Beat Report: पंजाब में बीजेपी का रीसेट प्लान, नए चेहरे और नई रणनीति से 2027 में बदलेगी तस्वीर?

बीजेपी ने 2027 की शुरुआत में होने वाले पंजाब विधानसभा चुनाव के लिए अपनी राजनीतिक बिसात बिछानी शुरू कर दी है. रवनीत सिंह बिट्टू को पंजाब की राजनीति में सक्रिय करने, केवल सिंह ढिल्लों को प्रदेश अध्यक्ष बनाने और दूसरे दलों से नेताओं को जोड़ने की रणनीति के जरिए पार्टी राज्य में नया सामाजिक और राजनीतिक समीकरण बनाने की कोशिश कर रही है.

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Kamaljeet Sandhu Beat Report Kamaljeet Sandhu Beat Report

कमलजीत संधू

  • चंडीगढ़,
  • 06 जून 2026,
  • अपडेटेड 8:00 AM IST

भारतीय जनता पार्टी ने खुलकर संकेत दे दिए हैं कि उसकी नजर अब पंजाब पर है. लंबे समय से राज्य में मजबूत आधार बनाने के लिए संघर्ष कर रही बीजेपी ने हाल में पश्चिम बंगाल में मिली सफलता के बाद पंजाब में भी राजनीतिक हलचल तेज कर दी है. आम आदमी पार्टी (AAP) के सात राज्यसभा सांसदों के बीजेपी में शामिल होने के बाद, भगवा पार्टी ने अपने इरादे स्पष्ट कर दिए हैं.

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हालांकि, पंजाब बीजेपी के भीतर भी बड़े बदलाव देखने को मिल रहे हैं. 4 जून 2026 को घोषित राज्यसभा उम्मीदवारों की सूची में केंद्रीय मंत्री रवनीत सिंह बिट्टू का नाम न होने के बाद राजनीतिक गलियारों में नई चर्चाएं शुरू हो गई हैं. राजस्थान से राज्यसभा सदस्य के रूप में रवनीत सिंह बिट्टू का कार्यकाल 21 जून को समाप्त हो रहा है. बीजेपी की राज्यसभा उम्मीदवारों सूची में बिट्टू का नाम नहीं है. इसके बजाय पंजाब बीजेपी के वरिष्ठ नेता और राष्ट्रीय महासचिव तरुण चुघ को मध्य प्रदेश से राज्यसभा भेजा गया है.

पार्टी के भीतर इसे पुराने और वफादार कार्यकर्ताओं को संदेश देने के रूप में देखा जा रहा है कि बाहरी नेताओं की एंट्री के बावजूद संगठन के समर्पित नेताओं की अनदेखी नहीं होगी. तरुण चुघ के संसद पहुंचने से रवनीत बिट्टू के लिए पंजाब की सक्रिय राजनीति में वापसी का रास्ता खुलता दिख रहा है. बिट्टू खुद सार्वजनिक रूप से कह चुके हैं कि 17 साल संसद में रहने के बाद अब वह पंजाब की राजनीति पर ध्यान देना चाहते हैं और पार्टी नेतृत्व से केंद्रीय जिम्मेदारियों से मुक्त करने का अनुरोध कर चुके हैं.

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आजतक से बातचीत में बिट्टू ने कहा, '17 साल संसद में रहने के बाद मैं पंजाब लौटना चाहता हूं. चुनाव हारने के बावजूद बीजेपी ने मुझे मंत्री बनाया. अब मेरी राज्यसभा सदस्यता समाप्त हो रही है और किसी अन्य को मौका मिलना चाहिए. विधानसभा चुनाव की तैयारियां तेज होने वाली हैं, इसलिए मैं पंजाब में सक्रिय भूमिका निभाना चाहता हूं.' लेकिन कभी अच्छे दोस्त रहे और अब कट्टर प्रतिद्वंद्वी बन चुके पंजाब के मुख्यमंत्री भगवंत मान ने भविष्यवाणी की थी कि रवनीत बिट्टू अपना मंत्री पद और राज्यसभा सीट दोनों गंवा देंगे. उनके इस दावे ने राजनीतिक चर्चा को और बढ़ा दिया है.

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि बीजेपी बिट्टू जैसे बड़े सिख चेहरों को जमीनी राजनीति और संगठन विस्तार के लिए इस्तेमाल करना चाहती है, बजाय उन्हें संसद तक सीमित रखने के. 76 वर्षीय केवल सिंह ढिल्लों को पंजाब बीजेपी अध्यक्ष बनाए जाने पर पार्टी के भीतर मिली-जुली प्रतिक्रियाएं सामने आई हैं. कांग्रेस से बीजेपी में आए पूर्व सांसद ढिल्लों ने हाल ही में प्रदेश अध्यक्ष का पद संभाला. उनके पदभार ग्रहण समारोह में अरदास के साथ हिंदू धार्मिक अनुष्ठान भी हुए.

बीजेपी कार्यालय में अपने पहले भाषण की शुरुआत उन्होंने 'जो बोले सो निहाल' के नारे से की, जबकि समापन 'जय श्री राम' के साथ किया. पंजाब बीजेपी अध्यक्ष पद पर केवल सिंह ढिल्लों की नियुक्ति को एक मजबूत सिख चेहरे को आगे लाने और नेतृत्व के खालीपन को भरने की कोशिश माना जा रहा है. लेकिन कार्यक्रम में कई वरिष्ठ नेताओं, पूर्व सांसदों और हाल में शामिल हुए नेताओं की गैरमौजूदगी ने अंदरूनी खींचतान की अटकलों को जन्म दिया.

