ममता को छोड़ बीजेपी के ल‍िए आसान और जरूरी 'टार्गेट' क्‍यों बनते जा रहे हैं अभ‍िषेक बनर्जी

चुनाव कैंपेन खत्म हो गया है, लेकिन ममता बनर्जी और अभिषेक बनर्जी के खिलाफ बीजेपी की मुहिम जारी है. चुनावों की ही तरह बीजेपी ममता बनर्जी के मुकाबले अभिषेक बनर्जी को ही ज्यादा टारगेट कर रही है, ताकि टीएमसी नेता को सहानुभूति न मिलने पाए. अभिषेक बनर्जी की मुश्किल है कि पहले निशाने पर थे, अब शिकार होने लगे हैं.

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तृणमूल कांग्रेस नेता ममता बनर्जी, अभिषेक बनर्जी और पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी. (Photo: PTI) तृणमूल कांग्रेस नेता ममता बनर्जी, अभिषेक बनर्जी और पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी. (Photo: PTI)

मृगांक शेखर

  • नई दिल्ली,
  • 21 मई 2026,
  • अपडेटेड 2:07 PM IST

अभिषेक बनर्जी चुनावों के दौरान बीजेपी के निशाने पर सबसे ऊपर हुआ करते थे, अब तो शिकार होने लगे हैं. 2021 के पश्चिम बंगाल चुनाव में बीजेपी नेता जेपी नड्डा अभिषेक बनर्जी को भ्रष्टाचार के राजकुमार की तरह वैसे ही पेश कर रहे थे, जैसे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी उससे ठीक पहले वाले बिहार चुनाव में तेजस्वी यादव को 'जंगलराज का युवराज' कह रहे थे. 

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लेकिन, ममता बनर्जी के प्रति बीजेपी 2026 में 2021 के विधानसभा चुनाव के मुकाबले थोड़ी सावधानी बरत रही थी. 2021 में तो प्रधानमंत्री मोदी के 'दीदी-ओ-दीदी' कहने को तृणमूल कांग्रेस ने मुद्दा बना दिया था, और लोगों की सहानुभूति ममता बनर्जी की तरफ चली गई. तृणमूल का आरोप है कि 2026 के चुनाव में अमित शाह ने 'ऐ दीदी' बोलकर ममता बनर्जी का अपमान किया है, लेकिन उसका कहीं कोई असर नहीं दिखा.  

बल्कि, अमित शाह ने 'भाइपो का राज' बताकर नैरेटिव को अलग रास्ते पर मोड़ दिया. चुनाव कैंपेन में समझाते रहे कि अगर टीएमसी को वोट मिला, तो भतीजा राज करेगा. पिछली बार तो नहीं, लेकिन लोग इस बार समझ गए. और, पांच साल बाद ही सारे समीकरण बदल डाले.

सत्ता 'परिवर्तन' के बाद बहुत कुछ बदल चुका है. बीजेपी तृणमूल कांग्रेस महासचिव अभिषेक बनर्जी के खिलाफ काफी आक्रामक हो गई है. ममता बनर्जी को छोड़कर बीजेपी अब अभिषेक बनर्जी पर ही फोकस कर रही है. 

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अभिषेक और उनके करीबियों पर श‍िकंजा

शांतिनिकेतन, 188 A, हरीश मुखर्जी रोड - यह तृणमूल कांग्रेस महासचिव और ममता बनर्जी के भतीजे अभिषेक बनर्जी के घर का पता है. कोलकाता नगर निगम में घर पर नोटिस चिपका दिया है. नोटिस में कहा गया है कि घर में कई अवैध निर्माण किए गए हैं. अवैध निर्माण गिराने के लिए 7 दिन की मोहलत दी गई है. अगर अभिषेक बनर्जी निर्धारित अवधि में जरूरी उपाय नहीं करते, तो नगर निगम अवैध निर्माण को बुलडोजर से ध्वस्त कर देगा. 

यह घर कोलकाता नगर निगम की तरफ से जारी उन 17 संपत्तियों में शुमार है, जिनके अनधिकृत हिस्से को गिराने को कहा गया है, और नोटिस जारी किया गया है. बीजेपी की तरफ से डायमंड हार्बर से सांसद अभिषेक बनर्जी से जुड़ी 43 संपत्तियों की सूची अलग से जारी की है. 

