दाभोलकर, कलबुर्गी, पनसारे और अब गौरी लंकेश, क्या ये विचारधारा पर हमला है?

लगातार हो रही घटनाओं से सवाल यह उठता है कि क्या किसी व्यवस्था पर सवाल उठाना मतलब अपनी मौत को न्यौता देना हो गया है?

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फोटो ( गौरी लंकेश फेसबुक अकाउंट) फोटो ( गौरी लंकेश फेसबुक अकाउंट)

मोहित ग्रोवर

  • नई दिल्ली,
  • 06 सितंबर 2017,
  • अपडेटेड 12:30 PM IST

कर्नाटक की राजधानी बंगलुरु में वरिष्ठ महिला पत्रकार गौरी लंकेश की मंगलवार को अज्ञात हमलावरों ने गोली मारकर हत्या कर दी. गौरी की हत्या के बाद से ही देशभर में गुस्से का माहौल है. कई वरिष्ठ पत्रकार, सेलेब्स, राजनेताओं ने लंकेश की हत्या की घोर निंदा की है. पिछले कुछ समय में पत्रकारों या सामाजिक कार्यकर्ताओं पर हमले में लगातार बढ़ोतरी हुई है. लगातार हो रही घटनाओं से सवाल यह उठता है कि क्या किसी व्यवस्था पर सवाल उठाना मतलब अपनी मौत को न्योता देना हो गया है?

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गौरी लंकेश की हत्या

दक्षिणपंथी विचारधारा के लोगों से मतभेद रखने वालीं गौरी लंकेश साप्ताहिक मैग्जीन 'लंकेश पत्रिका' की संपादक थी. गौरी कई टीवी डिबेट्स में भी हिस्सा लेती थीं. बंगलुरु के राजराजेश्वरी इलाके में रहने वाली लंकेश को बाइक सवारों ने नजदीक से 7 गोलियां मारी. जिनमें से उनके सिर पर तीन गोलियां दागी गईं और उनकी तत्काल मौके पर मौत हो गई. पुलिस ने इस मामले की जांच शुरू कर दी है.

इससे पहले वर्ष 2015 में कर्नाटक के धारवाड़ में इसी तरह साहित्यकार एमएम कलबुर्गी की उनके घर पर ही हत्या कर दी गई थी. इस केस में दो लोगों पर कलबुर्गी की हत्या करने का आरोप लगा था. इस मामले में अभी तक किसी भी व्यक्ति की गिरफ्तारी नहीं हुई है. कर्नाटक के मुख्यमंत्री ने इस मामले में जांच को तेज करने की अपील की है.

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गोविंद पनसारे

वहीं महाराष्ट्र में 2015 में ही सामाजिक कार्यकर्ता गोविंद पनसारे की भी गोली मारकर हत्या कर दी गई थी. उनकी पत्नी को भी हमलावरों ने निशाना बनाया था. इस मामले में राइट विंग से जुड़े कुछ लोगों को गिरफ्तार किया गया था.

2013 में पुणे में डॉ. नरेंद्र दाभोलकर को गोलियों से छलनी कर दिया गया था. दाभोलकर लगातार अंधविश्वास और कुप्रथाओं के साथ खिलाफ आवाज उठाने में आगे थे. यही कारण था कि वह सनातन संस्थाओं और दक्षिणपंथियों के निशाने पर रहते थे. जिस समय उनकी हत्या की गई थी, वह सुबह की सैर करने गए थे.

इस तरह से कट्टर विचारों के खिलाफ आवाज बुलंद करने वाले लोगों पर हो रहे हमले ये सवाल भी खड़े करते हैं कि क्या एक समान विचारधारा को निशाने पर लिया जा रहा है. बुद्धिजीवी तबके की ओर से लगातार ये सवाल खड़े किए जा रहे हैं.

 

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