इंदिरा @100: क्या हत्या से पहले उनको हो गया था मौत का एहसास?

30 अक्टूबर 1984, देश की जनता से प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की ये आखिरी मुलाकात थी. भुवनेश्वर की इस रैली में इंदिरा गांधी ने कहा था जब उनकी जान जाएगी तो खून का एक-एक कतरा भारत को जीवित रखेगा.

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देश की पहली महिला प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी देश की पहली महिला प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी

कौशलेन्द्र बिक्रम सिंह

  • नई दिल्ली,
  • 19 नवंबर 2017,
  • अपडेटेड 3:44 PM IST

संजय गांधी की मौत के बाद से ही इंदिरा भीतर ही भीतर टूट रही थीं. वो ज्यादा धार्मिक हो गई थीं. उनके एकांत में कोलाहल था और कोलाहल में एकांत. फिर भी कड़े फैसले लेने में वो हिचकती नहीं थीं. इसी वजह से उन्होंने ऑपरेशन ब्लू स्टार जैसा कड़ा फैसला भी लिया था. इंदिरा इस फैसले की कीमत शायद जानती थीं. जान देकर उन्होंने ये कीमत चुकाई भी. इंदिरा आज से ठीक 100 साल पहले 19 नवंबर 1917 को इलाहाबाद में पैदा हुईं थीं. पढ़िए इस मौके पर इंदिरा की जिंदगी से जुड़ी यह खास पेशकश...

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30 अक्टूबर 1984, देश की जनता से प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की ये आखिरी मुलाकात थी. भुवनेश्वर की इस रैली में इंदिरा गांधी ने कहा था जब उनकी जान जाएगी तो खून का एक-एक कतरा भारत को जीवित रखेगा. शायद इंदिरा गांधी को मौत से पहले मौत का एहसास हो गया था. 30 अक्टूबर की देर शाम इंदिरा गांधी भुवनेश्वर से दिल्ली लौटीं थीं. दिन भर की यात्रा का थकान लिए वो देर रात सोने गईं. बेडरूम में जाने से पहले इंदिरा गांधी ने अपने स्पेशल असिस्टेंट आर के धवन को सुबह के सभी एप्वाइंटमेंट कैंसिल कर देने को कहा. सिर्फ एक टीवी इंटरव्यू को छोड़कर.

31 अक्टूबर 1984, 1- सफदरजंग रोड, सुबह के करीब 9 बजे, इंदिरा गांधी तैयार होकर बीबीसी के एक इंटरव्यू के लिए अपने बंगले से बाहर निकलीं. साये की तरह हमेशा उनके साथ रहने वाले आर के धवन साथ थे.

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इंदिरा अभी गेट के पास भी नुहीं पहुंची थीं कि इंदिरा के अंगरक्षक सतवंत सिंह और बेअंत सिंह ने उन पर गोलियां बरसा दीं. 25 मिनट के भीतर करीब 30 गोलियां इंदिरा के जिस्म में समा गईं. बेअंत सिंह ने अपनी रिवॉल्वर फेंक कर हाथ ऊपर उठा दिया. जबकि सतवंत को इंदिरा के गार्ड्स ने मौके पर ही मौत की नींद सुला दिया.

कटे हुए पेड़ की तरह गिर पड़ा था. अपने ही घर में, अपने ही सुरक्षाकर्मियों की गोलियों का शिकार हुई थीं इंदिरा गांधी. गोलियों से छलनी  इंदिरा गांधी को एम्स ले जाया गया. पूरे देश में जंगल की आग की तरह ये खबर फैल रही थी.

एम्स के बाहर लोगों का तांता लगा था. राजीव गांधी अपनी पश्चिमी बंगाल यात्रा रद्द करके दिल्ली लौट आए थे. शाम को रेडियो और टेलिविजन पर इंदिरा की मौत की मनहूस खबर आई. पूरे देश में हाहाकार मच गया था.

पूरी दुनिया पर अपनी धाक जमाने वाली इंदिरा खामोश हो गई थीं. इंदिरा के अंतिम दर्शनों के लिए लोग उमड़ पड़े थे. हर आंख नम थी, हर आंख में आंसू थे. इंदिरा गांधी के परिवार के लिए ये गहरा सदमा था. राजीव गांधी और सोनिया खुद को संभालने में जुटे थे. नन्हे राहुल को पता चल गया था कि दादी अब वापस नहीं आएगीं.

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3 नवंबर 1984 को जिंदगी के आखिरी सफर पर निकली थीं इंदिरा गांधी. उनकी अंतिम यात्रा में जनसैलाब उमड़ पड़ा था. 94 देशों के प्रतिनिधि उनके अंतिम संस्कार में शामिल हुए थे. राजीव गांधी ने इंदिरा को मुखाग्नि दी. चिता की अग्नि में इंदिरा का तन खाक हो गया. इंदिरा इतिहास के पन्नों में और उनकी यादें करोड़ों दिलों में समा गईं.

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