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आम आदमी पार्टी के पंजाब अध्यक्ष अमन अरोड़ा ने तंज कसते हुए कहा कि केवल ढिल्लों की नियुक्ति बीजेपी का आंतरिक मामला है, लेकिन कैप्टन अमरिंदर सिंह की दूरी और उनके बयानों से साफ है कि पार्टी के भीतर असंतोष है. उन्होंने यह भी कहा कि बीजेपी ने रवनीत बिट्टू और सुनील जाखड़ जैसे नेताओं का जरूरत के हिसाब से इस्तेमाल किया है. हालिया फेरबदल में सुनील जाखड़ को प्रदेश अध्यक्ष पद से हटाकर केवल ढिल्लों को जिम्मेदारी सौंपी गई. संगठन विस्तार और विपक्षी दलों से नेताओं को बीजेपी में लाने में अहम भूमिका निभाने वाले जाखड़ की नई भूमिका को लेकर अटकलें जारी हैं.

वहीं, कैप्टन अमरिंदर सिंह ने खुले तौर पर केवल सिंह ढिल्लों की नियुक्ति को गलत फैसला बताया और 3 जून को हुए पदभार ग्रहण समारोह में शामिल नहीं हुए. इससे यह चर्चा और तेज हो गई कि पार्टी अब नए सिख चेहरों को आगे बढ़ाने की रणनीति पर काम कर रही है. हाल में बीजेपी में शामिल हुए आम आदमी पार्टी के सात राज्यसभा सांसदों में से चार नेता भी ढिल्लों के कार्यक्रम में मौजूद नहीं थे. इनमें राघव चड्ढा, संदीप पाठक, राजिंदर गुप्ता और हरभजन सिंह शामिल थे.

पार्टी के भीतर इस बात को लेकर चर्चा है कि क्या बाहरी नेताओं पर ज्यादा भरोसा किया जा रहा है या फिर मजबूत संगठनात्मक कैडर तैयार करने पर पर्याप्त ध्यान दिया जा रहा है. केवल ढिल्लों ने किसानों के लिए एमएसपी, औद्योगिक विकास, AAP विरोधी अभियान और जमीनी स्तर पर संगठन को मजबूत करने को अपनी प्राथमिकता बताया है. उन्होंने आजतक से कहा, 'हम पंजाब में महाराजा रणजीत सिंह के सुशासन मॉडल को स्थापित करना चाहते हैं.' कुल मिलाकर बीजेपी संगठन विस्तार, विपक्षी नेताओं को पार्टी में शामिल कराने और नशे के खिलाफ अभियान के जरिए 2027 में आम आदमी पार्टी को चुनौती देने की तैयारी कर रही है.

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पंजाब में 2027 की शुरुआत में 117 सदस्यीय विधानसभा के लिए चुनाव होने हैं. बीजेपी फिलहाल दो विधायकों के साथ विधानसभा में मौजूद है और बहुमत के लिए जरूरी 59 सीटों तक पहुंचने का रास्ता बेहद कठिन है. भगवा पार्टी के लिए सबसे बड़ी चुनौती ग्रामीण पंजाब में अपनी स्वीकार्यता बढ़ाने की है, खासकर किसान आंदोलन की पृष्ठभूमि को देखते हुए. हालांकि 2020-21 के किसान आंदोलन के बाद किसानों में बीजेपी के प्रति गुस्सा कुछ हद तक कम हुआ है, लेकिन अविश्वास पूरी तरह खत्म नहीं हुआ है.

कानूनी एमएसपी गारंटी, जल बंटवारा विवाद, पराली जलाने पर दंड और केंद्र सरकार की नीतियों को लेकर किसान संगठनों में अब भी नाराजगी मौजूद है. 2024 के लोकसभा चुनाव में पंजाब में बीजेपी का खाता तक नहीं खुला था. राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि इसके पीछे किसान वर्ग की नाराजगी एक प्रमुख कारण थी. बीजेपी को उम्मीद है कि दूसरे दलों से आने वाले प्रभावशाली नेताओं के जरिए वह इस दूरी को कम कर पाएगी. पार्टी में बढ़ते सिख चेहरों को भी बीजेपी की एक सोची-समझी रणनीति के तौर पर देखा जा रहा है.

इसका मकसद पार्टी की शहरी और हिंदू केंद्रित छवि को बदलकर ग्रामीण सिख मतदाताओं के बीच स्वीकार्यता बढ़ाना है. पार्टी के एक अंदरूनी सूत्र के मुताबिक, 'हर कोई इस रणनीति से खुश नहीं है. तरुण चुघ को राज्यसभा भेजना पारंपरिक हिंदू कैडर को भरोसा दिलाने की कोशिश भी है.' प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ और बीजेपी के कई वरिष्ठ नेता हाल के वर्षों में गुरुद्वारों के दौरे और सिख प्रतीकों के जरिए लगातार समुदाय से संपर्क साधने की कोशिश करते रहे हैं. बीजेपी के प्रति पंजाब के ग्रामीण इलाकों में नाराजगी भले कम हुई हो, लेकिन असली सवाल यह है कि क्या यह स्वीकार्यता वोटों में बदल पाएगी? पंजाब में मजबूत ग्रामीण आधार बनाने की बीजेपी की परीक्षा अभी बाकी है.

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