Vastu in Islam: क्या मुसलमान वास्तु को मानते हैं? इस पढ़े-लिखे मुस्लिम आर्किटेक्ट ने बताया

पेशे से आर्किटेक्ट हाशिम अहमद ने कहा कि लोगों ने वास्तु या ऐसी किसी भी परंपरा को एक समुदाय या संप्रदाय से जोड़ दिया है. जबकि वास्तु को अगर आप सही तरीके से फॉलो करें तो यह आपके घर के लिए बहुत अच्छी चीज है. यह 100 फीसदी एक वैज्ञानिक प्रक्रिया है.

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वास्तु किसी धर्म विशेष से जुड़ा विषय नहीं है, बल्कि यह पूरी तरह वैज्ञानिक है: हाशिम अहमद (Photo: ITG) वास्तु किसी धर्म विशेष से जुड़ा विषय नहीं है, बल्कि यह पूरी तरह वैज्ञानिक है: हाशिम अहमद (Photo: ITG)

aajtak.in

  • नई दिल्ली,
  • 27 मई 2026,
  • अपडेटेड 8:41 PM IST

सनातन धर्म में वास्तु शास्त्र का विशेष महत्व बताया गया है. मान्यता है कि वास्तु में बताए नियम अपनाने से घर नकारात्मक ऊर्जा से मुक्त रहता है. हालांकि मौजूदा वक्त में इस विषय पर अलग-अलग समुदाय के लोग भी खुलकर अपनी राय रखने लगे हैं. हाल ही में आजतक रेडियो के शो 'प्रॉपर्टी से फायदा' में आर्किटेक्ट हाशिम अहमद ने इस्लाम में वास्तु की मान्यता को लेकर बातचीत की. उन्होंने कहा कि वास्तु किसी धर्म विशेष से जुड़ा विषय नहीं है, बल्कि यह पूरी तरह वैज्ञानिक और बेहतर जीवनशैली से संबंधित व्यवस्था है.

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हाशिम अहमद ने कहा कि लोगों ने वास्तु या ऐसी किसी भी परंपरा को एक समुदाय या संप्रदाय से जोड़ दिया है. जबकि ऐसा नहीं है. वास्तु को अगर आप सही तरीके से फॉलो करें तो यह आपके घर के लिए बहुत अच्छी चीज है. यह 100 फीसदी एक वैज्ञानिक प्रक्रिया है.

उन्होंने आगे कहा कि अंग्रेज किसी भी विषय की बहुत बारीकी से व्याख्या करते हैं. जब अंग्रेज भारत आए तो उन्होंने देखा कि यहां के घर नैचुरली ही वेंटिलेटेड रहते हैं. उनके यहां लोगों के घर एक दूसरे से बहुत सटे होते थे, क्योंकि वहां का तापमान बहुत कम है और मौसम ठंडा है. इसलिए वो वहां के हिसाब से चीजों को सहेजते थे. जब उन्होंने यहां की परंपरा देखी तो क्लाइमेटोलॉजी नाम का एक पूरा सब्जेक्ट लिख दिया. यह क्लाइमेटोलॉजी कुछ और नहीं, बल्कि वास्तु है. क्लाइमेटोलॉजी और वास्तु एक दूसरे से अलग नहीं है.

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नमाज और योग पर भी रखी राय
इस इंटरव्यू में हाशिम अहमद ने योग और नमाज को लेकर भी अपनी राय रखी. उनका मानना है कि लोग ने सिर्फ धार्मिक मान्यताओं के कारण ही योग और नमाज को अलग समझते हैं. जबकि नमाज अपने आप में ही पूरी योगा है. उन्होंने कहा कि यह सिर्फ मेरा मानना नहीं है बल्कि जो पांच वक्त का नमाजी ये बात नहीं मान रहा है, वो भी योगा कर रहा है.

उन्होंने बताया कि जब नमाज के वक्त एक मुसलमान कियाम, रकू या सजदा करता है तो वो अपने आप में एक आसन ही तो हैं. हालांकि अगर कोई इसे योग नहीं मान रहा है तो यह उसकी आस्था से जुड़ा मामला है. उन्होंने कहा कि इस्लाम में लोग सूर्य नमस्कार को धार्मिक कारणों से स्वीकार नहीं कर सकते, क्योंकि इसमें एक ही खुदा की इबादत करने की रवायत है. लेकिन यह कहना गलत नहीं होगा कि जो व्यक्ति नमाज पढ़ रहा है, वो वास्तव में योग ही कर रहा है.

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