ममता डोनाल्ड बनर्जी

नवंबर 2020 के डोनाल्ड ट्रंप और मई 2026 की ममता बनर्जी के बीच कई समानताएं हैं. दोनों की 'कोरियोग्राफी' बिल्कुल एक जैसी है.

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ममता और ट्रंप ने अपनी पहचान बागी के तौर पर बनाई है. दोनों खुद को लोगों की एकमात्र आवाज बताते हैं. (Photo: ITG) ममता और ट्रंप ने अपनी पहचान बागी के तौर पर बनाई है. दोनों खुद को लोगों की एकमात्र आवाज बताते हैं. (Photo: ITG)

कमलेश सिंह

  • नई दिल्ली,
  • 09 मई 2026,
  • अपडेटेड 7:07 AM IST

इंसान की खुद को धोखे में रखने की क्षमता में बहुत सुकून देने वाली बात है. यह उन कुछ प्राकृतिक संसाधनों में से एक है जो सचमुच 'रिन्यूएबल' है, इसमें कोई खुदाई नहीं लगती और लोकतंत्र के अलावा यह कोई कचरा भी पैदा नहीं करता. डोनाल्ड ट्रंप ने नवंबर 2020 में इसकी खोज की थी और ममता बनर्जी ने मई 2026 में इसे फिर से खोज निकाला है. दोनों की 'कोरियोग्राफी' बिलकुल एक जैसी है.

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आपको याद होगा, ट्रंप ने 3 नवंबर, 2020 की रात जो नतीजे आते देखे, वे उनके पक्ष में नहीं थे. जब तक एरिज़ोना हाथ से निकला और पेंसिल्वेनिया डगमगाया, तब तक गणित वही कर रहा था जो वह हमेशा करता है- असलियत दिखाना, चाहे उसे कोई भी देख रहा हो. गणित की यही सबसे चिढ़ाने वाली खूबी है. रात के 2 बजे ही ट्रंप ने अपनी जीत का ऐलान कर कर दिया, गिनती को गलत बताकर. और अगले 63 दिन साजिशों का एक ऐसा महल खड़ा किया, जिसमें वे खुद को लूटा हुआ राजा बता सकें और 7.7 करोड़ अमेरिकियों को या तो जालसाज या बेवकूफ.

उन्होंने रैलियां कीं. मुकदमे दायर किए और उन्हें हारा भी. फिर और रैलियां कीं. उपराष्ट्रपति पर दबाव बनाया. उन्होंने जॉर्जिया के सेक्रेटरी ऑफ स्टेट को फोन किया और बहुत ही महीन मांग की कि उनके लिए 11,780 वोट ‘ढूंढ’ कर लाए जाएं. एक भी वोट नहीं मिला. एक भी नहीं. 6 जनवरी, 2021 को उन्होंने भाषण देते हुए भीड़ को ‘जी-जान से लड़ने’ (fight like hell) और 'स्टोलन इलेक्शन' (चुराए गए चुनाव) के खिलाफ कैपिटल हिल तक मार्च करने के लिए उकसाया, जहां कांग्रेस इलेक्टोरल कॉलेज के वोटों को सर्टिफाई करने की तैयारी कर रही थी.

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भीड़ ने उनकी बात मान ली. वे जबरदस्ती अंदर घुस गए, पुलिस से लड़े और संपत्ति को नुकसान पहुंचाया. डेमोक्रेटिक और रिपब्लिकन नेशनल कमेटी के हेडक्वार्टर में 'पाइप बम' मिले. करीब 140 अधिकारी घायल हुए. कैपिटल हिल जैसी पुरानी इमारत, जो 1814 में अंग्रेजों से बच गई थी, 2021 में अपने ही नागरिकों से बाल-बाल बची.

इतिहासकार जितना मानते हैं, इतिहास उससे कहीं ज़्यादा मजेदार होता है. अब आप सात समंदर और कुछ टाइम जोन पार कर लौट आइए.

पश्चिम बंगाल, 4 मई, 2026. भाजपा ने बंगाल में अपनी पहली जीत के साथ क्लीन स्वीप कर दिया और 294 विधानसभा सीटों में से 206 सीटें जीत लीं. 2011 से बंगाल पर राज कर रही तृणमूल कांग्रेस ध्वस्त हो गई. मुख्यमंत्री ममता बनर्जी, जिन्हें 'दीदी' कहा जाता है और जिन्होंने खुद को बंगाल का पर्यायवाची बना लिया था, अपनी खुद की सीट हार गईं.

बनर्जी ने हार मानने से इनकार कर दिया और चुनाव 'चोरी' का आरोप लगाया. उन्होंने कहा, "मैं इस्तीफा नहीं दूंगी, मैं हारी नहीं हूं," और दावा किया कि एक "पक्षपाती" चुनाव आयोग की मदद से 100 से अधिक सीटें "जबरदस्ती छीन" ली गईं. सौ सीटें. जबरदस्ती छीन ली गईं. भारत के चुनाव आयोग द्वारा.

