'गरीब को मुफ्त वकील देना कोई एहसान नहीं, उसका हक', अदालतों के रवैये पर सुप्रीम कोर्ट सख्त

सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि गरीब, असहाय और जेल में बंद लोगों को दी जाने वाली मुफ्त कानूनी सहायता सिर्फ औपचारिकता नहीं होनी चाहिए. अदालत ने निर्देश दिया कि आरोपी को वकील से मिलने, अपनी बात रखने और मुकदमे की तैयारी का पूरा अवसर मिलना चाहिए. साथ ही बुजुर्ग कैदियों के मामलों की त्वरित सुनवाई पर भी जोर दिया गया.

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सुप्रीम कोर्ट ने कहा - मुफ्त कानूनी सहायता सिर्फ औपचारिकता नहीं, हर गरीब का अधिकार है (Photo: ITG) सुप्रीम कोर्ट ने कहा - मुफ्त कानूनी सहायता सिर्फ औपचारिकता नहीं, हर गरीब का अधिकार है (Photo: ITG)

संजय शर्मा

  • नई दिल्ली,
  • 24 मई 2026,
  • अपडेटेड 11:44 PM IST

सुप्रीम कोर्ट ने इस बात पर जोर दिया कि गरीबों या असहाय लोगों को दी जाने वाली मुफ्त कानूनी सहायता गंभीरता से दी जाए. उसमें रस्म अदायगी यानी खानापूर्ती जैसा रवैया न हो. यह एक ठोस और सार्थक प्रक्रिया होनी चाहिए ताकि उसके भी अच्छे नतीजे सामने आएं. क्योंकि यह हासिल करना आरोपी का एक प्रभावी, ठोस और सार्थक मौलिक अधिकार है, ताकि किसी भी व्यक्ति को धन के अभाव में न्याय से वंचित न रहना पड़े.

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सुप्रीम कोर्ट ने अक्षम, गरीब और निस्सहाय लोगों के मुकदमों की सुनवाई के दौरान मुफ्त कानूनी सहायता की प्रभावशीलता को गंभीर बनाने के लिए कई महत्वपूर्ण कदम उठाए हैं.

अदालत का मानना है कि मुफ्त वकील मुहैया कराना ही काफी नहीं है, बल्कि उस वकील को आरोपी से मिलने का पर्याप्त समय और मामले की तैयारी का पूरा मौका मिलना चाहिए. सुप्रीम कोर्ट ने जेलों में बंद कैदियों और दोषियों को उनके अधिकारों के प्रति जागरूक करने के लिए ऐतिहासिक निर्देश भी दिए हैं.

जमानत याचिका या सजा खारिज होने पर निर्णय के साथ एक कवर शीट यानी कवर पेज संलग्न होगा. उसमें उन्हें ऊंची अदालत में अपील करने और मुफ्त कानूनी सहायता मांगने के अधिकार की जानकारी होगी.

वरिष्ठ नागरिकों से जुड़े मामलों को अधिक गंभीरता से लेते हुए अदालत ने निर्देश दिया है कि बुजुर्गों से जुड़े मामलों की सुनवाई त्वरित गति से, मसलन दो-तीन महीने के भीतर की जाए. इस प्रक्रिया से इस काम में लगे वकीलों की प्रभावी सहायता सुनिश्चित हो.

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सुप्रीम कोर्ट में जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस सतीश चंद्र शर्मा की पीठ ने मध्य प्रदेश निवासी नंदकिशोर मिश्रा की अर्जी पर दिए निर्णय में इस बात पर जोर दिया. अब सत्तर साल के हो चुके मिश्रा को मध्य प्रदेश की ट्रायल कोर्ट ने हत्या के जुर्म में उम्र कैद की सजा सुनाई थी. अक्टूबर 2020 से मिश्रा राज्य के सुधार गृह यानी जेल में बंद थे.

अपील मध्य प्रदेश हाईकोर्ट में गई. वहां कोर्ट ने मिश्रा की कानूनी सहायता के लिए एक वकील को न्याय मित्र यानी एमाइकस क्यूरी नियुक्त किया. न्याय मित्र और कोर्ट की प्रक्रिया इतनी जल्दी चली कि एमाइकस क्यूरी को मिश्रा से मिलने का मौका भी नहीं मिल पाया, क्योंकि अगले सिर्फ छह दिन में मामले का निपटारा कर दिया गया. हालांकि इसकी सूचना मिश्रा को दी ही नहीं गई.

सुप्रीम कोर्ट ने माना कि हाईकोर्ट की मंशा भले ही केस को जल्द निपटाने की थी, लेकिन जेल में बंद एक बुजुर्ग को यह जानने का पूरा हक था कि उसकी पैरवी कौन कर रहा है. सुप्रीम कोर्ट ने न्याय मित्र की नियुक्ति को लेकर दो बेहद मानवीय और जरूरी सिद्धांत तय किए हैं. न्याय मित्र या कानूनी सहायक का आरोपी से मिलना सुनिश्चित हो, ताकि आरोपी अपना पक्ष वकील को समझा सके.

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सुप्रीम कोर्ट ने भावुकता और गंभीरता के साथ याद दिलाया कि अदालती समय बेहद कीमती है, लेकिन इसका इस्तेमाल सतही तौर पर नहीं होना चाहिए. सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट को निर्देश दिया है कि बुजुर्ग नंदकिशोर मिश्रा की उम्र को देखते हुए, दो महीने के भीतर इस मामले की दोबारा निष्पक्ष सुनवाई कर जल्द से जल्द फैसला सुनाया जाए.

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