जिमखाना-राज का अंत, दिल्ली में कुछ भी स्थायी नहीं

दिल्ली का जिमखाना क्लब कई पीढ़ियों के लिए यादों का आशियाना और उनके बड़े होने का एक खूबसूरत हिस्सा रहा है, जहां के लॉन और बार राजनीति का सबसे बड़ा अड्डा थे.

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दिल्ली जिमखाना क्लब की 27 एकड़ जमीन खाली होने की इनसाइड स्टोरी (Photo-ITG) दिल्ली जिमखाना क्लब की 27 एकड़ जमीन खाली होने की इनसाइड स्टोरी (Photo-ITG)

मनीष अधिकारी

  • नई दिल्ली,
  • 04 जून 2026,
  • अपडेटेड 12:54 PM IST

2, सफदरजंग रोड पर एक स्विमिंग पूल है, यह पूल आपको दिल्ली जिमखाना क्लब के बारे में वह सब कुछ बता देता है, जो आप जानना चाहते हैं. बात 1930 के दशक की शुरुआत की है, उस समय भारत के वायसराय की पत्नी को तैरने की इच्छा हुई, लेकिन वे तैर नहीं पा रही थीं. वजह यह थी कि वे जिस क्लब में अक्सर जाती थीं, वहां कोई पूल नहीं था. यहां तक कि उनके पति के लिए बन रहे वायसराय हाउस में भी ऐसा कोई इंतज़ाम नहीं था. उन्होंने अपनी इस बेचैनी का हल उसी इकलौते तरीके से निकाला जो उन्हें आता था, उन्होंने पूल के निर्माण में तेजी लाने के लिए ₹21,000 दान कर दिए. इसके बाद पानी के ठीक ऊपर संगमरमर पर अपना नाम गुदवा दिया- 'लेडी विलिंगडन स्विमिंग बाथ'.  

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अब करीब एक सदी के बाद, दिल्ली जिमखाना क्लब को लुटियंस की दिल्ली के बीचों-बीच स्थित अपनी 27.3 एकड़ ज़मीन खाली करने को कहा गया है. इस आदेश से इसके सदस्यों में स्वाभाविक रूप से भारी नाराज़गी है. जिनमें रिटायर्ड जनरल, पूर्व नौकरशाह, सुप्रीम कोर्ट के जज और कुछ मशहूर हस्तियां शामिल हैं. ये सभी क्लब के बारे में ऐसे बात करते हैं, मानो इसे खोना शरीर का कोई अंग खोने जैसा हो. वे याद दिलाते हैं कि सदस्यों की वेटिंग लिस्ट 1970 के दशक की शुरुआत से चली आ रही है. सदस्यता शुल्क बढ़कर ₹20 लाख हो ई है, वे ज़ोर देकर कहते हैं कि यहां के टेनिस कोर्ट विंबलडन के पूरब में सबसे बेहतरीन हैं. शायद लेकिन आइए, हम इस बारे में पूरी ईमानदारी से बात करें कि यहां असल में क्या खत्म हो रहा है और क्या नहीं.

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हुकूमत चलाने वालों का आशियाना 

जिमखाना क्लब भारत या भारतीयों के लिए नहीं बनाया गया था, इसे एक कब्जे वाले दौर की मानसिकता के साथ खड़ा किया गया था. साल 1913 में 'इंपीरियल दिल्ली जिमखाना क्लब' के नाम से शुरू हुए इस क्लब का साफ मकसद ब्रिटिश प्रवासियों और अफ़सरों को एक ऐसी जगह देना था, जहां वे देश को लूटने और यहां राज करने के बीच सुकून से मेल-जोल बढ़ा सकें. उस भारत से दूर, जिसका वे शोषण कर रहे थे. शुरुआती सालों में जिन इक्का-दुक्का भारतीयों को इसमें एंट्री मिली भी, उनसे यह उम्मीद की जाती थी कि वे नाश्ते में अंडे, सॉसेज और मैश खाना सीखें, फॉक्सट्रॉट और बॉलरूम डांस करें और रविवार की दोपहर को ब्लडी मैरी के गिलास खाली करें.

यहां तक कि इसका नाम भी अंग्रेजों की एक गलतफहमी की देन है. अंग्रेजों के कानों ने जब हिंदी का शब्द 'गेंद-खाना' सुना तो उन्होंने अपनी सहूलियत के हिसाब से इसे बदलकर 'जिमखाना' कर दिया, जो सुनने में उन्हें 'जिमनेजियम' जैसा लगा. ब्रिटिश साम्राज्य की पूरी कहानी, बस इस एक गलत उच्चारण में सिमटी हुई है.