यह एक कमाल का दावा है. चुनाव आयोग पर पहले भी कई तरह के आरोप लगे हैं. सुस्ती, तरफदारी और भाजपा की सुविधा के हिसाब से चुनाव शेड्यूल बनाने जैसे कई आरोप. लेकिन 100 निर्वाचन क्षेत्रों में गुप्त रूप से हेरफेर करने वाला 'पैरामिलिट्री ऑपरेशन' चलाना एक ऐसा कारनामा है जिसकी उम्मीद शायद ही किसी ने की हो.

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हर कोई जानता है कि बंगाल को इतनी भारी 'सेंट्रल फोर्स' की तैनाती की जरूरत क्यों पड़ी. अगर आप यूरोप में रह रहे हैं, तो 2021 के चुनाव के बाद के हालात के बारे में पढ़ें. ममता हमेशा से महत्वाकांक्षी रही हैं. लगता है अब उन्होंने अपनी महत्वाकांक्षा को अपने आरोपों तक भी बढ़ा दिया है.

ट्रंप के साथ उनकी यह समानता इत्तेफाक नहीं है. दोनों नेताओं ने अपनी राजनीतिक पहचान इस विचार पर बनाई कि वे जनता की असली आवाज हैं- विद्रोही. दोनों ने सालों तक बाहरी (outsider) के तौर पर सिस्टम से लड़ते हुए बिताए और ऐसी वफादारी हासिल की जो संस्थागत नहीं, बल्कि व्यक्तिगत थी.

जब जनता ने उनके खिलाफ फैसला सुनाया, तो दोनों ने ही यह निष्कर्ष निकाला कि जनता जरूर भ्रमित रही होगी. या डरी होगी. या दोनों. इस सोच में जनता तभी तक 'स्वतंत्र' है, जब तक वह गलत तरीके से वोट नहीं देती.

ट्रंप ने एक 'बुलेटप्रूफ' शील्ड के पीछे से घोषणा की कि वे "कभी हार नहीं मानेंगे", मीडिया की आलोचना की और माइक पेंस से नतीजे पलटने को कहा. ममता ने एक प्रेस कॉन्फ्रेंस की और पत्रकारों से कहा कि वे हारी नहीं हैं. ये दोनों बयान व्यावहारिक रूप से एक जैसे ही हैं. बुलेटप्रूफ शील्ड ऑप्शनल है, लेकिन हकीकत को मानने से इनकार करना अनिवार्य.

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बंगाल में जो हुआ वह पहले से तय था, जबकि जनवरी 2021 में वाशिंगटन में जो हुआ उसने कम से कम उन लोगों को तो हैरान किया ही जो ध्यान नहीं दे रहे थे. बंगाल में चुनाव के बाद हिंसा भड़क उठी. हत्याओं, आगजनी और कार्यकर्ताओं के बीच झड़पों की खबरें आईं. नतीजे घोषित होने के बाद से अशांति में कम से कम चार लोग मारे गए और कई जिलों में तोड़फोड़ और निशानदेही करके हमले हुए.

कोलकाता, हावड़ा, बीरभूम, मुर्शिदाबाद, उत्तर और दक्षिण 24 परगना जैसे जिलों में राजनीतिक टकराव सामने आए. नयाजत में एक पुलिस अधिकारी को गोली मार दी गई. जामुड़िया में टीएमसी के दफ्तर फूंक दिए गए. कोलकाता के न्यू मार्केट में बुलडोजरों ने इमारतों को ढहा दिया. बंगाल के सीएम होने जा रहे शुभेंदु अधिकारी के PA की शहर के ठीक बाहर गोली मारकर हत्या कर दी गई.

भले ही इसका पैमाना 6 जनवरी से अलग हो, लेकिन तर्क वही है. जब कोई नेता अपने समर्थकों से कहता है कि उसकी जीत चुरा ली गई है, तो वह कोई तथ्यात्मक दावा नहीं कर रहा होता. वह एक निर्देश दे रहा होता है. निर्देश यह है कि मेरी हार स्वीकार मत करो. निर्देश कहता है कि सड़कें ही असली अदालत हैं. निर्देश कहता है कि तुम्हारा गुस्सा जायज है, क्योंकि मेरी हार नामुमकिन है.

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वाशिंगटन में, 6 जनवरी के अपराधों के लिए आरोपी बनाए गए 120 लोगों ने ट्रंप की बातों का खास तौर पर हवाला दिया कि वे इसीलिए कैपिटल हिल गए थे. उन्होंने ट्रंप का नाम लेकर कोई गलती नहीं की. उन्हें बार-बार, हर तरह से बताया गया था कि लड़ना जरूरी है. और वे लड़े.

