संन्यास, दबाव या रणनीति... नीतीश कुमार के राज्यसभा जाने के फैसले से उठ रहे हैं 5 सवाल

बिहार की राजनीति में नीतीश कुमार का दौर समापन की ओर है. नीतीश कुमार ने सोशल मीडिया पर खुद ही अपना आगे का इरादा शेयर किया है. बिहार की राजनीति आगे किसी दिशा में जाएगी, ऐसे सवालों का जवाब नहीं मिला है - और काफी हद तक नीतीश कुमार ने ही ऐसी स्थिति ला दी है.

Advertisement
नीतीश कुमार ने बिहार के मुख्यमंत्री की कुर्सी छोड़ने का ऐलान कर दिया है. (Photo: PTI) नीतीश कुमार ने बिहार के मुख्यमंत्री की कुर्सी छोड़ने का ऐलान कर दिया है. (Photo: PTI)

मृगांक शेखर

  • नई दिल्ली,
  • 05 मार्च 2026,
  • अपडेटेड 1:17 PM IST

बिहार में नई सरकार बनने का रास्ता साफ हो गया है. मुख्यमंत्री नीतीश कुमार का ताजा बयान तो यही कह रहा है. नीतीश कुमार ने अपने बयान से बिहार की राजनीतिक तस्वीर कुछ हद तक स्पष्ट जरूर कर दी है, लेकिन लगे हाथ बहुत कुछ उलझा भी दिया है.

नीतीश कुमार ने सोशल मीडिया के जरिए जो कुछ कहा है, वह सक्रिय राजनीति से संन्यास तो नहीं, लेकिन मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा जैसा तो है ही. नीतीश कुमार ने अपनी इच्छा के बारे में तो बता दिया है, लेकिन बेटे निशांत कुमार की राजनीतिक एंट्री पर कुछ नहीं कहा है. वैसे ही यह भी नहीं बताया है कि जेडीयू की क्या भूमिका रहेगी?

Advertisement

अब तक सबसे बड़ी चर्चा यही रही कि नीतीश कुमार कभी किसी के दबाव में नहीं आते हैं. लेकिन नीतीश कुमार ने जिस तरह नया कदम बढ़ाया है, उससे ऐसे दावों की भी हवा निकल गई है.

1. नीतीश कुमार के बयान को कैसे समझा जाए?

बिहार में राज्यसभा चुनाव के लिए नामांकन का समय पहले 11 से साढ़े ग्यारह के बीच माना जा रहा था. फिर बीजेपी की तरफ से बताया गया कि केंद्रीय मंत्री अमित शाह करीब 12 बजे पटना पहुंच रहे हैं, लिहाजा एनडीए उम्मीदवारों का नामांकन दोपहर 1.30 से 2 बजे के बीच होगा. 

और, अमित शाह के पटना पहुंचने से घंटे भर पहले ही नीतीश कुमार ने सोशल साइट X पर एक गोल-मोल बयान जारी कर दिया. एक ऐसा बयान जो एग्जिट नोट ज्यादा लगता है, जिसमें नीतीश कुमार खुद ही मार्गदर्शक मंडल में स्थापित होने की घोषणा कर रहे हों, 'मैं आपको पूरी ईमानदारी से विश्वास दिलाना चाहता हूं कि आपके साथ मेरा यह संबंध भविष्य में भी बना रहेगा एवं आपके साथ मिलकर एक विकसित बिहार बनाने का संकल्प पूर्ववत कायम रहेगा. जो नई सरकार बनेगी उसको मेरा पूरा सहयोग एवं मार्गदर्शन रहेगा.'

Advertisement

नीतीश कुमार ने अपने हिसाब से चार साल पुरानी इच्छा ही औपचारिक तौर पर दोहराई है, 'संसदीय जीवन शुरू करने के समय से ही मेरे मन में एक इच्छा थी कि मैं बिहार विधान मंडल के दोनों सदनों के साथ संसद के भी दोनों सदनों का सदस्य बनूं. इसी क्रम में इस बार हो रहे चुनाव में राज्यसभा का सदस्य बनना चाह रहा हूं.'

