उसे आधुनिक युग की सावित्री कहा जाता है! 'सम्पा: विश्वास, धैर्य और संकल्प की अनूठी दास्तान' का लोकार्पण

कौन कहता है कि इतिहास हमेशा बड़े लोग ही लिखते हैं, कई बार यह किसी आम इनसान के असाधारण साहस द्वारा भी लिखा जाता है. राजधानी का इंडिया इंटरनेशनल सेंटर ऐसी ही एक शाम का गवाह बना. यह शाम 'सम्पा' के नाम रही. 'सम्पा: विश्वास, धैर्य और संकल्प की अनूठी दास्तान'

Advertisement

जय प्रकाश पाण्डेय

  • Noida,
  • 08 जुलाई 2026,
  • अपडेटेड 10:00 PM IST

कौन कहता है कि इतिहास हमेशा बड़े लोग ही लिखते हैं, कई बार यह किसी आम इनसान के असाधारण साहस द्वारा भी लिखा जाता है. राजधानी का इंडिया इंटरनेशनल सेंटर ऐसी ही एक शाम का गवाह बना. यह शाम 'सम्पा' के नाम रही. सम्पा, एक किताब, सम्पा एक  कहानी, सम्पा एक किरदार...  'सम्पा: विश्वास, धैर्य और संकल्प की अनूठी दास्तान', जो एक किताब भर नहीं, बल्कि एक ज़िंदा अनुभव है. यह एक ऐसी महिला की कहानी है, जो विश्वास, धैर्य और अटूट संकल्प की मिसाल पेश करती है. वेस्टलैंड बुक्स ने मीनाक्षी चौधरी और संजीव पालीवाल द्वारा संयुक्त रूप से लिखी पुस्तक 'सम्पा: विश्वास, धैर्य और संकल्प की अनूठी दास्तान' का लोकार्पण  समारोह आयोजित किया तो पुस्तक की मुख्य किरदार सम्पा सहित साहित्य, शिक्षा, मीडिया, प्रशासन और समाज की कई प्रमुख हस्तियां इसमें शामिल हुईं.

Advertisement

लोकार्पण  समारोह में शामिल वक्ताओं ने एक स्वर में इस बात पर ज़ोर दिया कि 'सम्पा' आज के समय में महिला सशक्तीकरण की एक बेहद ज़रूरी और प्रासंगिक आवाज़ है.आज तक एवं इंडिया टुडे टीवी के न्यूज़ डायरेक्टर सुप्रिय प्रसाद ने कहा, "संजीव पालीवाल ने क्राइम फिक्शन की दुनिया से निकलकर एक सच्ची ज़िंदगी की कहानी को शब्द दिए हैं. यह किताब हर लड़की और हर महिला को पढ़नी चाहिए. यह किताब सिर्फ पढ़ने के लिए नहीं है, बल्कि यह हिम्मत देने वाली किताब है- यह एहसास दिलाती है कि साधारण दिखने वाली एक लड़की भी असाधारण संघर्ष कर सकती है और अपने लिए रास्ता बना सकती है." मजाकिया अंदाज़ में उन्होंने कहा कि सम्पा को इतनी लंबी लड़ाई इसलिए लड़नी पड़ी कि वे अपने संघर्ष के दिनों में 'आज तक' के पास नहीं आईं. अगर वे आज तक के पास आतीं, तो उन्हें इतनी लंबी लड़ाई न लड़नी पड़ती.

Advertisement

इंडिया टुडे टीवी  के कंसल्टिंग एडिटर राजदीप सरदेसाई ने बदलते वर्तमान समय में मीडिया के बदलते परिदृश्य का ज़िक्र करते हुए कहा, “एक समय था जब टेलीविजन पर मानवता और इनसानी जीवन से जुड़ी कहानियों की प्रमुखता होती थी, लेकिन आज वो कम हो गई हैं. 'सम्पा' ऐसी ही एक कहानी है, जो हमें उस दौर की याद दिलाती है. यह सिर्फ किताब तक सीमित नहीं रहनी चाहिए.इसे ओटीटी और बड़े प्लेटफॉर्म पर भी आना चाहिए, ताकि यह प्रेरणा अधिक से अधिक लोगों तक पहुंचे."

