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आखिर 8 मार्च को ही क्यों मनाया जाता है अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस

aajtak.in
  • 07 मार्च 2019,
  • अपडेटेड 1:04 PM IST
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आजाद भारत में आपने कई बार लोगों को महिलाओं के हित और उनके अधिकारों के बारे में बात करते सुना होगा. इतना ही नहीं उनके प्रति सम्मान, प्रशंसा और प्यार जताने के लिए महिला दिवस और अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस जैसे दिन भी मनाए जाते हैं. बता दें,8 मार्च को पूरा विश्व अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस मनाता है. आइए जानते हैं इस दिन को मनाने के पीछे क्या है खास वजह.   

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सबसे पहले अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस को मनाने की शुरूआत सन् 1990 में हुई. हालांकि इसे आधिकारिक मान्यता साल 1975 में मिली. यह वही साल था जब संयुक्त राष्ट्र संघ ने एक थीम के साथ इसे मनाना शुरु किया.

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अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस की सबसे पहली थीम 'सेलीब्रेटिंग द पास्ट, प्लानिंग फॉर द फ्यूचर रखी गई. खास बात यह है कि हर साल अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस को मनाने के लिए एक खास थीम रखी जाती है. इस बार इस दिन के लिए जो थीम रखी गई है उसका नाम है 'BalanceforBetter'.

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आज महिलाएं खुद को बेहतर तरीके से व्यक्त कर सकती हैं. लेकिन पहले ऐसा बिल्कुल नहीं था. पहले की महिलाओं को न तो पढ़ने की आजादी दी जाती थी न नौकरी करने और वोट डालने की। जिसके बाद 1908 में 15000 महिलाओं ने न्यूयॉर्क सिटी की सड़कों पर एक मार्च निकाला. जिसमें वोटिंग अधिकारों से लेकर काम करने के घंटों को कम करने और बेहतर वेतन की मांग शामिल थी।

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साल 1909 में अमेरिका की सोशलिस्ट पार्टी ने एक घोषणा करके यूनाइटेड स्टेट्स में पहला राष्ट्रीय महिला दिवस 28 फरवरी को मनाया। जिसके बाद 1910 में जर्मनी और 19 मार्च 1911 को पहली बार आस्ट्रिया डेनमार्क और स्विट्जरलैंड में भी अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस मनाया गया।

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दो साल बाद अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस की तारीख में बदलाव करते हुए साल 1913 में इसे 8 मार्च कर दिया गया और तब से इसे हर साल इसी दिन मनाया जाता है.अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस दुनियाभर के विभिन्न क्षेत्रों में काम करने वाली महिलाओं की आर्थिक, राजनीतिक और सामाजिक उपलब्धियों के जश्न के तौर पर मनाया जाता है.

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अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस महिलाओं को सम्मान देने के साथ महिला सशक्तिकरण और जेंडर गैप दूर करने के उद्देश्य को ध्यान रखते हुए मनाया जाता है. बता दें, साल 2017 में हुए एक सर्व के अनुसार इस बात का खुलासा किया गया कि महिला-पुरुष के बीच लैंगिक असमानता को खत्म करने में अभी भी 100 साल और लग सकते हैं.

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