तमिलनाडु में 'केजरीवाल मोमेंट': थलपति विजय ने कैसे द्रविड़ दिग्गजों को उनके ही खेल में मात दी?

तमिलनाडु में TVK को सत्ता सौंपने में जितनी देर हो रही थी, विजय उतने मजबूत होते गए. अब जबकि, उनकी पार्टी को बहुमत के लिए जरूरी सपोर्ट मिल गया है तो द्रविड़ पॉलिटिक्स के सारे धुरंधर धीरे-धीरे सरेंडर होते जा रहे हैं. और विजय के लिए जो रास्ता बनता दिख रहा है, वह अल्पमत से प्रचंड बहुमत का है.

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थलपति विजय को सत्ता मिलने में देर जरूर हुई, लेकिन वे इस देरी से और मजबूत ही हुए. (फोटो- ITG) थलपति विजय को सत्ता मिलने में देर जरूर हुई, लेकिन वे इस देरी से और मजबूत ही हुए. (फोटो- ITG)

धीरेंद्र राय

  • नई दिल्ली,
  • 08 मई 2026,
  • अपडेटेड 4:30 PM IST

तमिलनाडु की सियासत में पिछले कुछ दिनों से चल रहा हाई-वोल्टेज ड्रामा अब अपने क्लाइमेक्स पर पहुंच गया है. सुपरस्टार थलपति विजय, जिन्हें राजनीति का 'न्यूकमर' मानकर हल्के में लिया जा रहा था, उन्होंने द्रविड़ राजनीति के बड़े-बड़े दिग्गजों को चित कर दिया है. ताजा अपडेट यह है कि विजय की पार्टी तमिझगा वेत्री कड़गम (TVK) ने बहुमत के लिए जरूरी 118 का जादुई आंकड़ा छू लिया है.

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इस आंकड़े तक पहुंचने में लेफ्ट पार्टियों (CPI और CPI-M) के दो-दो विधायकों और दो विधायकों वाली VCK के समर्थन ने अहम भूमिका निभाई है. लेकिन इस पूरी कहानी का सबसे दिलचस्प पहलू यह नहीं है कि विजय को बहुमत मिल गया है, बल्कि यह है कि सत्ता मिलने में हुई 'देरी' ने विजय को कमजोर करने के बजाय और भी ज्यादा ताकतवर बना दिया है.

विजय आज उसी मुकाम पर खड़े नजर आ रहे हैं, जहां कभी अरविंद केजरीवाल अपने शुरुआती दिनों में थे. केजरीवाल ने जैसे दिल्ली में भाजपा-कांग्रेस की जमी-जमाई राजनीति को हिला दिया था, विजय ने भी तमिलनाडु के 'द्रविड़ियन किले' में वैसी ही सेंध लगा दी है.

बहुमत का गणित: विजय की जीत और द्रविड़ राजनीति का संकट

राजनीति में अक्सर कहा जाता है कि जो देर से मिलता है, उसकी कीमत ज्यादा होती है. विजय के मामले में भी यही हुआ. बहुमत साबित करने की कशमकश के दौरान जो तस्वीरें उभरकर आईं, उन्होंने तमिलनाडु की पारंपरिक राजनीति के धुरंधरों की हवा निकाल दी.

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1. द्रविड़ राजनीति के दो ध्रुवों का 'एक्सपोज' होना

दशकों से तमिलनाडु की सत्ता का हिसाब-किताब बेहद सीधा था- एक तरफ DMK और दूसरी तरफ AIADMK. यह मुकाबला बिल्कुल Pepsi और Coke की जंग जैसा था. लेकिन विजय की आहट ने इस सियासी बाजार में ऐसा भूचाल लाया कि इन दोनों कट्टर दुश्मनों के बीच 'मर्जर' जैसी स्थिति पैदा हो गई.

अस्तित्व बचाने के लिए ये दोनों पार्टियां मिलकर सरकार बनाने की संभावनाएं टटोलने लगीं. अपनी दशकों पुरानी दुश्मनी और आईडियोलॉजिकल लड़ाई को भूलकर इनका साथ आना जनता की नजरों में इन्हें पूरी तरह 'एक्सपोज' कर गया. लोगों ने देखा कि सत्ता बचाने के लिए ये दल 180 डिग्री तक घूम सकते हैं. विजय को रोकने के चक्कर में इन दोनों पार्टियों ने अपनी विश्वसनीयता दांव पर लगा दी, और यही विजय की सबसे बड़ी जीत बन गई.

