहराई में वैज्ञानिकों को एक अनोखी खोज हुई है. गैलापागोस द्वीप समूह के पास लगभग 1,800 मीटर की गहराई में एक बहुत छोटा नीला ऑक्टोपस मिला है, जो देखने में किसी कार्टून किरदार जैसा लगता है. यह एक नई प्रजाति है, जिसका नाम Microeledone galapagensis रखा गया है. यह खोज समुद्र की अनदेखी दुनिया की याद दिलाती है कि हमारे ग्रह का सबसे बड़ा हिस्सा अभी भी रहस्यों से भरा पड़ा है.

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एक सबमर्सिबल रोबोट गैलापागोस द्वीपों के पास गहरे पानी में उतारा गया था. रोबोट की कैमरा आंखों ने अंधेरे में एक छोटे से नीले जीव को देखा. यह मात्र 5 सेंटीमीटर लंबा था. शुरुआत में वैज्ञानिकों को लगा कि यह कोई जाना-पहचाना ऑक्टोपस हो सकता है, लेकिन बाद में डिटेल स्टडी में पता चला कि यह पूरी तरह नई प्रजाति है.

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उस अभियान के दौरान वैज्ञानिकों ने कई ऐसे ऑक्टोपस देखे, लेकिन सिर्फ एक को पकड़कर लाया गया. इस छोटे से जीव को प्रयोगशाला में ले जाकर टोमोग्राफी (CT स्कैन) तकनीक से जांचा गया. पारंपरिक तरीके से चीरा नहीं लगाया गया, बल्कि इसे बिना नुकसान पहुंचाए रखा गया. 

इस ड्रोन की खासियतें

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यह नया ऑक्टोपस बेहद छोटा और आकर्षक है. इसका नीला रंग गहरे समुद्र के अंधेरे में भी अलग दिखाई देता है. इसका शरीर नरम और लचीला है, जो इसे खतरों से बचने में मदद करता है. वैज्ञानिकों का कहना है कि यह ऑक्टोपस परिवार की नई ब्रांच है. 

गैलापागोस द्वीप समूह पहले से ही अपनी अनोखी जैव विविधता के लिए प्रसिद्ध है. चार्ल्स डार्विन ने यहीं से विकास के सिद्धांत की नींव रखी थी. अब इस क्षेत्र में मिला यह नया ऑक्टोपस समुद्र की गहराइयों में भी जीवन की विविधता को रेखांकित करता है.

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वैज्ञानिकों का मानना है कि पृथ्वी का सबसे बड़ा हिस्सा - यानी महासागर - आज भी सबसे कम खोजा गया क्षेत्र है. दुनिया के महासागरों की गहराइयों में 80 प्रतिशत से ज्यादा हिस्सा अभी तक अनछुआ पड़ा है. ऐसी गहराइयों में जहां सूर्य की रोशनी बिल्कुल नहीं पहुंचती, वहां भी जीवन मौजूद है. 

Microeledone galapagensis की खोज इसी बात का प्रमाण है. 2015 में हुई इस खोज को पूरी तरह समझने और वैज्ञानिक रूप से डिफाइन करने में कई साल लग गए. इससे पता चलता है कि गहरे समुद्र की प्रजातियों को समझने में कितनी चुनौतियां हैं.

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आधुनिक तकनीक की भूमिका

इस खोज में आधुनिक तकनीक ने अहम भूमिका निभाई. सबमर्सिबल रोबोट बिना किसी इंसान को जोखिम में डाले गहरे पानी तक पहुंच सका. टोमोग्राफी स्कैन से जीव के अंदर की स्टडी की गई. इससे वैज्ञानिकों को बिना जीव को नुकसान पहुंचाए महत्वपूर्ण जानकारी मिली. 

गैलापागोस द्वीप समूह यूनेस्को विश्व धरोहर स्थल है. यहां की जैव विविधता को बचाना बेहद जरूरी है. नई प्रजाति की खोज के साथ-साथ यह भी चेतावनी है कि जलवायु परिवर्तन, प्रदूषण और गहरे समुद्र में मानवीय गतिविधियां इन नाजुक ईकोसिस्टम को खतरे में डाल सकती हैं. वैज्ञानिकों का कहना है कि हमें समुद्र की गहराइयों का और अधिक स्टडी करनी चाहिए, ताकि हम न सिर्फ नई प्रजातियां खोज सकें, बल्कि उन्हें बचाने के उपाय भी कर सकें.

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