मार्च, 2022 में बिहार दिवस के मौके पर पत्रकारों से बातचीत में नीतीश कुमार ने कहा था कि सब कुछ तो हो गया, एक इच्छा बाकी है कि वह राज्यसभा नहीं जा सके हैं. नीतीश कुमार के बयान को तब भी एकबारगी वैसे ही समझा गया था, जैसा अब औपचारिक रूप ले चुका है. तब नीतीश कुमार को राज्यसभा के जरिए उपराष्ट्रपति बनाए जाने के कयास भी लगाए जाने लगे थे. बवाल बढ़ा तो नीतीश कुमार ने सफाई दी, मैंने लोकसभा, विधानसभा और विधान परिषद में काम किया है... लेकिन राज्यसभा में कभी नहीं गया हूं... यह मेरी इच्छा है कि एक दिन राज्यसभा सदस्य बनूं, लेकिन फिलहाल ऐसा नहीं सोच रहा हूं.

सवाल यह है कि क्या नीतीश कुमार के सामने तब ऐसी ही चुनौती पैदा हो गई थी, लेकिन जेडीयू नेता ने अपने तरीके से सब ठीक कर लिया था - और अब?

Advertisement

2. क्या नीतीश कुमार ने दबाव में फैसला लिया है? 

सोशल मीडिया पर तो यही चल रहा है कि नीतीश कुमार कभी किसी के दबाव में नहीं आते. हल्के फुल्के अंदाज में यहां तक कहा गया है कि सिर्फ पढ़ाई के मामले में पिता के दबाव में बात मान लिए थे. लेकिन, आगे चलकर राजनीति की राह पकड़ ली.

राजनीति का भी ट्रैक रिकॉर्ड ऐसा है कि जब भी दबाव महसूस हुआ, यू-टर्न ले लिया. और, ऐसा करके 20 साल बिहार के मुख्यमंत्री की कुर्सी पर काबिज रहे. मुख्यमंत्री पद छोड़ने का भी सबसे बड़ा कारण सामने आया है, नीतीश कुमार की सेहत. उनके कई सार्वजनिक व्यवहार को लेकर भी सवाल उठे हैं, जिसे सेहत से जोड़ा गया है. 

अगर सवाल यह है कि क्या नीतीश कुमार ने बीजेपी के दबाव में ताजा फैसला लिया है. बताने के लिए तो नीतीश कुमार ने बता ही दिया है कि राज्यसभा जाने की पुरानी ख्वाहिश थी. अब वह इच्छा पूरी हो रही है - लेकिन, किसे यकीन होगा कि नीतीश कुमार राज्यसभा जाने की इच्छा के लिए मुख्यमंत्री की कुर्सी छोड़ देंगे?

अगर प्रधानमंत्री बनने का मौका मिला होता, तो जरूर यह बात मानी जा सकती थी. लेकिन, फिलहाल तो यह मुमकिन है भी नहीं. 2024 के लोकसभा चुनाव से पहले ऐसी संभावनाओं पर काफी देर तक बहस हो सकती थी. 

Advertisement

2020 के विधानसभा चुनाव के बाद में जेडीयू की हालत जरूर खराब हो गई थी, लेकिन 2025 में नीतीश कुमार ने पार्टी का प्रदर्शन सुधार दिया, और उससे पहले हुए लोकसभा चुनाव से पहले पलटी मारकर सांसदों का भी नंबर कायम रखा, जिसकी बदौलत केंद्र सरकार में सपोर्ट का मजबूत कंधा बने हुए हैं.

वैसे दबाव का एक उदाहरण तो तभी नजर आया था, जब 2025 में सरकार बनने पर नीतीश कुमार को बीजेपी के डिप्टी सीएम सम्राट चौधरी को गृह मंत्रालय देना पड़ा था. 

3. बिहार की राजनीति पर कैसे पकड़ रखेंगे नीतीश? 

बिहार की राजनीति पर नीतीश कुमार की पकड़ तभी मजबूत रह सकती है, जब नया मुख्यमंत्री भी मनमाफिक बनता हो. जैसी कि चर्चा है, निशांत कुमार के तो ज्यादा से ज्यादा डिप्टी सीएम बनने की ही संभावना जताई जा रही है - अगर निशांत कुमार बिहार के मुख्यमंत्री बनाए जाएं, तभी नीतीश कुमार के हाथ में सत्ता का रिमोट हो सकता है. 

