Muharram 2026: इतिहास के पन्नों में बहुत सी लड़ाइयां दर्ज हैं, लेकिन कर्बला की जंग किसी ज़मीन के टुकड़े के लिए नहीं, बल्कि जमीर को बचाने के लिए लड़ी गई थी. यह कहानी है मोहम्मद (स.अ.व.) के उस नवासे की, जिसने जुल्म के सामने झुकने के बजाय अपनी जान देना बेहतर समझा. आज 1346 साल बाद भी कर्बला का नाम आते ही हर आंख नम हो जाती है.
सत्ता का खेल और एक गलत परंपरा
इस्लाम के शुरुआती दौर में नेता (खलीफा) का चुनाव आपसी मशवरे और सहमति (शूरा) से होता था. लेकिन मुआविया नाम के शासक ने इस नियम को बदलकर अपने बेटे यजीद को उत्तराधिकारी घोषित कर दिया. यजीद का स्वभाव और उसका रहन-सहन हजरत मोहम्मद (स.अ.व.) की शिक्षाओं के बिल्कुल विपरीत था. उसने सत्ता के दम पर लोगों को डरा-धमकाकर अपनी बात मनवाना शुरू कर दिया था.
इमाम हुसैन (अ.स.) का अडिग फैसला
नबी के नवासे इमाम हुसैन (अ.स.) एक बेहद नेक और सम्मानित इंसान थे. उन्होंने यजीद की सत्ता को मानने से साफ इनकार कर दिया. इमाम ने स्पष्ट किया कि मैं ऐसे इंसान की हुकूमत को स्वीकार नहीं कर सकता जो इस्लाम के बुनियादी उसूलों को ही बदल रहा है. इमाम के लिए यह कोई राजनीतिक झगड़ा नहीं था, बल्कि यह सच और गलत के बीच का एक धर्मयुद्ध था, जहां चुप रहना भी गुनाह था.
कूफा का निमंत्रण और धोखा
इराक के कूफा शहर के लोगों ने इमाम हुसैन को पत्र लिखकर बुलाया था कि वे आकर उनका नेतृत्व करें और यजीद के अत्याचारों को खत्म करें. इमाम अपने परिवार और 72 वफादार साथियों के साथ वहां के लिए निकल पड़े. लेकिन, इमाम के पहुंचने से पहले ही यजीद ने अपने एक क्रूर अफसर, उबैदुल्लाह इब्न ज़ियाद को वहां भेजकर लोगों में खौफ पैदा कर दिया था. जिन लोगों ने इमाम को आने का निमंत्रण दिया था, वे यजीद की सत्ता के डर से अचानक उनके खिलाफ हो गए.
कर्बला
जब इमाम हुसैन कर्बला के तपते मैदान में पहुंचे, तो यजीद की एक विशाल फौज ने उन्हें घेर लिया. यजीद की फौज ने इमाम के परिवार और मासूम बच्चों के लिए फरात नदी का पानी तक बंद कर दिया. तपती रेगिस्तानी गर्मी में बच्चे प्यास से तड़प रहे थे.
शहादत का दिन (आशूरा): 10 मुहर्रम को इमाम और उनके 72 साथियों ने जुल्म के आगे घुटने टेकने के बजाय अपनी कुर्बानी देना चुना. इस लड़ाई में इमाम के जवान बेटे, उनके भाई और यहां तक कि उनका 6 महीने का मासूम बच्चा भी शहीद हो गया.
शहादत का अंतिम मंजर
10 मुहर्रम का दिन ढल रहा था. इमाम हुसैन (अ.स.) के सभी साथी और परिवार के सदस्य एक-एक करके शहीद हो चुके थे. रेगिस्तान की तपती रेत पर चारों तरफ लाशें बिछी थीं. अंत में, इमाम हुसैन (अ.स.) अकेले बचे थे. वे जानते थे कि अब इस जुल्म का अंत उनकी शहादत से ही होगा.
इतिहास के सबसे काले पन्ने में लिखा है कि उस वक्त भी वे अपनी नमाज़ में मसरूफ थे. तभी शिमर इब्न दिल-जशन (यजीद की फौज का कमांडर) आगे बढ़ा. उसने न केवल इमाम हुसैन (अ.स.) पर हमला किया, बल्कि मोहम्मद (स.अ.व.) के उस नवासे का सिर तन से जुदा कर दिया, जिन्हें हजरत मोहम्मद (स.अ.व.) अपने कंधे पर बिठाकर प्यार किया करते थे.
इमाम हुसैन (अ.स.) ने अपनी शहादत के जरिए यह साबित कर दिया कि जब सत्ता अहंकार में डूबी हो और न्याय का गला घोंटा जा रहा हो, तब खामोश रहना सबसे बड़ा अपराध है. उनकी कुर्बानी हमें सिखाती है कि वक्त बदलता है, बादशाह आते-जाते हैं, लेकिन जो लोग इंसानियत के लिए मर मिटते हैं, वे कभी नहीं मरते.
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