कभी प्लेटफॉर्म पर VTO लिखा देखा है? जानिए इसका क्या मतलब है?

रेलवे स्टेशनों पर दिखाई देने वाला VTO यानी विजिबिलिटी टेस्ट ऑब्जेक्ट एक सुरक्षा संकेत है, जिसका उपयोग कोहरे या खराब मौसम में विजिविलिटी जांचने के लिए किया जाता है. इसके आधार पर रेलवे तय करती है कि अतिरिक्त चेतावनी और सुरक्षा उपायों की जरूरत है या नहीं.

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जब मौसम इतना खराब हो जाता है कि VTO दिखाई नहीं देता, तब रेलवे कई अतिरिक्त सुरक्षा उपाय लागू करती है. ( Photo: ITG) जब मौसम इतना खराब हो जाता है कि VTO दिखाई नहीं देता, तब रेलवे कई अतिरिक्त सुरक्षा उपाय लागू करती है. ( Photo: ITG)

aajtak.in

  • नई दिल्ली,
  • 07 जून 2026,
  • अपडेटेड 12:53 PM IST

रेलवे स्टेशन पर सफर करते समय आपने कई बार प्लेटफॉर्म या ट्रैक के किनारे पीले रंग के गोले में V.T.O. लिखा देखा होगा. ज्यादातर लोग इसे कोई सामान्य रेलवे कोड या तकनीकी निशान समझकर नजरअंदाज कर देते हैं. लेकिन असल में यह रेलवे सुरक्षा व्यवस्था का एक बेहद महत्वपूर्ण हिस्सा है. खासकर सर्दियों के मौसम में जब घना कोहरा छा जाता है, तब VTO का उपयोग किया जाता है. इसकी मदद से रेलवे कर्मचारी और स्टेशन मास्टर यह तय करते हैं कि ट्रेनों का संचालन सुरक्षित तरीके से किया जा सकता है या नहीं.

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VTO का क्या मतलब होता है?
VTO का फूल फॉर्म विजिबिलिटी टेस्ट ऑब्जेक्ट (Visibility Test Object) है. हिंदी में इसे दृश्यता परीक्षण वस्तु कहा जा सकता है. यह एक विशेष संकेतक ( Sign) होता है, जिसका उपयोग यह चेक करने के लिए किया जाता है कि किसी स्थान पर विजिबिलिटी कितनी है और सिग्नल तय दूरी से दिखाई दे रहे हैं या नहीं.रेलवे में यह व्यवस्था इसलिए बनाई गई है ताकि खराब मौसम, विशेषकर घने कोहरे के दौरान, ट्रेनों का संचालन सुरक्षित रखा जा सके. यदि VTO साफ दिखाई देता है तो माना जाता है कि विजिविलिटी सामान्य है. वहीं अगर यह दिखाई नहीं देता तो रेलवे अतिरिक्त सुरक्षा उपाय लागू करती है.

रेलवे को VTO की जरूरत क्यों पड़ती है?
सर्दियों में देश के कई हिस्सों में घना कोहरा पड़ता है. ऐसे में लोको पायलट को रेलवे सिग्नल, ट्रैक और अन्य संकेत देखने में कठिनाई होती है. यदि समय पर सिग्नल दिखाई न दे तो ट्रेन संचालन प्रभावित हो सकता है और दुर्घटना का खतरा भी बढ़ सकता है. इसी समस्या से बचने के लिए रेलवे VTO का उपयोग करती है. स्टेशन मास्टर समय-समय पर VTO को देखकर यह आकलन करता है कि विजिविलिटी सुरक्षित स्तर पर है या नहीं. इसके आधार पर आगे की कार्रवाई तय की जाती है.

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VTO कहां लगाया जाता है?
रेलवे नियमों के अनुसार VTO को एक निश्चित दूरी पर स्थापित किया जाता है ताकि उसकी मदद से सही तरीके से विजिबिलिटी का टेस्ट किया जा सके. सेमाफोर सिग्नलों वाले क्षेत्रों में VTO आमतौर पर 300 से 350 मीटर की दूरी पर लगाया जाता है. वहीं आधुनिक Multiple Aspect Colour Light Signalling (MACLS) वाले सेक्शनों में इसे लगभग 180 मीटर की दूरी पर स्थापित किया जा सकता है.