निशांत कुमार को डिप्टी सीएम बनाया जाना एक तात्कालिक ऐडजस्टमेंट ही कहा जा सकता है, जैसे कोई रस्मअदायगी हो रही हो. अगर नया मुख्यमंत्री बीजेपी का नहीं, और जेडीयू का बनता है तो कुछ हद तक दखल हो सकता है. जेडीयू में भी पहले से ही दो खेमा बना हुआ है. 

Advertisement

जेडीयू का एक खेमा नीतीश कुमार का समर्थक है, तो दूसरा बीजेपी के साथ सहानुभूति रखता है. करीब करीब वैसे ही जैसे पूर्व डिप्टी सीएम सुशील मोदी को बीजेपी का नेता होते हुए भी नीतीश कुमार के ज्यादा करीब माना जाता था. जेडीयू और बीजेपी के बीच पैदा हुई आपदा की स्थिति में अवसर का फायदा उठाकर आरसीपी सिंह तो मिसाल पेश कर ही चुके हैं. 

4. क्या बीजेपी, देर से ही सही, महाराष्ट्र फॉर्मूला लागू कर पाएगी? 

बिहार चुनाव से पहले ही बिहार में बीजेपी के महाराष्ट्र फॉर्मूला लागू करने की आशंका जताई जा रही थी, लेकिन वैसा कुछ नहीं हुआ. जैसे बीजेपी ने 2020 में जेडीयू की बहुत ही कम सीटें होते हुए भी नीतीश कुमार को मुख्यमंत्री बनाया था, 2025 में भी सब कुछ वैसे ही चुपचाप होने दिया. बीजेपी को लोहे के गर्म होने का इंतजार था, जब हथौड़े का पूरा असर हो. 

बीजेपी ने ताना-बाना तो पहले से ही बिछा रखा है. लव-कुश समीकरण के तहत सम्राट चौधरी को कैबिनेट में नीतीश कुमार बाद स्थापित कर दिया गया है. बरसों से नीतीश कुमार के पास रहा गृह मंत्रालय भी दिला दिया गया है - सम्राट चौधरी को तो पहले भी मुख्यमंत्री पद की रेस में माना जाता रहा है, अब तो बड़ा मौका है. 

Advertisement

हालांकि, मुख्यमंत्री पद के लिए बीजेपी की तरफ से नित्यानंद राय और दिलीप जायसवाल का भी नाम चल रहा है. नित्यानंद राय को बिहार की राजनीति में पहले भी नीतीश कुमार के समानांतर खड़ा करने की कोशिश की गई है, क्योंकि नीतीश कुमार के साथ साथ लालू यादव के वोट बैंक के लिए भी कारगर हो सकते थे. 

बिहार के राजनीतिक समीकरण ऐसे हैं, जिसमें मजबूती से पांव जमाने के लिए बीजेपी को फूंक फूंक कर कदम बढ़ाने पड़ रहे हैं. 2022 में नीतीश कुमार के महागठबंधन में चले जाने के बाद बिहार रैली में अमित शाह ने कहा था कि 2025 के विधानसभा चुनाव के बाद बीजेपी अपना मुख्यमंत्री बनाएगी - लेकिन अब तक ऐसी सूरत नहीं बन पाई है. 

असल में, बीजेपी को सिर्फ अपना मुख्यमंत्री ही नहीं चाहिए, उसे तो नीतीश कुमार की विरासत पर काबिज होना है - और ये सब इतना आसान भी नहीं है. 

5. क्या निशांत कुमार जेडीयू और पिता की विरासत बचा पाएंगे?

निशांत कुमार पिता की विरासत तभी बचा पाएंगे, जब उनकी वैसी पोजीशन भी बन सके. राजनीति को करीब से देखना, और रोजाना की चुनौतियों को झेलते हुए आगे बढ़ना अलग अलग बातें हैं. निशांत कुमार ने सत्ता को करीब से देखा तो है, लेकिन अभी उनकी स्थिति महाभारत के अभिमन्यु जैसी ही है - और निशांत के लिए जेडीयू को कायम रख पाना और पिता की विरासत बचाना चक्रव्यूह से कामयाब होकर निकलने से कम नहीं है.

---- समाप्त ----

Read more!
Advertisement

RECOMMENDED

Advertisement