जानिए, बिहार के सूर्य मंदिर के बारे में, जहां धूमधाम से लगता है छठ का मेला

बिहार के औरंगाबाद जिले में स्थित देव सूर्य मंदिर का अपना ही एक इतिहास है. छठ पर्व के दौरान इस मंदिर की खासियत और बढ़ जाती है.

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देव मंदिर और छठ का संबंध देव मंदिर और छठ का संबंध

aajtak.in

  • नई दिल्ली,
  • 31 अक्टूबर 2019,
  • अपडेटेड 1:17 PM IST

देश भर में भगवान सूर्य के कई प्रसिद्ध मंदिर है और सभी का अपना अलग महत्व है. बिहार के औरंगाबाद जिले में स्थित देव सूर्य मंदिर का अपना ही एक इतिहास है. छठ पर्व के दौरान इस मंदिर की खासियत और बढ़ जाती है. यहां हर साल सूर्य अचला सप्तमी को महोत्सव का भी आयोजन होता है. यहां छठ पर सूर्यकुंड तालाब का भी विशेष महत्व है.

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देव मंदिर और छठ का संबंध

कहा जाता है कि देवासुर संग्राम में जब असुरों के हाथों देवता हार गये थे, तब देव माता अदिति ने तेजस्वी पुत्र की प्राप्ति के लिए देवारण्य में छठी मैया की आराधना की थी. तब प्रसन्न होकर छठी मैया ने उन्हें सर्वगुण संपन्न तेजस्वी पुत्र होने का वरदान दिया था. इसके बाद अदिति के पुत्र त्रिदेव रूप आदित्य भगवान हुए, जिन्होंने असुरों पर देवताओं को विजय दिलायी. कहते हैं कि उसी समय से देव सेना षष्ठी देवी के नाम पर इस धाम का नाम देव हो गया और छठ का चलन भी शुरू हो गया.

देव सूर्य मंदिर में छठ करने का महत्व

इस मंदिर में छठ करने का अलग ही महत्व है. कहा जाता है कि यहां भगवान सूर्य तीन स्वरूपों में विराजमान हैं. पूरे देश में यही एकमात्र सूर्य मंदिर है जो पूर्वाभिमुख न होकर पश्चिमाभिमुख है. मंदिर के गर्भ गृह में भगवान सूर्य, ब्रह्मा, विष्णु और महेश के रूप में विराजमान हैं. गर्भगृह के मुख्य द्वार पर बाईं ओर भगवान सूर्य की प्रतिमा है और दायीं ओर भगवान शंकर के गोद में बैठी प्रतिमा है.

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ऐसी प्रतिमा सूर्य के अन्य मंदिरों में देखने को नहीं मिलती है. छठ पर्व के दौरान यहां भव्य मेला लगता है. हर साल पूरे देश से लाखों श्रद्धालु यहां छठ करने आते हैं. मान्यता है कि जो भक्त मन से इस मंदिर में भगवान सूर्य की पूजा करते हैं उनकी हर मनोकामना पूरी होती है. छठ के दौरान इस मंदिर के प्रति लोगों की आस्था और बढ़ जाती है.

मंदिर का निर्माण

मान्यता के अनुसार, इस मंदिर का निर्माण स्वयं भगवान विश्वकर्मा ने सिर्फ एक रात में किया था. इस मंदिर के बाहर पाली लिपि में लिखित अभिलेख से पता चलता कि इस मंदिर का निर्माण आठवीं-नौवीं सदी के बीच हुआ था. इसकी शिल्प कला में नागर, द्रविड़ और बेसर तीनों शैलियों का मिश्रण दिखाई देता है. मंदिर का शिल्प उड़ीसा के कोणार्क सूर्य मंदिर से मिलता है.

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