Tulsi Vivah: तुलसी माता को किसने दिया था श्राप, जानें गणेश भगवान क्यों हुए थे नाराज

Tulsi Vivah: गणेश जी को तुलसी न चढ़ाने के पीछे एक पौराणिक कथा मिलती है. इस कथा के अनुसार माता तुलसी और गणेश जी ने एक-दूसरे को श्राप दिया था. तो चलिए जानते हैं इसके पीछे की वह कथा

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तुलसी विवाह 2025 ( ITG) तुलसी विवाह 2025 ( ITG)

aajtak.in

  • नई दिल्ली,
  • 26 अक्टूबर 2025,
  • अपडेटेड 12:43 PM IST

2 नवंबर को तुलसी विवाह का त्योहार मनाया जाएगा. धार्मिक मान्यता के अनुसार, इस दिन भगवान विष्णु चार महीने की योगनिद्रा से जागते हैं. इन चार महीनों को चातुर्मास कहा जाता है. भगवान विष्णु के जागने के बाद ही हिंदू धर्म में शुभ कार्यों का प्रारंभ होता है. इसी दिन तुलसी विवाह का आयोजन किया जाता है. हिंदू धर्म में तुलसी को पूजनीय और दिव्य माना जाता है. हालांकि, एक रोचक और विशेष तथ्य यह है कि गणेश जी की पूजा में तुलसी का उपयोग कभी नहीं किया जाता. ऐसा क्यों है, इसके पीछे एक पौराणिक कथा है. जानते हैं उसके बारे में. 

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भगवान गणेश से विवाह करना चाहती थी तुलसी

कहा जाता है कि तुलसी माता भगवान गणेश से प्रेम करती थीं और उनसे विवाह करना चाहती थीं. कथा के अनुसार, एक दिन तुलसी माता ने अपने हृदय की इच्छा व्यक्त करने का निर्णय लिया और सीधे गणेश जी के पास गईं. उन्होंने विनम्रता से गणेश जी से अपने मन की बात कही और उनसे विवाह करने की इच्छा व्यक्त की. लेकिन गणेश जी ने उनके विवाह प्रस्ताव को अस्वीकार कर दिया. यह अस्वीकार तुलसी माता के लिए बहुत दुःखद और अपमानजनक था. उनकी भक्ति और प्रेम के बावजूद, गणेश जी ने इसे संभव नहीं माना. इसके फलस्वरूप, तुलसी माता क्रोधित हो गईं और उन्होंने गणेश जी को श्राप दे दिया कि तुम्हारी दो शादियां होंगी. 

गणेश जी हुए थे क्रोधित

इस श्राप के प्रभाव से ही भगवान गणेश का विवाह रिद्धि और सिद्धि नामक दो दिव्य बहनों से हुआ. तुलसी के श्राप देने के कारण गणेश जी भी क्रोधित हो गए.उन्होंने भी तुलसी को श्राप दे दिया. श्राप देते हुए गणेश जी ने कहा कि तुम्हारा विवाह एक राक्षस से होगा. इसी श्राप के चलते तुलसी का विवाह राक्षस कुल में दानव राज जलंधर से हुआ. 

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तुलसी माता को हुआ गलती का एहसास

कथा के अनुसार, जब तुलसी माता ने गणेश जी को श्राप दे दिया, तब उन्हें अपनी गलती का एहसास हुआ. अपनी भूल का अहसास होते ही तुलसी माता ने गणेश जी से क्षमा याचना की, और अपने कृत्य के लिए माफी मांगी. गणेश जी ने उनकी प्रार्थना को सुना और कहा कि कालांतर में तुलसी माता एक पौधे का रूप धारण करेंगी, जिसे पूजा और सम्मान दिया जाएगा. इस पौधे का नाम तुलसी रखा गया, और इसे धार्मिक अनुष्ठानों और आध्यात्मिक शुद्धि का प्रतीक माना जाने लगा. लेकिन साथ ही गणेश जी ने यह भी स्पष्ट किया कि मेरी पूजा में तुलसी का उपयोग नहीं किया जाएगा. यही कारण है कि आज भी गणेश जी की पूजा में तुलसी चढ़ाने की परंपरा नहीं है. 

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