क्या आपने कभी सोचा है कि जब घरों में फ्रिज नहीं हुआ करता था, तब लोग पका हुआ खाना, दूध, रोटियां और मिठाइयों को खराब होने से कैसे बचाते थे? पुराने भारतीय घरों में 'नेमत खाना' नाम की जालीदार लकड़ी की अलमारी होती थी, जिसे उस दौर का देसी फ्रिज माना जाता था. इसके अलावा मिट्टी के घड़े, तहखाने, धूप में सुखाने और नमक-तेल जैसे प्राकृतिक तरीकों की मदद से भोजन को लंबे समय तक सुरक्षित रखा जाता था.
जानिए इन पारंपरिक तरीकों के पीछे छिपा साइंस, जिसने बिना बिजली के भी पीढ़ियों तक लोगों का खाना ताजा रखा. आज घर-घर में फ्रिज है. दूध हो, सब्जियां हों, बचा हुआ खाना हो या फल, सब कुछ आसानी से कई दिनों तक सुरक्षित रखा जा सकता है. लेकिन जब बिजली नहीं थी और फ्रिज जैसी कोई मशीन मौजूद नहीं थी, तब लोग खाने को खराब होने से कैसे बचाते थे? आखिर गर्मियों में दूध कैसे टिकता था? पका हुआ खाना रात भर कैसे सुरक्षित रहता था?
अगर आप सोचते हैं कि पहले लोग हर बार ताजा खाना बनाते थे, तो यह पूरी सच्चाई नहीं है. पुराने समय में लोगों ने नेचर और साइंस की मदद से ऐसे कई तरीके विकसित कर लिए थे, जिनकी वजह से खाना लंबे समय तक सुरक्षित रहता था. इन्हीं में से एक खास व्यवस्था थी 'नेमत खाना', जिसे पुराने घरों का देसी फ्रिज भी कहा जाता था.
क्या होता था नेमत खाना?
पुराने समय में बड़े-बड़े हवेली नुमा घरों में लकड़ी से बनी एक खास अलमारी होती थी, जिसे नेमत खाना कहा जाता था. बाहर से देखने में यह साधारण अलमारी जैसी लगती थी, लेकिन इसकी बनावट बेहद सोच-समझकर की जाती थी. इस अलमारी के दरवाजों में महीन जाली लगी होती थी. जाली की वजह से हवा अंदर आती रहती थी, लेकिन मक्खियां, मच्छर और दूसरे कीड़े खाने तक नहीं पहुंच पाते थे. इसमें पका हुआ खाना, रोटियां, मिठाइयां, फल और कई दूसरी चीजें रखी जाती थीं. आज भी राजस्थान, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश और पुराने शहरों की कई हवेलियों में ऐसी अलमारियां देखने को मिल जाती हैं.
सिर्फ खाना रखने की अलमारी नहीं, यादों का हिस्सा
नेमत खाना सिर्फ खाने को सुरक्षित रखने की जगह नहीं था, बल्कि पुराने घरों की एक ऐसी चीज थी, जिससे लोगों की ढेर सारी यादें जुड़ी थीं. इसमें कपड़े में लिपटी रोटियां, घर की बनी मिठाइयां, बिस्किट, दाल, सब्जी और दूसरे खाने-पीने का सामान रखा जाता था. इसकी महीन जाली से हवा अंदर जाती रहती थी, लेकिन चींटियां, मक्खियां और दूसरे कीड़े भोजन तक नहीं पहुंच पाते थे. कई लोगों के लिए नेमत खाना बचपन की उन दोपहरों की याद भी है, जब घरवालों की नजर बचाकर उसमें रखी रोटी पर चीनी और देसी घी लगाकर खा लिया करते थे. माता-पिता बड़ी सावधानी से इस अलमारी में खाना रखते थे, ताकि वह ज्यादा देर तक ताजा रहे. उस दौर में यह सिर्फ एक लकड़ी की अलमारी नहीं, बल्कि घर की रसोई का सबसे भरोसेमंद हिस्सा हुआ करती थी.
आखिर खाना खराब क्यों नहीं होता था?
इसका सबसे बड़ा कारण था हवा का लगातार बहाव. जब हवा लगातार चलती रहती है तो खाने के आसपास नमी कम जमा होती है. नमी कम होने से बैक्टीरिया और फफूंद तेजी से नहीं बढ़ पाते. यही वजह थी कि नेमत खाना खाने को कुछ समय तक सुरक्षित रखने में मदद करता था. हालांकि यह फ्रिज जितना ठंडा नहीं होता था, लेकिन उस दौर में यह सबसे प्रभावी घरेलू उपाय माना जाता था.
मिट्टी का घड़ा था प्राकृतिक कूलर
सिर्फ नेमत खाना ही नहीं, बल्कि मिट्टी का घड़ा भी लोगों का बड़ा सहारा था. घड़े की मिट्टी में बेहद छोटे-छोटे छेद होते हैं. इनमें से थोड़ा-थोड़ा पानी बाहर निकलकर वाष्प बन जाता है. इस प्रक्रिया में गर्मी बाहर निकलती है और अंदर का पानी ठंडा हो जाता है. इसी वजह से घड़े का पानी गर्मियों में भी ठंडा और ताजा लगता है. कई लोग दूध, दही और मक्खन जैसे सामान भी घड़े के आसपास ठंडी जगह पर रखते थे ताकि वे जल्दी खराब न हों.
