क्या अयोध्‍या विवाद को सुलझा लेगा इलाहाबाद उच्च न्यायालय?

क्या इलाहाबाद उच्च न्यायालय राम जन्मभूमि..बाबरी मस्जिद विवाद को सुलझाने में सफल होगा जो दशकों से अनसुलझा है.

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भाषा

  • लखनऊ,
  • 30 सितंबर 2010,
  • अपडेटेड 2:13 PM IST

क्या इलाहाबाद उच्च न्यायालय राम जन्मभूमि..बाबरी मस्जिद विवाद को सुलझाने में सफल होगा जो दशकों से अनसुलझा है.

बहुत से लोगों के दिमाग में यह सवाल शीर्ष पर है. देश अयोध्या में विवादित स्थल के मालिकाना हक पर छह दशक पुराने कानूनी विवाद पर फैसले का सांसें थामकर इंतजार कर रहा है जहां 1528 में बाबरी मस्जिद बनाई गई थी.

इलाहाबाद उच्च न्यायालय की लखनऊ पीठ के तीन न्यायाधीश न्यायमूर्ति डीवी शर्मा न्यायमूर्ति सुधीर अग्रवाल और न्यायमूर्ति एसयू खान राम जन्मभूमि..बाबरी मस्जिद प्रकरण में आज अपराह्न साढ़े तीन बजे फैसला सुनाने वाले हैं.

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इलाहाबाद उच्च न्यायालय की लखनऊ पीठ यहां एक तरह से अभेद्य किले में तब्दील हो गयी है और कानूनी विवाद से जुड़े पक्षों तथा उनके वकीलों को ही अदालत संख्या 21 में प्रवेश की अनुमति होगी जहां तीन न्यायाधीश अपना फैसला सुनाएंगे.

राज्य में खासकर राजधानी लखनउ में सुरक्षा के अभूतपूर्व इंतजाम किए गए हैं ताकि फैसले के बाद कोई अप्रिय घटना न हो पाए. राज्य सरकार ने फैसला सुनाए जाने के बाद जीत या हार पर किसी भी तरह के प्रदर्शन पर रोक लगा दी है.

पुलिस उपमहानिरीक्षक राजीव कृष्ण ने कहा ‘इस तरह के किसी भी प्रयास से सख्ती से निपटा जाएगा.’’ अदालत का फैसला हजारों पृष्ठों में हो सकता है.{mospagebreak}
राज्य में लगभग एक लाख 90 हजार सुरक्षाकर्मी तैनात किए गए हैं जिसके बारे में गृहमंत्री पी. चिदंबरम ने कहा कि कानून व्यवस्था की स्थिति बनाए रखने के लिए यह ‘पर्याप्त से ज्यादा’ है. शांति बनाए रखने के लिए नियमित पुलिस के अतिरिक्त कम से कम दो हजार अर्धसैनिक तैनात किए गए हैं.

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राज्य की राजधानी में किसी भी अप्रिय घटना को रोकने के लिए की गई भारी सुरक्षा व्यवस्था के बीच लोग आज रोजाना की तरह ही अपने काम पर निकले और कार्यालयों तथा स्कूलों में कामकाज सामान्य रहा.

फैसले की घोषणा में एकमात्र बाधा को उच्चतम न्यायालय ने मंगलवार को दूर कर दिया जब इसने पूर्व नौकरशाह रमेश चंद्र त्रिपाठी की इस आशय की याचिका को खारिज कर दिया. त्रिपाठी ने अपनी याचिका में बहुप्रतीक्षित फैसले को टालने की अपील की थी.

उच्च न्यायालय के फैसले का अत्यधिक महत्व होगा क्योंकि दोनों धार्मिक समूहों के बीच वार्ता के जरिए जमीन के एक टुकड़े के सौहार्दपूर्ण समाधान की कोशिशें नाकाम रहीं.

पूर्व प्रधानमंत्रियों पीवी नरसिंह राव वीपी सिंह और चंद्रशेखर ने भी दोनों पक्षों के बीच समझौते के लिए बार बार कोशिश की थी.

अयोध्या विवाद दशकों से एक भावनात्मक मुद्दा रहा है और हिन्दू तथा मुस्लिम धार्मिक समूहों ने कानूनी वाद भी दायर किए.{mospagebreak}

पहला वाद 1950 में गोपाल सिंह विशारद ने दायर किया था जिन्होंने विवादित स्थल पर भगवान राम की पूजा की अनुमति मांगी. दूसरा वाद 1950 में ही परमहंस रामचंद्र दास ने दायर किया. उन्होंने भी यही अनुमति मांगी लेकिन बाद में उन्होंने इसे वापस ले लिया.

तीसरा वाद 1959 में निर्मोही अखाड़े ने दायर किया और रिसीवर से विवादित स्थल का प्रभार मांगा. चौथा मुकदमा उप्र सुन्नी सेंट्रल वक्फ बोर्ड ने दायर किया जिसमें विवादित स्थल के कब्जे की मांग की गई. पांचवा वाद एक जुलाई 1989 को भगवान श्री रामलला विराजमान के नाम से दायर किया गया. इसमें भी विवादित स्थल के कब्जे की मांग की गई.

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उत्तर प्रदेश के तत्कालीन महाधिवक्ता के एक आवेदन पर सभी चार मामले 1989 में उच्च न्यायायल में हस्तांतरित हो गए. दस जनवरी 2010 से शुरू हुई नियमित सुनवाई के दौरान अदालत के समक्ष इस मामले में कुल 94 गवाह पेश हुए. इनमें 58 गवाह हिन्दू पक्ष के तथा 36 गवाह मुस्लिम पक्ष से रहे.

उच्च न्यायालय ने मामले में सुनवाई करते हुए भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण :एएसआई: को विवादित स्थल के आसपास खुदाई करने को कहा ताकि यह पता लगाया जा सके कि क्या मस्जिद से पहले वहां मंदिर बना था.

खुदाई का काम हिन्दू और मुस्लिम प्रतिनिधियों की मौजूदगी में हुआ जो मार्च 2003 से लेकर अगस्त 2003 तक पांच महीने चला.

इस साल जनवरी से मामले में रोजाना सुनवाई हुई जो 26 जुलाई को पूरी हो गई और विशेष पीठ ने अपना फैसला सुरक्षित रखते हुए दोनों पक्षों से कहा कि वे विचार करें कि क्या आपसी सामंजस्य से मामले के समाधान की कोई संभावना है.

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