कोकरोच 32 करोड़ साल से इस धरती पर है. यह न्यायमूर्ति सूर्यकांत के बयान से कहीं ज्यादा भयानक चीजों से बच निकला है. यह डायनासोर से भी बच निकला. तो चलिए शुरू से शुरू करते हैं. शब्द से ही.
Cockroach शब्द स्पेनिश 'कुकराचा' (cucaracha) से आया है. अंग्रेजों ने कुकराचा सुना, समझ नहीं आया, और जो अंग्रेज नहीं समझते, उसके साथ वही करते हैं- उसे टुकड़ों में बांट दिया, अपना बना लिया. 'कुका' बन गया 'कॉक'. 'राचा' बन गया 'रोच'. कॉकरोच. ये और बात है कि अंग्रेजी दुनिया की महिलाएं ही इस नामकरण से असहज रही हैं, खासतौर पर उसके अगले आधे हिस्से से. इसलिए वे सिर्फ 'रोच' शब्द से ही काम चलाती आईं. यह बोलने-सुनने में ज्यादा बेहतर लगता है.
वैज्ञानिक अलग हैं. उन्होंने इसके पूरे समूह का नाम 'ब्लैटोडिया' (Blattodea) रखा, जो लैटिन शब्द 'ब्लाट्टा' से आता है. जिसका मतलब है- वह कीड़ा जो रोशनी से भागता है. वह कीड़ा जो रोशनी से भागता है. इस अर्थ को को याद रखिए. हम फिर लौटेंगे इस पर.
हिंदी में कोकरोच को तिलचट्टा या तेलचट्टा कहते हैं. मुझे नहीं पता कि यह तिल के बीज चाटता है या तेल, इसलिए दो नाम हैं. मेरी दादी इसे तेलचट्टा कहकर अपनी नीली चप्पल से दे मारती थीं. इस शब्द में एक खूबसूरत-कुरूप लय है. यह शब्द बिल्कुल वैसा ही लगता है जैसा वह कीड़ा है. कुछ ऐसा जिसे आप संभ्रांत लोगों के बीच जोर से कहना पसंद नहीं करेंगे. इस शब्द में कोई गरिमा नहीं है, और इसे इसका अफसोस भी नहीं.
भारत के मुख्य न्यायाधीश जस्टिस सूर्यकांत जब 'कॉकरोच' का जिक्र कर रहे थे तब वह उसकी एटिमोलॉजी (शब्दों के मूल यानी उसके इतिहास) के बारे में नहीं सोच रहे थे. वे नए जमाने के वकीलों के बारे में सोच रहे थे जो कोर्ट का समय बर्बाद करने के लिए अवमानना याचिका दाखिल करते हैं, अदालत के गलियारों में बिना किसी काम के इधर-उधर दौड़ते रहते हैं. ठीक उन जीवों की तरह जो अंधेरा होने पर निकलते हैं. उन्होंने कहा कि ये युवा कोकरोच जैसे हैं. कुछ मीडिया बन जाते हैं. कुछ RTI एक्टिविस्ट बन जाते हैं. कुछ सोशल मीडिया पर सक्रिय हो जाते हैं. उनके हिसाब से सब pests हैं.
कंट्रोल, जस्टिस, कंट्रोल.
लेकिन खुद पर कंट्रोल तो उदय शेट्टी कर सकते हैं, चीफ जस्टिस सूर्यकांत नहीं कर सके. वे आगे बोलते गए. और बालते-बोलते CJI ने अनजाने में CJP को जन्म दे दिया. सारी प्रसव पीड़ा BJP को झेलनी पड़ी है.
अभिजीत दीपके. बोस्टन में रहने वाले बेरोजगार युवा. AAP के करीब विचारों वाले और केजरीवाल स्कूल ऑफ इश्यू-स्पॉटिंग के छात्र. जो कोई भी समझदार मौकापरस्त करता, दीपके ने वही किया. उन्होंने कॉकरोच वाले कथित 'कलंक' को उठाया, झाड़ा, और बैनर पर चढ़ा दिया. रातोंरात कॉकरोच जनता पार्टी बन गई. एक हफ्ते में मीम मूवमेंट शुरू हो गया. भारत के युवा, जो वैश्विक प्रोटेस्ट की भाषा समझते हैं, अपना 'Je suis Charlie' (चार्ली हेब्दो शूटिंग के बाद शुरू हुआ 'मैं भी चार्ली हूं' मूवमेंट) वाला पल पा गए. गर्व से कहो 'मैं भी तिलचट्टा'. इस पर AI से इंस्टाग्राम रील बनाओ, जिसके बैकग्राउंड में ट्रेंडिंग एंथम हो.