सूत्रों के हवाले से आई खबर के मुताबिक, टीएमसी विधायकों की बंद कमरे में हुई एक बैठक में अभिषेक बनर्जी ने कहा, वे जो चाहें करें... वे मेरा घर गिरा दें, मुझे नोटिस भेजें. मैं किसी भी हालत में उनके सामने नहीं झुकूंगा... बंगाल ने पहले कभी ऐसी मानसिकता वाला मुख्यमंत्री नहीं देखा है.

बीते कई साल में शांतिनिकेतन को लेकर कई तरह की अफवाहें फैली हुई हैं. कुछ लोगों का दावा रहा है कि घर के अंदर एस्केलेटर है. कुछ लोग तो घर में सोने के नल लगे होने का दावा करते हैं. कहा जाता है कि विदेशी संगमरमर का इस्तेमाल हुआ है. हालात बदल चुके हैं. लिहाजा लोगों की बातें भी. एक स्थानीय व्यक्ति का कहना था, 'यह सिर्फ एक घर नहीं है, यह एक युग का प्रतीक है... और आज लोग महसूस कर रहे हैं कि यह सड़क जनता की हो गई है.'

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1. टीएमसी महासचिव अभिषेक बनर्जी की 17 संपत्तियों की जांच हो रही है, जिसे लेकर नगर निगम ने नोटिस जारी किया है. नगर निगम के अधिकारियों ने संकेत दिए हैं कि डायमंड हार्बर सांसद की अवैध संपत्तियों पर बुलडोजर भी चलाया जा सकता है.

2. अभिषेक बनर्जी की प्रॉपर्टी, और उनके करीबी लोगों पर श‍िकंजा कसने लगा है. बीजेपी ने जो संपत्तियां सार्वजनिक की हैं, उनमें कई अभिषेक बनर्जी के परिवार के सदस्यों और करीबी लोगों के साथ संयुक्त मालिकाना हक वाली बताई जाती हैं. ऐसी संपत्तियां अभिषेक बनर्जी के साथ साथ अमृता बनर्जी, सबिता बनर्जी, मिनाती बनर्जी, बाणानी बनर्जी और सायोनी घोष के साथ संयुक्त स्वामित्व वाली बताई गई हैं.

संपत्तियों वाली बीजेपी की सूची में शामिल एक नाम सायोनी घोष का भी है, जो चुनावों के दौरान अपने तीखे भाषण ममता बनर्जी जैसे पहनावे को लेकर काफी चर्चित थीं. सायोनी घोष ने अपनी सफाई में सोशल साइट X पर लिखा है, 'कुछ फॉरवर्ड मैसेज देखे कि अभिषेक बनर्जी और सायोनी घोष के नाम से संयुक्त रूप से 19 डी 7, टैंक्स रोड, कोलकाता 700030 की एक प्रॉपर्टी है, जिसमें संपर्क के लिए कोई मोबाइल नंबर नहीं दिया गया है. मैं नहीं कह सकती कि यह कौन है, लेकिन यह निश्चित रूप से वह सायोनी घोष नहीं है जो साधारण पृष्ठभूमि से आई है, और अब तक राजनीति से कोई अचानक मुनाफा नहीं कमाया है. लोगों ने मुझे बस आशीर्वाद दिया है, और मैं उसके लिए आभारी हूं. मैं चाहती हूं कि मेरे मतदाता जान लें कि मेरी संपत्तियां चुनावी हलफनामे में घोषित की गई हैं. रिकॉर्ड चेक कर लें. जो लोग बिना किसी सबूत के मुझे बदनाम करने की कोशिश कर रहे हैं - अब रुक जाएं! कृपया जान लें, मैं एक इंच भी पीछे नहीं हटूंगी. मैं बर्दाश्त नहीं करूंगी. फेक न्यूज फैलाने के लिए कानूनी कार्रवाई की जाएगी.'

