ईरान हमला किसका ‘खेल'? नेतन्याहू की धुन पर नाचने लगा ट्रंप का ईगो

दुनिया है मेरे पीछे, लेकिन मैं तेरे पीछे... मानो डोनाल्ड ट्रंप ये कहते कहते बेंजामिन नेतन्याहू की हर रणनीति को फॉलो करते चले गए, और ईरान पर हमला कर बैठे. दुनिया को अपने इशारे पर नचाने वाले ट्रंप की ईरान की ताजा जंग ने एक उलटी तस्वीर पेश की है. आलोचक कह रहे हैं कि इस बार उनकी डोर बेंजामिन नेतन्याहू के हाथ में है.

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क्या नेतन्याहू के दबाव में ईरान पर हमला करने के लिए ट्रंप तैयार हुए? (Photo: AP) क्या नेतन्याहू के दबाव में ईरान पर हमला करने के लिए ट्रंप तैयार हुए? (Photo: AP)

धीरेंद्र राय

  • नई दिल्ली,
  • 03 मार्च 2026,
  • अपडेटेड 7:00 PM IST

बेंजामिन नेतन्याहू राजनीति के पुराने खिलाड़ी हैं. वे जानते थे कि डोनाल्ड ट्रंप को कैसे मैनेज करना है. ट्रंप की सबसे बड़ी कमजोरी उनकी वह इमेज है जिसमें वे खुद को दुनिया की हर प्रॉब्लम का ‘अंतिम सॉल्यूशन’ देने वाले महानायक के रूप में देखते हैं. नेतन्याहू ने इसी मनोवैज्ञानिक कमजोरी का फायदा उठाया. और उनसे वो काम निकलवा लिया, जो उनसे पहले के छह अमेरिकी राष्ट्रपति करने में झिझक रहे थे.

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नेतन्याहू ने ट्रंप को यह यकीन दिलाने में कामयाबी हासिल की कि ईरान का मुद्दा सिर्फ प्रतिबंधों, बातचीत (negotiations) या छोटे-मोटे हमलों से हल नहीं होगा. उन्होंने ट्रंप के सामने एक ऐसी तस्वीर पेश की, जिसमें बताया गया कि ईरान पर सीधा हमला करके ट्रंप कैसे इतिहास के पन्नों में दर्ज हो जाएंगे. वो मुकाम जहां कोई और अमेरिकी राष्ट्रपति नहीं पहुंच सका.

ट्रंप इसी से संतुष्ट हो गए कि अयातुल्ला खामनेई सहित ईरान की टॉप लीडरशिप को खत्म करके वे यह जंग जीत लेंगे. ट्रंप यहीं गलती कर बैठे. टॉप लीडरशिप के बावजूद ईरान ने अमेरिका-इजरायल ही नहीं, गल्फ के पड़ोसी देशों की भी नींद उड़ा दी है. इस जंग का ओर छोर दिखाई नहीं दे रहा है. हॉर्मुज स्ट्रेट से होने वाली दुनिया की 20-30 फीसदी ऑयल सप्लाय रुक गई है. ग्लोबल इकोनॉमी पर संकट के बादल मंडरा रहे हैं. इस सबके बीच, ट्रंप जो पूरी दुनिया को अपनी उंगलियों पर नाचते देखना चाहते थे, अब खुद नेतन्याहू की रणनीतिक बिसात पर एक मोहरा बनकर रह गए हैं.

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ईरान पर हमले के पीछे ट्रंप पर इजरायली दबाव था या नहीं, इस पर बहस अमेरिका में भी हो रही है. इसका अंदाजा आप अमेरिका और इजरायल से आए बयानों से लगा सकते हैं-

इजरायल ने तय कर लिया था कि वो ईरान पर हमला करेगा. और ऐसा होता तो ईरान बदले में अमेरिकी सैनिकों को निशाना बनाता. इसलिए ट्रंप एडमिनिस्ट्रेशन को इस हमले का हिस्सा बनना पड़ा.

मार्को रुबियो (यूएस सेक्रेटरी ऑफ स्टेट)

प्रेसिडेंट ट्रंप जानते हैं कि अमेरिका के हित में क्या है. वे उसी हिसाब से फैसले लेते हैं. हम bad guys (बुरी ताकतों) से लड़ रहे हैं, क्योंकि good guys (अच्छे लोग) हैं. हम से मास टेररिस्ट को निशाना बना रहे हैं.

बेंजामिन नेतन्याहू, इजरायली पीएम (Fox News से कहा)

जून 2025 से फरवरी 2026 तक: वन नाइट अटैक से ‘अनंत युद्ध’ की ओर

पिछले साल जून 2025 में जब अमेरिका ने ईरान पर एक रात छोटी एयर-स्ट्राइक की थी, तो उसे एक चेतावनी माना गया था. कहा गया था कि ईरान के परमाणु ठिकानों को बर्बाद कर दिया गया है, और उसकी न्यूक्लियर बम बनाने की क्षमता को वर्षों पीछे धकेल दिया गया है. लेकिन इजरायल ने इसे नाकाफी माना. ट्रंप को बताया गया कि कैसे ईरान बड़े युद्ध की तैयारी कर रहा है. जिससे तय हुआ कि ‘आधा-अधूरा काम’ ईरान को और खतरनाक बना देगा. इजरायल ने खामनेई के पल पल के मूवमेंट की जानकारी जुटाई, और निर्णायक हमले के लिए अमेरिका को तैयार किया. नतीजा सब देख रहे हैं कि फरवरी 2026 में अमेरिका ने 'Operation Epic Fury' के जरिए ईरान के पूरे सरकारी और सैन्य ढांचे को निशाना बना डाला. साथ में इजरायल का ’Operation Roaring Lion' भी जारी है.