CJP और इसका मेनिफेस्टो वाकई दिलचस्प है. व्यंग्य की नजर से देखें तो यह बहुत अच्छी तरह से बनाया गया है, सटीक है और निशाने पर लगता और साफ असर छोड़ता है. लेकिन राजनीतिक आंदोलन के रूप में इसका वजूद आपके किचन के तिलचट्टे के बराबर ही है- सामने आने पर डर लगता है, पूरी तरह नजरअंदाज नहीं कर सकते, लेकिन आखिरकार रहता सिंक के पीछे वाले पाइप में ही है. ये एक गंभीर बीमारी है- Katsaridaphobia. यह कोकरोचों को लेकर डर है. बेमतलब सही, लेकिन दिल तेज धड़कने लगता है और इंसान कूदने लगता है. BJP के साथ भी यही हुआ, जो इस मीम कैंपेन का टारगेट थी. पार्टी ने घबरा कर प्रतिक्रिया देने लगी. पार्टी इतनी अनुभवी है कि इस मीम कैंपेन की गंभीरता को राजनीतिक विकल्प के रूप में समझ पाए, लेकिन नैरेटिव बदलने को लेकर वह जी जान से जुट गई. इंस्टाग्राम पर जब कुछ युवा इसे क्रांतिकारी सिंबल मानने लगे, तो BJP ने अपनी नीले तले वाली चप्पल निकाल ली. इससे जरूरत से ज्यादा हलचल मच गई.
तिलचट्टा को क्रांतिकारी प्रतीक बनाने में समस्या बहुत है. जैसा कि साइंटिफिक क्लासिफिकेशन में साफ-साफ परिभाषित कर दिया गया है कि वह एक कीड़ा है जो रोशनी से भागता है. मार्च नहीं करता. यह दरबार स्क्वायर नहीं घेरता. यह फ्रांसीसी क्रांति की तरह बस्तील (किले) पर हमला नहीं करता और न ही राष्ट्रपति भवन की घेराबंदी करता है. तिलचट्टा छिप कर रहता है. इंतजार करता है. जब लगता है कि कोई देख नहीं रहा, तब निकलता है, किनारों और कोनों से. जो चाहिए ले लेता है. और जैसे ही लाइट जलती है, गायब हो जाता है. यह इसके सर्वाइवल की शानदार रणनीति है. लेकिन क्रांति की रणनीति के रूप में बहुत खराब है.
बांग्लादेश, नेपाल, श्रीलंका की तुलना की जा रही है. बड़े उत्साह से की जा रही है. उन लोगों द्वारा जो बहुत चाहते हैं कि भारत अगला चैप्टर बने. वे गलत हैं, और वजह यह है:
बांग्लादेश में कोटा रिफॉर्म आंदोलन सूखी लकड़ी में चिंगारी की तरह था, लेकिन महत्वपूर्ण बात यह थी कि सारी लकड़ी एक समान सूखी थी. पूरे इलाके में एक समान तापमान पर जल रही थी. श्रीलंका में दुख सबके लिए समान और लोकतांत्रिक था. जाफना वाला लंकाई और कोलंबो में रह रहा लंकाई दोनों अपनी जेब में एक साथ एक ही संकट महसूस कर रहे थे. जब पूरे देश पर एक ही आसमान और एक ही आफत हो, तब एक समान विद्रोह हो सकता है.
भारत में 4,000 प्रजातियों के कोकरोच हैं. यह कोई रूपक नहीं है. और है भी.
1997 से 2012 के बीच जन्मे लोगों को Gen Z कहा जाता है, जैसे कि इस 15 साल के बीच जन्म लेने वाले समकालीन के साथ समान भी हो गए हों. सन् 2000 में साउथ दिल्ली में जन्मा लड़का और उसी साल बांका जिले के कुम्हरतारी में जन्मा लड़का. दोनों एक ही साल की पैदाइश, लेकिन उनके बीच साझा कुछ भी. दिल्ली वाला लड़का AI के अपने डेस्क जॉब छिन जाने की चिंता करता है और सोचता है कि उसके माता-पिता LGBTQ+ इशूज़ के प्रति कितने संवेदनशील हैं. उधर, बांका वाले लड़के की महत्वाकांक्षा बहुत मामूली है कि उसे अपराध की जिंदगी न जीनी पड़े. दोनों के बीच सिर्फ भूगोल नहीं का अंतर नहीं है. वक्त का भी है. बारह सौ किलोमीटर और करीब बीस साल का फर्क.
बांका के छोटे कस्बे में उसी साल जन्मी लड़की दिल्ली वाले लड़के से 30 साल पीछे है. बांका के कुम्हरतारी ब्लॉक के गांव में जन्मी लड़की तो सौ साल पीछे है. उसके भारत को तो अभी आजादी भी नहीं मिल पाई है.
जब आप 2026 में छतरपुर से 6 किलोमीटर आगे जाते हैं, तो आप गुरुग्राम पहुंच जाते हैं, जो 2036 में जी रहा है. फिर 20 किलोमीटर दक्षिण की ओर नूह के पास एक गांव में जाएंगे, तो पता चलेगा कि आप 18वीं सदी में पहुंच गए हैं. इस देश में सड़क पर चलना आपको टाइम ट्रैवेल करा सकता है.