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कोलकाता नगर निगम पर तृणमूल कांग्रेस का ही कब्जा है. मेयर भी टीएमसी के ही हैं, फिरहाद हकीम. लेकिन, फिरहाद हकीम का कहना है कि नोटिस के बारे में उनको कोई जानकारी नहीं है. फिरहाद हकीम का कहना है कि नोटिस मेयर की सहमति से जारी नहीं किए जाते हैं. नोटिस जारी करने, और प्रशासनिक कार्रवाई की जिम्मेदारी नगर निगम आयुक्त के अधिकार क्षेत्र में आती है. 

तृणमूल कांग्रेस की प्रेस कॉन्फ्रेंस में फिरहाद हकीम ने कहा, जो सूची सोशल मीडिया पर फैलाई जा रही है, पहले उसकी जांच होनी चाहिए. मेयर एक पॉलिसी मेकर होता है, जबकि नगर निगम आयुक्त प्रशासनिक और कार्यान्वयन संबंधी फैसले लेते हैं. मेयर के पास ऐसे मामलों में कोई विशेषाधिकार या प्रत्यक्ष अधिकार नहीं होता.

टीएमसी का भव‍िष्‍य, ममता की कमजोरी

देखा जाए तो अभ‍िषेक बनर्जी ही तृणमूल कांग्रेस का भव‍िष्‍य हैं, और ममता बनर्जी की कमजोरी भी. ममता बनर्जी ने बहुत पहले ही अपना राजनीतिक उत्तराधिकारी चुन लिया था, और संगठन के साथ साथ टीएमसी सरकार में भी अभिषेक बनर्जी की हनक महसूस की जाती रही है. 

1. तृणमूल कांग्रेस में ममता बनर्जी के बाद सेकंड-इन-कमांड माने जाने वाले अभिषेक बनर्जी को पार्टी के लोग ‘सेनापति’ यानी कमांडर भी कहते हैं. ममता बनर्जी की हर मीटिंग में अभिषेक बनर्जी उनके साथ बगल में बैठते हैं.

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2. उम्र के 72वें साल में पहुंच चुकीं ममता बनर्जी फिर से लड़ाई की बात कर रही हैं. ममता बनर्जी के स्ट्रीट फाइटर के अंदाज में तो कोई कमी नहीं आई है, लेकिन उम्र का असर तो स्वाभाविक भी है. ऐसे में अभिषेक के अलावा कोई और नहीं नजर आता, जिस पर ममता बनर्जी भरोसा कर सकें - और यह ममता बनर्जी की सबसे बड़ी कमजोरी भी है. विधानसभा में सत्ताधारी विपक्ष से मुकाबले के लिए भी ममता बनर्जी ने अपनी सबसे भरोसेमंद टीम को तैनात कर दिया है, लेकिन बाहर और सड़क के लिए चुनौती बनी हुई है. 

3. अभिषेक बनर्जी के रूप में ममता बनर्जी के पास सेनापति तो है, लेकिन सैनिक धीरे धीरे बिखरने लगे हैं. सेनापति के खिलाफ आवाज उठने लगी है, और बगावती तेवर महसूस किए जा रहे हैं. कई सीनियर नेता तो खुलकर कहने लगे हैं कि पहले की तरह अब वे चुप नहीं रहेंगे, और नेतृत्व को चुप होकर उनकी बातें भी सुननी पड़ेंगी.

4. ममता बनर्जी के 2011 में मुख्यमंत्री बनने के बाद अभिषेक बनर्जी को टीएमसी के यूथ विंग का अध्यक्ष बनाया गया था. और, 2021 में चुनावी जीत के बाद प्रशांत किशोर की सलाह पर तृणमूल कांग्रेस का महासचिव बनाया गया था. चुनावी राजनीति की शुरुआत 26 साल की उम्र में अभिषेक बनर्जी ने 2014 में डायमंड हार्बर लोकसभा सीट से की थी, फिलहाल वहीं से सांसद हैं. 

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5. अभिषेक बनर्जी ने ममता बनर्जी की तरह संघर्ष वाली राजनीति नहीं की है. जेड प्लस सुरक्षा वापस लिए जाने के बाद अभिषेक बनर्जी ने खुद को अपने घर और ममता बनर्जी के आवास तक समेट लिया है. अभिषेक बनर्जी आधुनिक, मैनेजमेंट आधारित और रणनीतिक राजनीति में ज्यादा यकीन रखते हैं. अभिषेक बनर्जी का ज्यादा फोकस संगठन, डिजिटल रीच, युवा नेतृत्व और योजनाबद्ध चुनाव प्रबंधन पर रहता है.

