Quote of the day by Matshona Dhliwayo: जब परिस्थितियां हों खिलाफ, तो क्या करना चाहिए?

Quote of the day by Matshona Dhliwayo: जब सब कुछ आपके खिलाफ हो, तो हार न मानें. मात्शोना ध्लीवायो का जीवन दर्शन समझाता है कि जहाज की तरह हमें भी धारा के विपरीत चलकर ही मंज़िल मिलती है.

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अगर जहाज हमेशा धारा के साथ ही चलता रहेगा, तो वह कभी भी अपनी शक्ति का पूरा इस्तेमाल नहीं सीख पाएगा. अगर जहाज हमेशा धारा के साथ ही चलता रहेगा, तो वह कभी भी अपनी शक्ति का पूरा इस्तेमाल नहीं सीख पाएगा.

aajtak.in

  • नई दिल्ली,
  • 05 जून 2026,
  • अपडेटेड 8:20 AM IST

Quote Of the Day: जब सब कुछ आपके खिलाफ लग रहा हो, तो याद रखें, कभी-कभी जहाज को धारा के साथ नहीं, बल्कि उसके विपरीत दिशा में चलना पड़ता है.”― मात्शोना ध्लीवायो

मात्शोना ध्लीवायो का यह विचार हमें जीवन में मुश्किल हालातों का सामना करने की हिम्मत देता है.  जब हमें लगता है कि सब कुछ हमारे खिलाफ है, तो अक्सर हम हार मान लेते हैं. लेकिन ध्लीवायो का यह विचार हमें याद दिलाता है कि विकास और प्रगति आसान रास्तों पर चलने से नहीं, बल्कि चुनौतियों को स्वीकार करने से मिलती है. जिस तरह एक जहाज को अपनी दिशा बदलने या अपने गंतव्य तक पहुंचने के लिए कभी-कभी लहरों के विरुद्ध जाना पड़ता है, उसी तरह जीवन में भी विपरीत समय हमारे संकल्प की परीक्षा लेता है.

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प्रतिकूल परिस्थितियां न केवल हमारी सहनशक्ति को बढ़ाती हैं, बल्कि हमें उन कौशलों को विकसित करने के लिए मजबूर करती हैं जिनकी हमें सामान्य समय में जरूरत नहीं होती. जब हम धारा के विपरीत तैरते हैं, तो हम खुद को ज्यादा मजबूत और ज्यादा सक्षम बनाते हैं. अगर जहाज हमेशा धारा के साथ ही चलता रहेगा, तो वह कभी भी अपनी शक्ति का पूरा इस्तेमाल नहीं सीख पाएगा. इसी तरह, यदि हम केवल सरल रास्तों को चुनेंगे, तो हम कभी भी अपनी वास्तविक क्षमता को नहीं पहचान पाएंगे. 

दृष्टिकोण में परिवर्तन
यह विचार हमें यह सिखाता है कि सब कुछ खिलाफ होना वास्तव में एक गलत नजरिया हो सकता है. यह एक संकेत है कि हम कुछ नया करने या अपनी सीमाओं को तोड़ने के करीब हैं. हार मानने के बजाय, हमें अपनी दिशा को साफ रखना चाहिए और विपरीत परिस्थितियों को अपने चरित्र निर्माण का हिस्सा मानना चाहिए.  सफलता केवल उन लोगों को नहीं मिलती जो बिना किसी रुकावट के चलते हैं, बल्कि उन्हें मिलती है जो हर रुकावट को एक सीढ़ी बना लेते हैं. अंत में, विपरीत परिस्थितियों के प्रति हमारा दृष्टिकोण ही यह तय करता है कि हम जहाज की तरह रुक जाएंगे या अपनी मंज़िल तक पहुंचकर ही दम लेंगे. 

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