भारत में टाइम इसी तरह काम करता है. यह जमीन से कटकर नहीं चलता.
इनमें से बहुत से युवाओं को BJP से कोई लगाव नहीं है. बहुत से वे हैं जिन्हें उनके आलोचक 'भक्त' कहते हैं और सपोर्टर 'समर्थक' मानते हैं. बहुत से इतने चुप हैं कि उनकी राजनीतिक क्षितिज पर अलग से कोई पहचान ही नहीं दिखती. क्योंकि उनकी आवाज सिर्फ अपनी होती है और वे सर्वाइवल की एक बेहद व्यावहारिक जद्दोजहद में व्यस्त हैं. बांका की लड़की बांका में ही रीलें बनाकर खुश है. भागलपुर के लड़के का राजनीतिक गणित लोकल है, बोस्टन ग्रेजुएट की मीम पार्टी से बिल्कुल अलग. बेंगलुरु का लड़का अपनी स्टार्टअप फंडिंग सूख जाने पर फ्रस्ट्रेशन में है और एक ग्लोबल प्रॉब्लम के लिए सरकार को दोष दे रहा है, जो ट्रंप की पैदावार है.
तकनीकी रूप से ये सभी Gen Z हैं. लेकिन व्यवहारिक रूप से देखें तो वे एक ही पीढ़ी में जन्मे भारतीयों की अलग-अलग पीढ़ियां हैं.
कॉकरोच जनता पार्टी की प्रतिभा और उसकी सीमा एक ही चीज है. वह BJP-विरोध, बिना किसी और पक्ष के. जो कि मीम मूवमेंट के लिए तो कमाल है लेकिन सत्ता चलाने के लिए बेहद खराब. यह लोगों को किसी साझा विजन के इर्द-गिर्द नहीं, बल्कि साझी नाराजगी के इर्द-गिर्द जोड़ता है. ट्रेंडिंग हैशटैग के पीछे चलने वालों के लिए तो यह एक अच्छा रॉ मटेरियल है, लेकिन जो किसी आंदोलन के लिए कहीं जाना चाहता हो, उसे कोई नेविगेशन नहीं सुझाता.
BJP, कांग्रेस या यहां तक कि AAP, उनके जो भी गुण हों. उनमें एक महाशक्ति भी है. इस महाशक्ति को इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ता कि सरकार क्या कर रही है या नहीं कर रही है. ये पार्टियां बांट सकती हैं- जाति, धर्म, क्षेत्र या भाषा में. हमारे राजनीतिक दल फॉल्टलाइन्स (दरारों) के उस्ताद कारीगर हैं. लेकिन, CJP के सपोर्ट ग्रुप में अपनी नाराजगियों को लेकर ही कमाल की विविधता है. जो कि राजनीतिक दलों के सुपरपावर के लिए खुला निमंत्रण है. आपको तिलचट्टों को हराने की जरूरत नहीं है. आपको सिर्फ लाइट जला देनी है.
और लाइट पहले ही जलने लगी है.
एक सावधानी की बात: भारत के युवा काफी समय से अंधेरी गली में चल रहे हैं. भारत को छत तोड़कर कुछ रोशनी अंदर आने देनी होगी. वैश्विक आर्थिक संकट के बावजूद, विकास की कहानी को और व्यापक बनाना होगा, NEET जैसे एग्जाम साफ-सुथरे होने चाहिए, और पूरी पीढ़ी को वह नई सुबह दिखनी चाहिए, जिसका लंबे समय से वादा किया गया था. उनके लिए जरूरी मुद्दों पर स्पॉटलाइट डालिए, राजनीति से ज्यादा.
तिलचट्टे को याद रखिए, वो ब्लाट्टा है. वह कीड़ा जो रोशनी से भागता है. जैसे ही इस रसोई में रोशनी जलती है, बिखरना शुरू हो जाएगा. हर तिलचट्टा अपने-अपने कोने, अपनी अलमारी, अपने सिंक के पाइप, अपनी स्थानीय चिंता, अपनी खास तकलीफ में वापस लौट जाएगा. कुछ वास्तविक विपक्षी पार्टियों में रास्ता बना लेंगे और वहां कुछ उपयोगी काम करेंगे. कुछ बस घर चले जाएंगे. बोस्टन ग्रेजुएट भी अपनी कामयाबी पर खुश होगा. मीम पुरानी हो जाएगी. और भारत आगे बढ़ना जारी रहेगा, जैसा हमेशा से करता आया है. बहुत बड़ा, बहुत विविध और फिर किसी और के 'शेड्यूल' पर फट पड़ने की जिद पर अड़ा हुआ.
(इंडिया टुडे वेबसाइट पर प्रकाशित लेख का अनुवाद)
कमलेश सिंह