कार्यक्रम का संचालन करते हुए मॉडरेटर ऋचा अनिरुद्ध ने 'सम्पा' को एक भावनात्मक अनुभव बताया. उन्होंने कहा कि इस किताब को पढ़ते हुए वे कई बार भीतर तक हिल गईं, लेकिन अंत तक पहुँचते-पहुँचते उनके भीतर एक नई ऊर्जा और साहस का संचार हुआ. उन्होंने 'सम्पा' के साहस और लेखकद्वय मीनाक्षी चौधरी एवं संजीव पालीवाल को इस कहानी को सामने लाने के लिए बधाई दी.

लेखिका मीनाक्षी चौधरी ने अपने लेखकीय अनुभव को साझा करते हुए कहा, “यह मेरी पहली पुस्तक है और इसे लिखना मेरे लिए एक भावनात्मक यात्रा रही. मैंने इसे अपने छात्रों को भी पढ़ने के लिए कहा है, क्योंकि यह उन्हें सिखाएगी कि परिस्थितियाँ चाहे जितनी कठिन हों, अगर साहस है तो रास्ता जरूर निकलता है."

Advertisement

लेखक संजीव पालीवाल ने कहा, “क्राइम फिक्शन से बाहर निकलकर वास्तविक जीवन की इस कहानी को लिखना मेरे लिए एक अलग और गहरा अनुभव रहा. यह किताब हर उस महिला को समर्पित है, जो विपरीत परिस्थितियों से लड़ते हुए अपने लिए रास्ता बनाती है. इस कहानी को सामने लाना जरूरी था, क्योंकि यह सिर्फ एक व्यक्ति की कहानी नहीं, बल्कि एक सोच है-एक प्रेरणा है."

इस मौक़े पर पुस्तक की जीवंत किरदार सम्पा आर्या ने बेहद भावुक शब्दों में अपनी बात रखी. उन्होंने कहा, “यह किताब मेरी ज़िंदगी के उन पलों का दस्तावेज़ है, जिन्हें मैंने जिया है. यह सिर्फ मेरी कहानी नहीं है, यह हर उस स्त्री की कहानी है, जो हर दिन संघर्ष करती है, गिरती है, फिर उठती है और आगे बढ़ती रहती है."  

कथाकार गीताश्री ने बाद में सोशल मीडिया पर सम्पा की कहानी को मार्खेज की नायिका उर्सुला से जोड़ दिया तो शायर अज़हर इक़बाल ने लिखा, सम्पा एक किरदार भर नहीं है बल्कि हौसले का इस्तेआरा है, ये उस औरत की कहानी है जो टूट सकती थी, बिखर सकती थी, मगर उसने अपने अंदर जगमगाती हुई उम्मीद की किरण को बुझने नहीं दिया. 
'सम्पा' एक हैरान कर देने वाली हक़ीक़त है, जो कहानी का रूप लेकर पाठकों के लिए सोच के नए दरवाज़े खोलती चली जाती है. यह सिर्फ़ एक औरत की कहानी नहीं, बल्कि दर्द से जन्म लेने वाले हौसले की दास्तान है, ये टूट कर दोबारा जुड़ने का अमल है. ये एक ऐसे रास्ते का सफर है, जिसकी पगडंडियों पर दुःख के सिवा  कुछ नहीं है, लेकिन इसकी मंज़िल एक औरत के फ़ौलादी इरादों से हार जाती है. 

