समलैंगिक विवाह पर सुप्रीम कोर्ट के फैसले पर दोबारा विचार करने के लिए दायर हुई याचिका

उच्चतम न्यायालय की पांच न्यायाधीशों की संविधान पीठ ने 17 अक्टूबर को समलैंगिक विवाह को कानूनी मान्यता देने से इनकार कर दिया था. न्यायालय ने यह भी कहा था कि इस बारे में कानून बनाने का काम संसद का है. याचिकाकर्ताओं ने कहा है कि वे दुखी हैं

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समलैंगिक विवाह पर सुप्रीम कोर्ट के फैसले पर दोबारा विचार करने के लिए दायर हुई याचिका समलैंगिक विवाह पर सुप्रीम कोर्ट के फैसले पर दोबारा विचार करने के लिए दायर हुई याचिका

सृष्टि ओझा

  • नई दिल्ली,
  • 07 नवंबर 2023,
  • अपडेटेड 9:59 PM IST

समलैंगिक विवाह को कानूनी मान्यता देने से सुप्रीम कोर्ट के इनकार के खिलाफ शीर्ष कोर्ट में दूसरी समीक्षा याचिका दायर की गई है. समलैंगिक विवाह मामले में एक याचिकाकर्ता द्वारा याचिका दायर किए जाने के बाद, मामले में मुख्य याचिकाकर्ता सुप्रिया चक्रवर्ती और अभय डांग ने समीक्षा की मांग करते हुए शीर्ष अदालत का रुख किया है. उच्चतम न्यायालय की पांच न्यायाधीशों की संविधान पीठ ने 17 अक्टूबर को समलैंगिक विवाह को कानूनी मान्यता देने से इनकार कर दिया था. न्यायालय ने यह भी कहा था कि इस बारे में कानून बनाने का काम संसद का है. याचिकाकर्ताओं ने कहा है कि वे दुखी हैं, क्योंकि उन्हें शीर्ष न्यायालय से कोई राहत नहीं मिली है.

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याचिकाकर्ताओं के अनुसार, संवैधानिक न्यायालयों को संवैधानिक मूल्यों के अनुरूपता सुनिश्चित करने के लिए वैधानिक कानून की समीक्षा करने का अधिकार है. ऐसे न्यायालयों को समलैंगिक विवाह को मान्यता देने के लिए विधानमंडल द्वारा कानून बनाने/संशोधन करने की प्रतीक्षा करने की आवश्यकता नहीं है.

पुनर्विचार याचिका में क्या कहा गया है?

1) संविधान अपनी पसंद के व्यक्ति से शादी करने के अधिकार की गारंटी देता है. याचिका में तर्क दिया गया है कि सुप्रीम कोर्ट ने सर्वसम्मति से यह माना था कि संविधान के तहत अपनी पसंद के व्यक्ति से शादी करने का कोई मौलिक अधिकार नहीं है, और किसी भी पिछले उदाहरण में ऐसा नहीं माना गया है.

हालांकि, बहुमत का यह निष्कर्ष कि इस न्यायालय की किसी भी पिछली मिसाल ने अपनी पसंद के व्यक्ति से शादी करने के मौलिक अधिकार की घोषणा नहीं की है, स्पष्ट रूप से गलत है.

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न्यायालय का यह निष्कर्ष कि अपनी पसंद के व्यक्ति से विवाह करने का कोई मौलिक अधिकार नहीं है, न्यायिक समीक्षा के दृष्टिकोण पर आधारित है जो पिछली बाध्यकारी मिसाल से बिल्कुल अलग है, जहां समान स्थितियों में न्यायालय ने किसी भी सकारात्मक संदर्भ के बिना अधिकार के संवैधानिक चरित्र को पाया है. संवैधानिक न्यायालयों को समलैंगिक विवाह को मान्यता देने के लिए विधानमंडल द्वारा कानून बनाने की प्रतीक्षा करने की आवश्यकता नहीं है.

सुप्रीम कोर्ट के फैसले के मुताबिक भले ही सेम सेक्स मैरिज को मान्यता ना मिली हो, लेकिन साल 2018 में सुप्रीम कोर्ट की संविधान पीठ ने ही सेम सेक्स रिलेशनशिप को अपराध की श्रेणी से बाहर करने वाला फैसला दिया था. दरअसल, IPC की धारा 377 के तहत समलैंगिक संबंधों को अपराध माना जाता था, लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में इसे अपराध की श्रेणी से बाहर कर दिया था.

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