साल 1947 के बाद आजाद भारत ने वही किया जो अक्सर नए-नए आजाद हुए देश करते हैं. उसने अपने शोषकों की बनाई व्यवस्था को विरासत में अपना लिया और बड़े ही उत्साह के साथ उसे चलाना भी सीख लिया. क्लब के नाम से 'इंपीरियल' शब्द तो हटा दिया गया, लेकिन फॉक्सट्रॉट डांस और ब्लडी मैरी का दौर वैसे ही चलता रहा. भारतीय सेना के अफसरों और सिविल सर्वेंट्स का एक नया वर्ग, जिन्हें अपने पूरे करियर में इसी क्लब से दूर और बाहर रखा गया था, अब इसके दरवाजों को लांघकर अंदर दाखिल हुआ, वहां जो कुछ था उसे खत्म करने के लिए नहीं, बल्कि उस पर अपना हक जमाने के लिए.

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जिमखाना क्लब अब समाज में कामयाबी और ऊंचे रूतबे का सबसे बड़ा प्रतीक बन चुका था, जैसा कि फाइनेंशियल टाइम्स के बेंजामिन पार्किन ने 2023 में प्रकाशित एक लेख में जिक्र किया था कि ' जब आप इसकी मैनेजिंग कमेटी में शामिल होते थे, तो 15,000 सदस्यों वाला पूरा क्लब आपको जानने लगता था. आपके पास ऐसे कनेक्शन आ जाते थे कि आप बस एक फोन उठाकर कोई भी काम करवा सकते थे.' असल में समस्या यही है. 

गपशप का अड्डा

दिल्ली का जिमखाना क्लब दशकों तक सत्ता के गलियारों में एक समानांतर सरकार की तरह रसूख रखता था. क्लब का बार राजनीति और ब्यूरोक्रेसी की गपशप का केंद्र था, जहां बंद कमरों में सौदे होते थे और आम दुनिया से दूर कइयों के करियर बनते और बिगड़ते थे. खुद को काबिलियत के दम पर चलने वाला बताने वाले इस क्लब का 'ग्रीन कार्ड सिस्टम' दरअसल भाई-भतीजावाद का जरिया था, जो सदस्यों के बच्चों को 21 साल की उम्र में लाइन तोड़कर आगे निकलने की छूट देता था. इसी सामंती ढर्रे के कारण जब सरकार ने इस पर केस किया, तो कोर्ट में पेश 5,000 पन्नों की रिपोर्ट ने इसके वित्तीय घालमेल और चोर-दरवाजे से होने वाली एंट्रियों को बेनकाब कर दिया. अदालत ने इसे सीधे तौर पर एक "पारिवारिक जागीर" कहा.

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यह पतन अप्रत्याशित नहीं था, बल्कि उस अहंकार का नतीजा था जो खुद को आम जनता से अलग और खास समझता है. जिमखाना कभी भी असल में टेनिस, बॉलरूम डांसिंग या लेडी विलिंगडन बाथ के बारे में नहीं था. यह इस बारे में था कि एक लोकतंत्र की राजधानी में अपनापन  या  शामिल होने की शर्तें कौन तय करेगा और कौन नहीं.  2013 में, इस क्लब ने एक ऊंचे दर्जे के भूटानी भिक्षु को वापस लौटाकर सुर्खियां बटोरी थीं, क्योंकि उन्होंने भिक्षुओं वाले वस्त्र पहने हुए थे, वही संस्था, जिसने कभी भारतीयों को 'भारतीय होने' के कारण वापस लौटा दिया था, अब मेहमानों को 'गलत कपड़े' पहनने के कारण वापस लौटा रही थी. औपनिवेशिक सोच ने बस अपने लिए नए निशाने ढूंढ़ लिए थे.