Advertisement

ये किताब आईना है उस तहज़ीब का, जहां सावित्री अपने पति की ज़िंदगी के लिए यमराज से टकरा जाती है. ये किताब उन लोगों के लिए है जो सोचना और महसूस करना जानते हैं. 'सम्पा' सिर्फ़ एक किताब नहीं, बल्कि इंसानी जज़्बे, संघर्ष और उम्मीद का ऐसा दस्तावेज़ है जो देर तक अपने क़ारईन के ज़ेहन में अपनी मौजूदगी दर्ज कराता रहेगा. उन्होंने अपने इस शेर से अपनी बात पूरी की -
उम्मीद की किरन के सिवा और कुछ नहीं 
इस घर में रौशनी का यही इंतज़ाम है.

वेस्टलैंड बुक्स की भाषाई इकाई 'एकदा' की प्रकाशक मीनाक्षी ठाकुर ने कहा, "यह रोमांच और संघर्ष की गाथा की तरह लिखी यह सच्ची घटना है-एक स्त्री की कहानी, जिसने सरकारी तंत्र से टकराकर अपने पति को बचाने का संकल्प लिया, जब उसका जहाज़ सोमाली समुद्री डाकुओं द्वारा अपहृत कर लिया गया था. यह दर्शाता है कि आज भी हमारे बीच सावित्री जैसी महिलाएँ मौजूद हैं, जो अपने सत्यवान को मृत्यु के पंजों से वापस लाने के लिए किसी भी हद तक जा सकती हैं."   

कार्यक्रम का संचालन पल्लवी सिंह ने किया. इस अवसर पर प्रोफेसर संगीत रागी, शाज़ी ज़मा, अजीत अंजुम, आशुतोष, मिलिंद खांडेकर, गीता श्री, डॉ सुनीता, वंदना वाजपेयी, रश्मि भारद्वाज, अमिताभ, नीरज गुप्ता, इकबाल रिज़वी, नीरज कुमार, अतुल अग्रवाल, पंकज भार्गव, अज़हर इकबाल, आलोक श्रीवास्तव, आलोक त्रिवेदी, आशुतोष अग्निहोत्री, राजीव कुमार और अकु श्रीवास्तव सहित साहित्य और पत्रकारिता जगत की अनेक हस्तियाँ उपस्थित रहीं.

Advertisement

यह आयोजन केवल एक पुस्तक विमोचन नहीं, बल्कि एक विचार, एक अनुभव और एक प्रेरणा का उत्सव बन गया-जहाँ 'सम्पा' सिर्फ एक नाम नहीं, बल्कि साहस का पर्याय बनकर उभरी. याद रहे कि 'सम्पा' हकीकत से जन्मी एक प्रेरक दास्तान है. वर्ष 2010 की सुबह एक दिन फिरौती से जुड़ी एक फोन कॉल से सम्पा का संसार थम गया. हज़ारों किलोमीटर दूर समुद्र के बीच एक जहाज़ का अपहरण हो गया. उसके साथ बंधक बना लिया गया उसका अपना जीवन, उसकी उम्मीदें, उसका भविष्य.

वह कोई नेता नहीं थी. कोई प्रभावशाली हस्ती नहीं थी. बस एक छोटे शहर की साधारण-सी महिला थी. लेकिन जब पूरी दुनिया ने उसे असहाय समझा, उसने एक ऐसी लड़ाई शुरू की जिसकी कल्पना भी किसी ने नहीं की थी.
समुद्री अपहरणकर्ताओं, सत्ता के गलियारों, अनगिनत बंद दरवाज़ों और टूटती उम्मीदों के बीच उसने हार मानने से इनकार कर दिया. यह कहानी है उस साहस की, जो डर से बड़ा था. उस विश्वास की, जो निराशा से मजबूत था.
और उस संकल्प की, जिसने असंभव को चुनौती देने की हिम्मत की.एक ऐसी सत्य घटना, जो किसी उपन्यास से अधिक रोमांचक, किसी फिल्म से अधिक भावनात्मक और किसी आंदोलन से अधिक प्रेरणादायक है.
 

 

---- समाप्त ----

Read more!
Advertisement

RECOMMENDED

Advertisement
Latest News in Hindi »