सेमाफोर सिग्नलिंग क्या होती है?
सेमाफोर सिग्नलिंग (Semaphore Signalling) एक पुरानी लेकिन बेहद प्रभावी दृश्य संकेत प्रणाली है, जिसका इस्तेमाल संदेश या निर्देश देने के लिए किया जाता था. रेलवे में यह व्यवस्था ट्रेनों के सुरक्षित संचालन के लिए विकसित की गई थी. इसमें ऊंचे खंभे पर एक चलने वाली आर्म लगी होती है, जो अलग-अलग एंगल पर जाकर लोको पायलट को आगे की स्थिति की जानकारी देती है. यदि आर्म हॉरिजॉन्टल  स्थिति में होती है तो इसका मतलब होता है कि ट्रेन को रुकना है, जबकि भुजा नीचे झुकी हुई हो तो ड्राइवर को आगे बढ़ने की अनुमति मिल जाती है. 

रात के समय इसी संकेत को रंगीन लैंप की मदद से दिखाया जाता है. आधुनिक रंगीन लाइट सिग्नलों (Colour Light Signals) के आने से पहले भारतीय रेलवे सहित दुनिया के कई देशों में सेमाफोर सिग्नलिंग का उपयोग होता था. आज भी कुछ पुराने रेल खंडों में यह देखने को मिल जाती है. इसे हमेशा ऐसी जगह लगाया जाता है जहां से स्टेशन मास्टर या सहायक स्टेशन मास्टर आसानी से इसे देख सके. यदि उन्हें VTO दिखाई नहीं देता, तो यह संकेत माना जाता है कि कोहरा काफी घना है.

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VTO दिखाई न देने पर क्या किया जाता है?
जब मौसम इतना खराब हो जाता है कि VTO दिखाई नहीं देता, तब रेलवे कई अतिरिक्त सुरक्षा उपाय लागू करती है. सबसे पहले स्टेशन मास्टर विशेष सावधानी बरतना शुरू कर देता है. कई जगहों पर फॉग सिग्नल मैन की तैनाती की जाती है, जो आने वाली ट्रेनों को पहले से चेतावनी देने का काम करते हैं. इसके अलावा लोको पायलट को भी अतिरिक्त सतर्कता बरतने के निर्देश दिए जाते हैं. रेलवे ट्रैक पर डेटोनेटर लगाने जैसी व्यवस्था भी लागू कर सकती है, ताकि चालक को समय रहते चेतावनी मिल सके.

डेटोनेटर क्या होता है?
डेटोनेटर रेलवे का एक विशेष चेतावनी उपकरण होता है. इसे रेल की पटरी पर लगाया जाता है. जब ट्रेन इसके ऊपर से गुजरती है तो तेज धमाके जैसी आवाज होती हैय यह आवाज लोको पायलट को संकेत देती है कि आगे कोई महत्वपूर्ण सिग्नल, स्टेशन या सावधानी वाला क्षेत्र आने वाला है. खासकर घने कोहरे में यह व्यवस्था काफी उपयोगी साबित होती है क्योंकि उस समय दृश्य संकेतों को देखना मुश्किल हो जाता है.

कोहरे में लोको पायलट क्या सावधानी बरतता है?
कोहरे के दौरान लोको पायलट को रेलवे के विशेष नियमों का पालन करना पड़ता है. यदि विजिबिलिटी कम हो तो ट्रेन की गति नियंत्रित रखी जाती है. कई परिस्थितियों में ट्रेन की स्पीड 60 किलोमीटर प्रति घंटा से अधिक नहीं रखी जाती. जरूरत पड़ने पर चालक बार-बार हॉर्न बजाता है ताकि रेलवे क्रॉसिंग, स्टेशन और ट्रैक के आसपास मौजूद लोगों को ट्रेन के आने की जानकारी मिल सके. सिग्नल की स्थिति के अनुसार गति को और भी कम किया जा सकता है.

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क्या हर स्टेशन पर VTO होता है?
नहीं, VTO हर स्टेशन पर नहीं लगाया जाता. इसकी जरूरत मुख्य रूप से उन क्षेत्रों में होती है जहां कोहरे के कारण दृश्यता प्रभावित होने की संभावना अधिक रहती है. आधुनिक सिग्नलिंग सिस्टम और उन्नत फॉग-सेफ तकनीकों वाले कई सेक्शनों में इसकी आवश्यकता कम हो गई है. हालांकि जहां पारंपरिक सुरक्षा व्यवस्था लागू है, वहां आज भी VTO का उपयोग किया जाता है.

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