बिना देखे, सिर्फ छूकर ये जीव कर देता है मादा को प्रेग्नेंट, काम आते हैं 50 करोड़ न्यूरॉन्स

वैज्ञानिकों के एक नई स्टडी के अनुसार ऑक्टोपस प्रजनन के लिए देखने के बजाय अपनी सूंड का इस्तेमाल करते हैं. नर ऑक्टोपस की विशेष सूंड में हजारों सेंसरी कोशिकाएं होती हैं. यह सूंड मादा द्वारा छोड़े गए रासायनिक संकेतों को बिना देखे ही 'छूकर' पहचान लेती है. बिल्कुल सटीक रूप से मेटिंग करते हैं.

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नर और मादा ऑक्टोपस बिना देखे सिर्फ छूकर रिप्रोडक्शन करने की क्षमता होती है. (Photo: Getty) नर और मादा ऑक्टोपस बिना देखे सिर्फ छूकर रिप्रोडक्शन करने की क्षमता होती है. (Photo: Getty)

आजतक साइंस डेस्क

  • नई दिल्ली,
  • 25 अप्रैल 2026,
  • अपडेटेड 11:14 AM IST

मशहूर विज्ञान पत्रिका 'साइंस' में प्रकाशित एक रिसर्च में दिलचस्प बात सामने आई है कि ऑक्टोपस को मेटिंग (प्रजनन) के लिए आंखों या देखने की बिल्कुल भी जरूरत नहीं होती है. वे एक विशेष छूकर स्वाद लेने (Taste by Touch) वाली सिस्टम का इस्तेमाल करते हैं. 

जब एक नर और मादा ऑक्टोपस को एक अंधेरे टैंक में एक बैरियर के जरिए अलग रखा गया, तब भी नर ऑक्टोपस ने एक छोटे से छेद के जरिए अपना हाथ निकाला और मादा को ढूंढ लिया. इस दौरान दोनों ने एक-दूसरे को देखा तक नहीं, फिर भी नर ने मादा की सही जगह का पता लगा लिया और मेटिंग शुरू कर दी. 

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स्टडी के प्रमुख लेखक पाब्लो विलर का कहना है कि दोनों ने एक डिवाइडर के पार से ही मेटिंग कर ली, जो हमारे लिए यह साबित करने का सबसे सरल और साफ सबूत था कि वे बिना शरीर के सीधे संपर्क के, केवल रासायनिक संवेदनाओं (chemosensation) को महसूस करके एक-दूसरे को पहचान सकते हैं. प्रजनन कर सकते हैं.

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ऑक्टोपस की सूंड जो खुद महसूस करती हैं और फैसले लेती हैं

ऑक्टोपस की शारीरिक संरचना बहुत ही अद्भुत और जटिल होती है. उसकी हर सूंड पर मौजूद सक्शन कप में लगभग 10,000 सेंसरी कोशिकाएं होती हैं. सबसे खास बात यह है कि ऑक्टोपस के शरीर में पाए जाने वाले लगभग 50 करोड़ न्यूरॉन्स उसके दिमाग में केंद्रित होने के बजाय उसकी आठों भुजाओं में फैले होते हैं. 

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इसी वजह से उसकी हर सूंड काफी हद तक स्वतंत्र रूप से अपने आस-पास के माहौल को महसूस कर सकती है और अपने आप फैसले ले सकती है. नर ऑक्टोपस के पास प्रजनन के लिए एक विशेष भुजा होती है, जिसे 'हेक्टोकोटाइलस' कहा जाता है. मेटिंग के दौरान, यह विशेष हाथ स्पर्म के पैकेट को मादा के शरीर के सही हिस्से में बहुत ही सटीकता के साथ पहुंचाता है. 

यही हाथ मादा द्वारा छोड़े गए रासायनिक संकेतों को महसूस करने का काम भी करता है. पहले यह किसी को नहीं पता था कि यह सूंड एक संवेदी अंग भी है. यह वही तंत्र है जिसके जरिए ऑक्टोपस अपने साथी को पहचानते हैं. प्रजनन की प्रक्रिया को सफल बनाते हैं.

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एक अनपेक्षित खोज और उसका वैज्ञानिक परीक्षण

इस नई जानकारी की शुरुआत एक अजीब सी बात पर ध्यान देने से हुई थी. शोधकर्ताओं ने देखा कि नर ऑक्टोपस के प्रजनन वाले हाथ पर भी सामान्य हाथों की तरह ही बहुत सारे संवेदी रिसेप्टर्स मौजूद थे. यह बात हैरान करने वाली थी क्योंकि नर आमतौर पर इस हाथ का इस्तेमाल अपने आस-पास की चीजों को टटोलने के लिए नहीं करते हैं. इसे अपने शरीर के करीब मोड़ कर सुरक्षित रखते हैं. 

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यह हाथ आखिर क्या महसूस कर रहा है, यह समझने के लिए वैज्ञानिकों ने कई परीक्षणों का एक सेट तैयार किया. जब नर और मादा को बैरियर से अलग रखा गया, तो नर ने लगातार छेद से हाथ डालकर मादा को ढूंढ लिया. इसके बाद, जब मादा की जगह 'प्रोजेस्टेरोन' से लिपटी हुई प्लास्टिक की ट्यूब रखी गई, तब भी नर ने बिल्कुल वैसा ही व्यवहार किया और मेटिंग की कोशिश की. 

वहीं, बिना हार्मोन वाली ट्यूब के साथ उन्होंने ऐसा कोई व्यवहार नहीं किया. सबसे चौंकाने वाली बात तब सामने आई जब वैज्ञानिकों ने इस विशेष हाथ को ऑक्टोपस के शरीर से काटकर अलग कर दिया.

शरीर से कटने के बाद भी वह हाथ प्रोजेस्टेरोन हार्मोन के संपर्क में आते ही तेजी से हिलने लगा, मानो वह खुद किसी साथी की तलाश कर रहा हो. इससे यह पूरी तरह साबित हो गया कि चीजों को महसूस करने और प्रतिक्रिया देने का काम सिर्फ ऑक्टोपस का दिमाग नहीं करता, बल्कि उसका हाथ सिग्नल पहचान कर उस पर काम कर सकता है.

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इवोल्यूशन से जुड़ी एक महत्वपूर्ण व्यवस्था

अपने इस शोध के दौरान वैज्ञानिकों की टीम ने एक विशेष रिसेप्टर की पहचान की जिसे CRT1 कहा जाता है. यह रिसेप्टर प्रोजेस्टेरोन हार्मोन के प्रति प्रतिक्रिया देता है, जो एक बहुत ही प्राचीन हार्मोन है और इवोल्यूशन के दौरान कई जीवों में बना रहा है. हालांकि, अलग-अलग प्रजाति के ऑक्टोपस में ये रिसेप्टर्स समय के साथ थोड़े बदल गए हैं, जिससे संभवतः उन्हें अपनी ही प्रजाति के सही साथी को पहचानने में मदद मिलती है. 

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ऐसे जीवों के लिए यह सटीकता बहुत ज्यादा मायने रखती है जो अपने पूरे जीवन में बहुत कम ही एक-दूसरे से मिलते हैं और जिनके पास गलती करने की गुंजाइश न के बराबर होती है. वैज्ञानिक निकोलस बेलोना का मानना है कि खुले दिमाग से सोचने और जीव विज्ञान की विविधता को गहराई से समझने पर हमें कुछ बहुत ही बुनियादी और महत्वपूर्ण जानकारियां मिल सकती हैं.

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