बीते दिनों ममता बनर्जी और अभिषेक बनर्जी के बीच कई मुद्दों पर असहमति की खबरें भी आ चुकी हैं. माना यह भी जाता है कि तृणमूल कांग्रेस के काफी नेता अभिषेक बनर्जी के काम करने के तौर तरीके से नाराज रहते हैं. शुभेंदु अधिकारी ने भी 2021 के चुनाव से पहले टीएमसी छोड़ने के पीछे यही वजह होने के संकेत दिए थे - ममता बनर्जी की मजबूरी कहें या कमजोरी, पार्टी का भविष्य भी उनको अभिषेक बनर्जी में ही दिखाई देता है. 

बीजेपी के लिए अभ‍िषेक बेहतर टारगेट

ममता बनर्जी के बहुत सारे साथियों पर भ्रष्टाचार के आरोप लगे हैं. कई नेताओं को तो भ्रष्टाचार के आरोप में जेल भी जाना पड़ा है. पार्थ चटर्जी को तो जब प्रवर्तन निदेशालय ने गिरफ्तार किया वो ममता बनर्जी के कैबिनेट साथी थे. 2016 के बंगाल चुनाव से पहले तो एक स्टिंग ऑपरेशन में ममता बनर्जी के कई साथियों पर गंभीर आरोप लगे थे, लेकिन ममता बनर्जी ने सारे आरोपों को खारिज करते हुए चुनाव भी लड़ाया और कुछ को बाद में मंत्री भी बनाया था. 

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सारी बातों के बावजूद ममता बनर्जी की बेदाग छवि अब भी बरकरार है, लिहाजा बीजेपी उनको टारगेट करके सहानुभूति का लाभ नहीं लेने देना चाहती है. चुनावों के दौरान भी बीजेपी ने ऐसी ही रणनीति अपनाई थी, और सारे आरोप और हमले अभिषेक बनर्जी अकेले झेल रहे थे. ममता बनर्जी पर गड़बड़ियों को संरक्षण देने का आरोप जरूर लगाया गया. 

अभिषेक बनर्जी पहले ही कोयला स्कैम में जांच एजेंसियों के निशाने पर रहे हैं. कई बार पूछताछ भी हो चुकी है. ऐसे में अभिषेक बनर्जी को टारगेट करना बीजेपी के लिए ज्यादा आसान साबित हो रहा है. बीजेपी वही कर भी रही है. वैसे भी बड़ी मुश्किल पार कर लेने के बाद सब कुछ आसान हो जाता है.

अभिषेक के खिलाफ गुस्सा इतना गुस्सा क्यों

दरअसल, ममता बनर्जी और अभिषेक बनर्जी के राजनीतिक बयानों में अनुभव का अंतर है. ममता बनर्जी खुलेआम चेतावनी देती रही हैं लेकिन उसके पीछे राजनीतिक शब्दावली हुआ करती थी जबकि अभिषेक बनर्जी अपने चुनावी प्रचार में खुलेआम धमकी देते देखे गए. बीजेपी के शीर्ष नेताओं से लेकर शुभेंदु अधिकारी तक के लिए अभिषेक बनर्जी ने खुलेआम धमकी भरे बोल बोले हैं. 4 मई को दोपहर 12 बजे के बाद रवींद्र संगीत के साथ डीजे भी बजेगा वाला बयान बीजेपी कार्यकर्ताओं को खूब खला था. यही नहीं, उन्होंने कई बीजेपी नेताओं को 4 मई को कोलकाता में रहने चुनौती तक दे डाली थी. ये पहली बार नहीं है जो अभिषेक इस तरह की बयानबाजी कर रहे थे. इससे पहले उन्होंने पूर्व मिदिनापुर जाकर एक रैली में अधिकारी परिवार को भी इसी अंदाज में ललकारा था. उसी के बाद शुभेंदु ने बयान दिया था कि भाइपो को जेल भेजकर रहेंगे. 

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