तहखाने का भी खूब इस्तेमाल होता था
पुराने बड़े घरों में जमीन के नीचे तहखाने बनाए जाते थे. वहां सूरज की सीधी गर्मी नहीं पहुंचती थी, इसलिए तापमान ऊपर की तुलना में काफी कम रहता था. अचार, अनाज, गुड़, मसाले और कई बार फल-सब्जियां भी वहीं रखी जाती थीं. आज भी दुनिया के कई देशों में बेसमेंट या सेलर का इस्तेमाल इसी उद्देश्य से किया जाता है.
केले के पत्ते और गीले कपड़े का कमाल
अगर खाना कुछ घंटों तक सुरक्षित रखना होता था तो उसे केले के पत्ते में लपेट दिया जाता था. कई जगहों पर बर्तनों को गीले सूती कपड़े से ढक दिया जाता था. गीला कपड़ा धीरे-धीरे सूखते समय अपने साथ गर्मी भी ले जाता था. इससे बर्तन का तापमान थोड़ा कम हो जाता था और खाना ज्यादा देर तक ताजा रहता था.
दूध को बार-बार उबालने की परंपरा क्यों थी?
पुराने समय में लोग दूध को सिर्फ एक बार उबालकर नहीं छोड़ते थे. सुबह उबाला गया दूध अगर शाम तक रखना होता था तो उसे फिर से गर्म कर लिया जाता था. ऐसा करने से दूध में मौजूद कई बैक्टीरिया खत्म हो जाते थे और दूध जल्दी खराब नहीं होता था. यही कारण है कि कई घरों में दिन में दो या तीन बार दूध गर्म करने की परंपरा थी.
अचार और मसाले भी होते थे प्रिजर्व
भारत में अचार बनाने की परंपरा सिर्फ स्वाद के लिए नहीं बनी. नमक, तेल, हल्दी, लाल मिर्च और सरसों जैसे मसालों में ऐसे गुण होते हैं जो कई तरह के बैक्टीरिया और फंगस को धीमा कर देते हैं. यही वजह है कि सही तरीके से रखा गया अचार महीनों ही नहीं, कई बार सालों तक भी खराब नहीं होता. इसी तरह सूखी सब्जियां, पापड़, बड़ी और मसालेदार चटनियां भी लंबे समय तक चल जाती थीं. आज हम खाने को फ्रिज में रखते हैं, लेकिन पहले लोग धूप का इस्तेमाल करते थे. सब्जियां, मेथी, मिर्च, मछली, मांस और कई फलों को धूप में सुखाकर उनमें मौजूद नमी निकाल दी जाती थी. जब नमी कम हो जाती है तो बैक्टीरिया और फंगस के पनपने की संभावना भी काफी घट जाती है. यही कारण है कि सूखे फूड प्रोडक्ट लंबे समय तक सुरक्षित रहते थे.
लोग जरूरत भर ही खाना बनाते थे
उस समय खाने को बचाने का सबसे आसान तरीका था कम मात्रा में खाना बनाना. संयुक्त परिवार होने के बावजूद लोग अनुभव के आधार पर उतना ही भोजन बनाते थे जितना उसी दिन खत्म हो जाए. अगर खाना बच भी जाता, तो उसे अगले भोजन तक नेमत खाना, मिट्टी के घड़े या ठंडी जगह पर रखा जाता था.
क्या नेमत खाना सच में फ्रिज की जगह ले सकता है?
नेमत खाना आज के फ्रिज जैसा नहीं था. उसमें बर्फ या कूलिंग सिस्टम नहीं होता था. इसलिए दूध, मांस, मछली या जल्दी खराब होने वाली चीजों को कई दिनों तक सुरक्षित नहीं रखा जा सकता था. लेकिन उस दौर की लाइफस्टाइल, मौसम और रोज ताजा खाना बनाने की आदत को देखते हुए यह व्यवस्था काफी कारगर थी. यही वजह है कि इसे पुराने समय का देसी फ्रिज कहा जाता है.
आज बिजली की बढ़ती खपत और पर्यावरण को लेकर चिंता के बीच लोग फिर से पुराने प्राकृतिक तरीकों की ओर लौट रहे हैं. मिट्टी के घड़े, बांस की टोकरी, लकड़ी की जालीदार अलमारी और प्राकृतिक वेंटिलेशन जैसी चीजें एक बार फिर लोकप्रिय हो रही हैं. यह सिर्फ परंपरा नहीं, बल्कि विज्ञान और प्रकृति के बीच संतुलन का शानदार उदाहरण भी हैं. फ्रिज आने से पहले लोगों के पास आधुनिक तकनीक नहीं थी, लेकिन उनके पास अनुभव, प्रकृति की समझ और वैज्ञानिक सोच जरूर थी.
नेमत खाना, मिट्टी का घड़ा, तहखाना, धूप में सुखाना, नमक और मसालों का इस्तेमाल जैसे तरीके बताते हैं कि हमारे पूर्वज बिना बिजली के भी भोजन को सुरक्षित रखने की कला अच्छी तरह जानते थे. आज भले ही फ्रिज ने उनकी जगह ले ली हो, लेकिन इन पारंपरिक उपायों में छिपा विज्ञान आज भी उतना ही दिलचस्प और उपयोगी है.
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