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इसमें कोई शक नहीं कि अमेरिकी और इजरायली हमले ने अली खामेनेई सहित ईरान के शीर्ष नेतृत्व को खत्म कर दिया. लेकिन ट्रंप की सबसे बड़ी रणनीतिक भूल यहीं थी. उन्होंने सोचा था कि नेतृत्व खत्म होते ही ईरान घुटने टेक देगा. लेकिन इसके उलट, ईरान ने ‘टोटल वार’ (पूर्ण युद्ध) का एलान कर दिया. अब यह एक दिन का हमला नहीं, बल्कि एक ऐसा ‘फॉरएवर वार’ (अंतहीन युद्ध) बन चुका है जिसने वियतनाम, इराक और अफगानिस्तान की यादें ताजा कर दी हैं.

क्या ईरान पर हमले के नतीजे को समझने में चूक कर गए ट्रंप?

ट्रंप की इस कार्रवाई ने यह साफ कर दिया कि उनमें रणनीतिक गहराई की कमी थी. उन्होंने यह नहीं समझा कि ईरान के भीतर सिर्फ परमाणु ठिकाने ही नहीं हैं, बल्कि उसके पास हजारों ‘सुसाइड ड्रोन’ और ऐसी मिसाइलें हैं जिन्हें ट्रैक करना मुश्किल है. नेतन्याहू, जिनके पास रीजनल चैलेंज का दशकों का अनुभव है, ने ट्रंप को सिर्फ वही दिखाया जो उनके अपने (इजराइल के) हित में था. उन्होंने अमेरिका के ‘राष्ट्रीय हितों’ को इजराइल के ‘क्षेत्रीय हितों’ के पीछे धकेल दिया.

ट्रंप यह भी नहीं जज कर पाए कि युद्ध के दौरान ग्लोबल ऑयल सप्लाय का क्या होगा? यदि युद्ध लंबा चला तो दुनिया की इकोनॉमी का क्या होगा? युद्ध खत्म हो गया तो गल्फ और दुनिया में होने वाले नए क्लेश से कैसे निपटेंगे? जिसमें कट्टरपंथियों और आतंकियों के उभार की आशंका है.

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गल्फ देशों में तबाही और अमेरिकी सैनिकों की मौत

-इस युद्ध का सबसे भयानक पहलू अब सामने आ रहा है. ईरान ने अपनी रणनीति बदल दी है. वह सीधे अमेरिका या इजराइल पर हमला करने के बजाय उन खाड़ी (गल्फ) देशों को निशाना बना रहा है जहां अमेरिकी बेस मौजूद हैं.

-कतर, बहरीन और यूएई पर हमले: ईरान की मिसाइलें अब उन अमेरिकी अड्डों पर गिर रही हैं जो कल तक सुरक्षित माने जाते थे.

-सैनिकों की मौत: हर बीतते दिन के साथ अमेरिकी सैनिकों के मारे जाने की खबरें आ रही हैं. और अब तो ट्रंप भी कह चुके हैं कि यह लंबी लड़ाई हैं. हमें और शहादतों के लिए तैयार रहना होगा.

विमानों का गिरना: ईरान के एडवांस एयर डिफेंस सिस्टम अमेरिकी लड़ाकू विमानों को निशाना बना रहे हैं, या वे ईरानी हमले की गफलत में अमेरिकी एयर डिफेंस का शिकार हो रहे हैं.

ट्रंप ने पिछले छह राष्ट्रपतियों की उस रणनीति को नजरअंदाज किया जिसमें वे ईरान के खिलाफ सीधी जंग छेड़ने के बजाय उसे ‘काबू’ में रखने (Containment) पर विश्वास करते थे. आज खाड़ी देश, खासकर वहां बसे लोग भी अमेरिका से नाराज होंगे, क्योंकि वे इस युद्ध की आग में बिना वजह झुलस रहे हैं.

ईरान में नेतन्याहू जीत रहे हैं, लेकिन ट्रंप?

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इस पूरे संकट में अगर कोई जीता हुआ महसूस कर रहा है, तो वह बेंजामिन नेतन्याहू हैं. उन्होंने वह काम अमेरिका से करवा लिया जिसका इंतजार इजरायल पिछले 45 साल से कर रहा था. लेकिन ट्रंप को क्या हासिल हो रहा है? इस ‘जीत’ के लिए अमेरिका अपनी साख, अपने सैनिकों की जान और दुनिया की इकोनॉमी को दांव पर लगाकर चुका है.

डोनाल्ड ट्रंप अपनी रैलियों में कहते थे कि वे अमेरिका को युद्धों से बाहर निकालेंगे, आज अमेरिकी इतिहास के सबसे जटिल और खतरनाक युद्ध के जन्मदाता बन चुके हैं. उन्होंने नेतन्याहू के इशारे पर नाचकर अमेरिका को एक ऐसी अंधेरी गली में धकेल दिया है जहां से वापसी का कोई फिलहाल कोई रास्ता नहीं दिखता.

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