शिवसेना की नई उम्मीद आदित्य ठाकरे, जो हैं कवि और फुटबॉल के दीवाने

पिछले कुछ सालों से राजनीतिक स्तर पर अपनी चमक खोने वाली शिवसेना ठाकरे की तीसरी पीढ़ी के सहारे 'अच्छे दिन' की आस है, ऐसे में राजनीति में नंबर 2 पर पहुंचे आदित्य ठाकरे पर अब सबकी नजर है.

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पिता उद्धव के साथ आदित्य ठाकरे (ट्विटर) पिता उद्धव के साथ आदित्य ठाकरे (ट्विटर)

सुरेंद्र कुमार वर्मा

  • नई दिल्ली,
  • 24 जनवरी 2018,
  • अपडेटेड 3:31 PM IST

केंद्र में सत्तारुढ़ भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) की सबसे बड़ी पुरानी सहयोगी पार्टी शिवसेना ने अब अपनी राह अलग कर ली है और उसने अगले साल 2019 में होने वाले लोकसभा और राज्य में विधानसभा चुनाव में भाजपा के साथ जाने के बजाए अकेले ही चुनाव लड़ने का फैसला लिया है.

अगले साल से भाजपा का साथ छोड़कर ने मंगलवार को अपनी राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक मंगलवार को मुंबई के वर्ली में एनएससी ग्राउंड में हुई. आदित्य ठाकरे को शि‍वसेना नेता चुन लिया गया. आदित्य अभी युवा सेना के अध्यक्ष भी हैं. 'शि‍वसेना नेता' चुने जाने का मतलब पार्टी में नंबर दो की हैसियत पर आ जाना.

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'शिवसेना नेता' का पद पार्टी प्रमुख के बाद सबसे बड़ा पद होता है. इस पद पर काबिज व्यक्ति पार्टी की नीतियों को बनाने का काम भी कर सकता है. इस तरह से आदित्य को पार्टी में नंबर दो की पोजिशन मिल गई है और उन पर 2019 में होने वाले दो अहम चुनाव की जिम्मेदारी रहेगी. राजनीति में वह ठाकरे की तीसरी पीढ़ी हैं. उन्हें पिता उद्धव के अलावा पूर्व मुख्यमंत्री मनोहर जोशी, सुभाष देसाई, दिवाकर रावते और अनंत गीते जैसे पार्टी के दिग्गजों का सहयोग मिल सकता है.

7 साल पहले राजनीति में रखा कदम

27 साल के आदित्य पार्टी के मुखिया उद्धव ठाकरे के बेटे और बाल ठाकरे के पोते हैं. 21 साल की उम्र में ही उन्होंने राजनीति में कदम रख लिए थे. अक्टूबर, 2010 में पार्टी के संस्थापक बाल ठाकरे ने अपने समर्थकों से अपने पोते को मिलवाया और प्रतिकात्मक रूप से तलवार भेंट किया. राजनीतिक वंशवाद को बढ़ावा देने की आलोचना से परे ठाकरे परिवार ने युवा आदित्य को राजनीति की तैयार प्लेटफॉर्म दे दिया.

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तब उन्होंने युवा सेना की स्थापना की और महाराष्ट्र, राजस्थान, मध्यप्रदेश, केरल, बिहार और जम्मू-कश्मीर में यूनिट खोला. हालांकि शुरुआत में युवा सेना को गंभीरता से नहीं लिया गया क्योंकि इसमें अन्य शिवसैनिकों के घर के बेटे और उनके दोस्त शामिल हो रहे थे.

कवि भी हैं आदित्य

अंग्रेजी भाषा में माहिर आदित्य खुद एक उभरते कवि और फोटोग्राफर भी हैं. 2007 में उनकी कविताओं की सीरीज 'माई थॉट इन व्हाइट एंड ब्लैक' नाम से छपी. इसके बाद इसी साल उन्होंने एक निजी एलबम के लिए 8 गाने लिखे. उनके लिखे गीतों को सुरेश वाडेकर, शंकर महादेवन, कैलाश खेर और सुनिधि चौहान ने अपनी आवाज दी. खास बात यह रही कि इस एलबम का लोकार्पण अमिताभ बच्चन के हाथों कराया गया.

आदित्य अपनी कविताएं लिखने के लिए बॉथरुम का इस्तेमाल करते हैं और इसे लिखने के बाद मोबाइल में सेव करते हैं. वह फुटबॉल के बड़े प्रशंसक हैं. उन्होंने मुंबई में अंतरराष्ट्रीय फुटबॉल मैच के लिए खेल के स्तर पर सुधार करवाया है, और इस संबंध में खुद की एक पहचान भी बनाई है.

राजनीति के शुरुआती दौर यानी 2010 में उन्होंने मुंबई यूनिवर्सिटी में रोहिंटन मिस्त्री की किताब 'सच ए लॉन्ग जर्नी' को शामिल किए जाने के फैसले के खिलाफ जमकर विरोध किया और प्रदेशभर में आंदोलन किया. आदित्य उस समय खासे सुर्खियों में आए जब उन्होंने मुंबई में मॉल और रेस्तरां को 24 घंटे खोले जाने की वकालत की थी.

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आदित्य अपनी राजनीति को सामाजिक सेवा करार देते हैं. हालांकि उनके आने के बाद पार्टी ने वेलेंटाइनस डे के विरोध को खत्म कर दिया है. युवा होने के नाते वह हर चीज में समान पकड़ रखते हैं. वह सोशल मीडिया पर भी सक्रिय रहते हैं और राज्य में भाजपा के साथ साझे की सरकार का खुलकर विरोध करते हैं. वह अपनी अगुवाई में पार्टी के लोगों के साथ मुख्यमंत्री देवेंद्र फडनवीस से मिलते रहे हैं. कई मौकों पर राज्य सरकार के साथ भी दिखे हैं.

युवाओं को जोड़ने की कोशिश

आम चुनाव में अभी सालभर से ज्यादा का वक्त है और पार्टी को मालूम है कि उसे युवाओं का समर्थन पहले जैसा नहीं रहा, शायद यही सोचकर पार्टी ने युवा आदित्य को नंबर दो को पोजिशन दी है, ताकि समय रहते युवा समर्थन हासिल किया जा सके.

हालांकि उनके कुछ नकारात्मक पक्ष भी हैं. आदित्य अपने दादा, पिता और चाचा की तरह अच्छे वक्ता नहीं हैं, पार्टी की बैठक में लोग उनके भाषण सुनने के लिए ज्यादा उत्साहित नहीं रहते. लेकिन एक बात यह भी है कि वो सोशल मीडिया पर लगातार सक्रिय रहते हैं और उनकी वहां खासी पकड़ भी है. ट्विटर पर 14 लाख 75 हजार फॉलोअर्स हैं और अंग्रेजी के अलावा मराठी में ट्वीट करते रहते हैं.

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ग्रामीण महाराष्ट्र के बारे में उनकी खास पकड़ नहीं है और वहां के मुद्दों को उठाने से बचते भी हैं. पार्टी के वरिष्ठ नेताओं का मानना है कि वह वक्त के साथ-साथ इन मुद्दों पर भी पकड़ बना लेंगे और लोग उन पर ध्यान देने लगेंगे. राजनीतिक की वंशबेल के सहारे आसानी से पार्टी में नंबर 2 की पोजिशन हासिल करने वाले जमीनी स्तर पर कितना कामयाब होंगे, यह वक्त बताएगा.

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