यह दिखावा करना बेईमानी होगी कि जो कुछ खो रहा है, उसकी कोई कीमत नहीं है. लेखिका रेणुका नारायणन ने खुशवंत सिंह की किताब 'सिटी इम्प्रोबेबल' में शामिल एक लेख में, जिमखाना के अंधेरे, खंभों वाले पूल में स्वीमिंग सीखने के बारे में लिखा है. साथ ही उन्होंने शिफॉन की साड़ियों में सजी, बेहद मज़ेदार आंटियों के साथ शांत दोपहर के खाने, लैंटाना और मेहंदी की झाड़ियों के बीच टीनएज में लिए गए चुंबनों के बारे में भी लिखा है. दिल्ली के कई पीढ़ियों के लोगों के लिए, जिमखाना बस उनके बड़े होने का एक हिस्सा था, कोई खास बात नहीं, फिर भी प्यारा और ऐसा जिसकी जगह कोई और नहीं ले सकता. ठीक वैसे ही, जैसे सिर्फ वही जगहें होती हैं, जिन्हें हम हमेशा से अपना ही मानते आए हैं.

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पिछले 55 वर्षों से इस क्लब के सदस्य रहे रिटायर आर्मी मेजर अतुल देव ने 'फाइनेंशियल टाइम्स' को बताया कि वे हर सुबह पुराने सदस्यों को यहां ब्रिज खेलने आते देखते हैं, जो शाम तक वहीं रुकते हैं और फिर अपना रात का खाना पैक कराकर घर लौट जाते हैं. इस दृश्य में वाकई एक बेहद मासूम और भावुक कर देने वाली बात है. राजनीतिक तौर पर जिमखाना चाहे जो भी रहा हो, लेकिन बहुत से लोगों के लिए यह सिर्फ एक क्लब नहीं, उनका 'घर' था. यह बात स्वीकार की जानी चाहिए और फिर, इसे एक तरफ रख दिया जाना चाहिए. 

नए भारत में कोई जगह नहीं

जो भारत आज उभर रहा है कमियों से भरा, अक्सर उथल-पुथल वाला और कभी-कभी अपने ही ढंग से सत्तावादी. वह औपनिवेशिक दौर के सामाजिक ढांचे को सहेजने के लिए बिल्कुल भी बाध्य नहीं है. सिर्फ इसलिए कि इसके कुछ बाशिंदों को इस ढांचे से प्यार हो गया था. देश की राजधानी के ठीक दिल में स्थित सरकारी जमीन, जिसे 1928 से नाममात्र की कीमत पर स्थायी लीज पर दिया गया था, उसे अनिश्चितकाल के लिए 15,000 विशेषाधिकार प्राप्त परिवारों की निजी जागीर नहीं रहने दिया जा सकता. कम से कम उस देश में तो कतई नहीं, जहां उन चमचमाते लॉन से महज कुछ किलोमीटर की दूरी पर लोग आज भी पानी के लिए कतारों में खड़े होते हैं.

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यह सच है कि जिमखाना के इस अंत का तरीका कुछ दागदार है. कुछ लोगों का कहना है कि भारत की सत्तारूढ़ पार्टी, बीजेपी ने इस पर पूरी तरह कब्जा कर लिया है. लेकिन इस कब्जे का लोकतांत्रिक सिद्धांतों से उतना लेना-देना नहीं है. जितना कि एक एलीट वर्ग के खेल के मैदान को हटाकर उसकी जगह दूसरे वर्ग को बिठाने से है. साल 2023 में प्रधानमंत्री का जैतून-हरे कुर्ते में वहां एक शादी के रिसेप्शन में शामिल होना कोई क्रांति नहीं है. जब सत्ता किसी विशेषाधिकार को बेदखल करती है, तो वह शायद ही कभी परोपकार की भावना से ऐसा करती है.

लेकिन कोई चीज़ कैसे खत्म होती है, यह सवाल इस बात से बिल्कुल अलग है कि क्या उसे खत्म होना ही चाहिए था. 'लेडी विलिंगडन स्विमिंग बाथ' आज भी चमक रहा है. लांटाना की झाड़ियां आज भी हवा में डोल रही हैं. ताश खेलने वाले अपने बैठने के लिए कोई और ठिकाना ढूंढ ही लेंगे और यह दिल्ली जो बेलगाम है, कई परतों में सिमटी है और लगातार अपनी धुन में रहती है. इस सब कुछ को वैसे ही निगल जाएगी, जैसे उसने इतिहास के हर उस साम्राज्य को निगल लिया, जिसने संगमरमर पर अपना नाम छोड़ने की कोशिश की थी.

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जिमखाना बहुत कुछ था: गुलामी की बची हुई निशानी, सामाजिक हैसियत बढ़ाने की सीढ़ी, एक दूसरा घर और एक रसूख का प्रतीक, लेकिन जो वह कभी नहीं था, और कभी हो भी नहीं सकता था, वह था 'स्थायी'. दिल्ली में कुछ भी स्थायी नहीं है.

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