2. कांग्रेस और लेफ्ट का साथ: बदलता सियासी समीकरण

कांग्रेस पहले ही DMK का साथ छोड़ विजय के पाले में आ चुकी थी, लेकिन अब CPI, CPI-M और VCK जैसे दलों का समर्थन मिलना यह साबित करता है कि तमिलनाडु की राजनीति में एक नया 'पावर सेंटर' बन चुका है.

लेफ्ट पार्टियों के दो-दो विधायकों और VCK के दो विधायकों का विजय के साथ आना यह संकेत है कि तमिलनाडु का 'तीसरा विकल्प' अब हकीकत बन चुका है. DMK इसे 'पीठ में छुरा घोंपना' कह सकती है, लेकिन असलियत यह है कि विजय ने सरकार बनाने से पहले ही विपक्ष के सबसे मजबूत गठबंधन को अंदर से खोखला कर दिया है.

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3. सत्ता में देरी बनी विजय की ताकत

विजय को बहुमत के करीब होने के बावजूद जिस तरह इंतजार करना पड़ा, उसने जनता के बीच उनकी छवि एक 'फाइटर' की बना दी है. केजरीवाल ने भी 2013 में इसी तरह के संघर्ष से अपनी जमीन तैयार की थी. जब व्यवस्था किसी को रोकने की कोशिश करती है, तो जनता की सहानुभूति उसके साथ जुड़ जाती है.

विजय के पास अब न केवल 118 विधायकों का समर्थन है, बल्कि उनके पास वह नैतिक बल भी है जो उनके विरोधियों ने जोड़-तोड़ की राजनीति में खो दिया है. अब विजय अगर शपथ लेते हैं, तो वे एक ऐसी सरकार का नेतृत्व करेंगे जिसने सिस्टम से लड़कर अपनी जगह बनाई है.

4. TVK के पास है केजरीवाल जैसा 'अंतिम दांव'

बहुमत मिलने के बाद भी विजय के सामने सबसे बड़ी चुनौती यह होगी कि वे इस 'खिचड़ी सरकार' को कैसे चलाते हैं. केजरीवाल ने 2013 में 49 दिन की सरकार चलाकर इस्तीफा दे दिया था, क्योंकि वे बैसाखियों के सहारे सत्ता नहीं चलाना चाहते थे. वे एक 'क्लीन और मुकम्मल बहुमत' वाली सरकार चाहते थे.

विजय भी इसी राह पर चल सकते हैं. यदि उन्हें लगता है कि गठबंधन के साथी उनके विजन में बाधा बन रहे हैं, तो वे किसी भी समय इस्तीफा देकर दोबारा चुनाव में जाने का दांव खेल सकते हैं. आज जिस तरह विरोधियों ने उन्हें रोकने के लिए अपने सिद्धांत बेच दिए हैं, उसे देखते हुए अगर आज चुनाव हों, तो विजय को अभूतपूर्व जनमत मिल सकता है.

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सुपरस्टार से जननायगन तक का सफर

विजय की कहानी फिलहाल उसी लाइन पर चल रही है, जिस पर केजरीवाल अपने स्वर्णिम शुरुआती दिनों में चल रहे थे. सत्ता मिलने में हुई देरी ने विजय को तमिलनाडु की जनता की नजरों में एक 'विक्टिम' और 'हीरो' दोनों बना दिया है.

द्रविड़ राजनीति के धुरंधर जो कल तक विजय को सिर्फ एक 'एक्टर' समझ रहे थे, आज वे अपने अस्तित्व को बचाने की लड़ाई लड़ रहे हैं. भले ही विजय अभी मुख्यमंत्री की कुर्सी पर बैठने वाले हों, लेकिन असली खेल तो उन्होंने बहुमत की इस कशमकश में ही जीत लिया है. सारे कार्ड अब विजय के हाथ में हैं, और वे तमिलनाडु की राजनीति के नए 'किंगमेकर' नहीं, बल्कि खुद 'किंग' बनकर उभरे हैं.

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