Parama Ekadashi 2026: सभी एकादशियों में परमा एकादशी बहुत ही महत्वपू्र्ण मानी जाती है. इस एकादशी को भीमसेनी एकादशी और पुरुषोत्तमी एकादशी के नाम से भी जाना जाता है. यह एकादशी 3 साल में एक बार आती है, जो कि सिर्फ अधिकमास में पड़ती है. यह व्रत बहुत ही शुभ माना गया है. इस दिन भगवान विष्णु की पूजा धूप, दीप, फूल और भोग आदि से करनी चाहिए. जो व्यक्ति श्रद्धा से यह व्रत करता है, उसके पाप, दुख और दरिद्रता दूर होने लगती है. इसके अलावा, पद्म पुराण के उत्तरकांड में भी इस एकादशी का जिक्र मिलता है, जहां भगवान श्रीकृष्ण धर्मराज युधिष्ठिर को इस एकादशी का महत्व समझा रहे हैं. माना जाता है कि इस दिन श्रीहरि की कथा पढ़ना भी शुभ माना जाता है. आइए जानते हैं कथा के बारे में.
परमा एकादशी की कथा
प्राचीन समय में काम्पिल्य नाम की नगरी में सुमेधा नाम का एक ब्राह्मण रहता था. वह बहुत ही धार्मिक और सज्जन था, लेकिन किसी कारणवश वह और उसकी पत्नी बहुत गरीब थे. उनकी स्थिति इतनी खराब थी कि कई बार उन्हें भोजन तक नहीं मिल पाता था. सुमेधा की पत्नी बहुत पतिव्रता और सहनशील थी. वह खुद भूखी रहकर भी अतिथि को भोजन करा देती थी और कभी अपने पति से कोई शिकायत नहीं करती थी.
एक दिन सुमेधा ने दुखी होकर अपनी पत्नी से कहा कि वह दूसरे स्थान पर जाकर धन कमाना चाहता है, क्योंकि बिना धन के घर चलाना कठिन हो रहा है. पत्नी ने विनम्रता से उत्तर दिया कि, 'हे स्वामी, जो भाग्य में लिखा होता है, वही मिलता है. यदि भाग्य में धन होगा तो यहीं मिलेगा, और अगर नहीं है तो कहीं जाकर भी नहीं मिलेगा. मैं आपसे दूर नहीं रह सकती, इसलिए आप यहीं रहकर धैर्य रखें.'
पत्नी की बात मानकर सुमेधा ने बाहर जाने का विचार छोड़ दिया. कुछ समय बाद वहां कौण्डिन्य ऋषि आए. ब्राह्मण दंपत्ति ने उनका आदर-सत्कार किया और भोजन कराया. भोजन के बाद ब्राह्मण की पत्नी ने ऋषि से विनती की कि वे उनकी गरीबी दूर करने का कोई उपाय बताएं.
ऋषि ने कहा, ''अधिक मास की कृष्ण पक्ष की परम एकादशी का व्रत करो. यह व्रत बहुत फलदायी है. इससे सभी दुख और दरिद्रता दूर हो जाते हैं. इस दिन रात भर जागरण करना चाहिए और भगवान का भजन करना चाहिए.''
उन्होंने आगे बताया कि भगवान शिव की कृपा से कुबेर इसी व्रत के प्रभाव से धन के स्वामी बने थे. राजा हरिश्चंद्र को भी इस व्रत के कारण अपना खोया हुआ सब कुछ वापस मिला था. ऋषि ने पंचरात्रि व्रत के बारे में भी बताया, जिसमें पांच दिनों तक नियमपूर्वक व्रत किया जाता है. कोई निर्जल व्रत करता है, कोई एक समय भोजन करता है, और कोई ब्राह्मणों को भोजन कराता है, इन सबका बहुत पुण्य मिलता है.
ऋषि की बात मानकर सुमेधा और उसकी पत्नी ने पूरी श्रद्धा से परम एकादशी का व्रत किया. व्रत पूरा होने के बाद उनके जीवन में चमत्कारिक बदलाव आया. एक दिन एक राजकुमार उनके घर आया और उन्हें रहने के लिए सुंदर घर दिया. साथ ही आजीविका के लिए एक गांव भी दे दिया.
इस तरह उस व्रत के प्रभाव से उनकी गरीबी खत्म हो गई और वे सुख-समृद्धि से जीवन बिताने लगे. अंत में उन्हें स्वर्ग की प्राप्ति हुई. भगवान श्रीकृष्ण ने कहा कि जो व्यक्ति परम एकादशी का व्रत करता है, उसे अनेक यज्ञों और तीर्थों के बराबर फल मिलता है. अधिक मास बहुत पवित्र होता है और इस समय किए गए व्रत विशेष फल देते हैं. इसलिए हर व्यक्ति को अपनी क्षमता के अनुसार इस व्रत को अवश्य करना चाहिए, ताकि जीवन में सुख, शांति और समृद्धि बनी रहे.
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