बंगाल में, जो कार्यकर्ता पार्टी छोड़ रहे थे, उन्हें ममता की प्रेस कॉन्फ्रेंस से रुकने की एक वजह मिल गई. राजनीतिक रूप से बेसहारा लोगों का पलायन शुरू हो चुका था, कई लोग भाजपा के रूप में नए ठिकाने की तलाश में थे. तभी उन्होंने सुना कि जो भी हाथ लगे उसे उठा लो और अपनी वफादारी साबित करो.

यही वह तरीका है. यह हर बार, हर भाषा में, हर उस महाद्वीप पर काम करता है जहां कोई नेता हार मानने से मना कर दे.

अंतर तो हैं ही. ट्रंप के पास ट्विटर, फॉक्स न्यूज और एक ऐसा 'MAGA' सिस्टम था जो टीवी से लेकर इंटरनेट के अंधेरे कोनों तक फैला था. ममता के पास उनके कार्यकर्ता और उनके व्यक्तित्व की वह आक्रामकता है जिसे कभी किसी टूल-किट जैसे 'इंफ्रास्ट्रक्चर' की जरूरत नहीं पड़ी. बस एक शिकायत चाहिए और उसे सुनने वाले.

ट्रंप के फर्जी दावों को एक के बाद एक कई अदालतों ने खारिज कर दिया. ममता के दावों को तो अभी तक ऐसी कोई अदालत भी नहीं मिली, जो उन्हें सुनने का सब्र रखे.

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आखिरकार ट्रंप ने झेंपते हुए, अपनी कैबिनेट और जनता के दबाव में आकर शांतिपूर्ण सत्ता हस्तांतरण के लिए टीवी पर बयान दिया. शायद तब, जब उन्हें एहसास हो गया कि नेशनल गार्ड उनके एक इशारे पर मार्च नहीं करने वाली. ममता पर ऐसा कोई दबाव नहीं दिख रहा. उन्हें 'इन्डिया अलायंस' के उन साथियों का समर्थन मिला है, जो खुद बुरी तरह हारे हैं और जिन्हें अब साथ निभाने के लिए कोई चाहिए. वे अब इस बात का इंतजार कर रही हैं कि दुनिया उनके वर्जन को सच मान ले.

दुनिया हमेशा की तरह, किसी जल्दी में नहीं है.

एक बात और भी है: 2021 में, कैपिटल हिल पर हमला करने वाली भीड़ एक लोकतांत्रिक प्रक्रिया को रोकने की कोशिश कर रही थी. 2026 में, बंगाल की हिंसा उस रस्मअदायगी को रोकने की कोशिश है जो लोकतांत्रिक प्रक्रिया के खत्म होने पर होती है. एक ने लोकतंत्र पर दरवाजे पर हमला किया. दूसरी लोकतंत्र की राह पर हमला कर रही है, जहां से काफिला निकल चुका है.

लोकतंत्र एक अजीब और मुश्किल व्यवस्था है. यह अपने भागीदारों से कुछ ऐसा करने को कहता है जो सचमुच कठिन है. हारने की इच्छा. चाहे व्यवस्था कितनी भी अधूरी हो और मतदाता कितने भी भूल करने वाले हों, यह स्वीकार करना कि एक स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव ही वह जरिया है जिससे सत्ता हस्तांतरित होती है और वैधता मिलती है.

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ज़्यादातर राजनेता इसे समझते हैं. वे इसे स्वीकार करते हैं. वे घर जाते हैं, दोबारा तैयारी करते हैं, और पांच साल बाद थोड़े विनम्र होकर और राजनीति में थोड़े और माहिर होकर वापस आते हैं. लेकिन कुछ ऐसा नहीं करते. कुछ तय कर लेते हैं कि चुनाव गलत था, आयोग पक्षपाती था, और उनकी हार असल में प्रकृति के नियमों के खिलाफ एक अपराध है. वे बड़ी भीड़ के सामने जोर-जोर से ऐसा कहते हैं जो पहले से ही निराश है, गुस्से में है और किसी को दोषी ठहराने के लिए ढूंढ रही है.

हो सकता है कि चुनावी नतीजों का अंदाजा लगाना मुश्किल रहा हो, लेकिन उन नतीजों का जो 'नतीजा' निकला, वह तय था. बंगाल में ये हमेशा से ही पूरी तरह तय रहे हैं. हैरानी की बात यह है कि केंद्रीय सुरक्षा बलों की कंपनियां मूकदर्शक बनी रहीं. क्या उन्हें इसीलिए ज़्यादा समय तक रुकने को नहीं कहा गया था ताकि वे इसी चीज को रोक सकें? सुरक्षा बलों की तैनाती स्वतंत्र और निष्पक्ष मतदान सुनिश्चित करने के लिए की गई थी. जाहिर है, किसी ने यह नहीं सोचा था कि ये जवान चुनाव के बाद के हालात को भी निष्पक्ष और सुरक्षित रख सकते हैं. और नतीजा? वही खूनी खेल.

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