अभिनेता से नेता बने सी. जोसेफ विजय ने रविवार को तमिलनाडु के मुख्यमंत्री पद की शपथ ले ली है.सूबे में करीब छह दशक से दो प्रमुख द्रविड़ दलों DMK और AIADMK का बारी-बारी से सत्ता में आने का दौर खत्म हो गया. करीब 2 साल पहले राजनीति में एंट्री करने वाले जोसेफ विजय सत्ता पर काबिज हो गए हैं, लेकिन कांग्रेस और अन्य छोटे दलों के समर्थन से बनी सरकार को वो कितने दिन चला पाएंगे?
तमिलनाडु विधानसभा चुनाव में विजय की तमिलगा वेट्री कड़गम यानी टीवीके सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी, लेकिन पूर्ण बहुमत हासिल करने में नाकाम रही. ऐसे में विजय को कांग्रेस और लेफ्ट सहित कई पार्टियों के साथ सरकार बनाने के लिए मजबूर होना पड़ा.
विजय को सरकार बनाने के लिए काफी मशक्कत करनी पड़ी. राज्यपाल ने आरएस अर्लेकर ने बहुमत का नंबर न होने का बहाना बनाकर तीन बार विजय को लौटा दिया था. कांग्रेस, VCK और IUML की ओर से विजय की पार्टी TVK को समर्थन देने के बाद रविवार विजय सीएम बने और उनकी पार्टी के 9 नेताओं ने मंत्री पद की शपथ ली.
मुख्यमंत्री बनते ही एक्शन में थलपति विजय
मुख्यमंत्री बनते ही जोसेफ विजय मंच पर ही तीन आदेशों पर हस्ताक्षर किए. हर घर को 200 यूनिट बिजली फ्री, नशे की समस्या से निपटने के लिए हर जिले में विशेष बल बनाना और महिलाओं की सुरक्षा के लिए एक स्पेशल टास्क फ़ोर्स का गठन करना के आदेश. इसके बाद वो अपने आधिकारिक काम को शुरू करने के लिए सचिवालय गए और बाद में पेरियार स्मारक पर श्रद्धांजलि अर्पित की.
तमिलनाडु की सत्ता पर काबिज होने के पहले दिन विजय ने कई तरह के सियासी संदेश देने की कोशिश की. सरकारी योजनाओं की घोषणाओं से लेकर पिछली सरकार की वित्तीय स्थिति की आलोचना,धर्मनिरपेक्षता, अल्पसंख्यकों से किए गए वादे और गठबंधन की राजनीति पर रोशनी डाली. इस तरह से वो अपने पहले ही दिन यह दिखाने की कोशिश की है कि राज्य में उनकी राजनीतिक दिशा क्या होगी?
कैसे चलेगी तमिलनाडु में विजय सरकार
विजय की पार्टी टीवीके कोई वैचारिक पार्टी नहीं है, बल्कि बीजेपी, डीएमके और एआईएडीएमके जैसी अन्य पार्टियों की आलोचना करके सूबे की सियासत में उभरी है. 2026 विधानसभा के चुनाव में टीवीके ने क्षत्रपों के खिलाफ वोट हासिल करके चुनाव जीता. अब तक डीएमके विरोधी राजनीति का नेतृत्व एआईएडीएमके कर रही थी. अब विजय ने वह जगह ले ली है.
कांग्रेस नेता राहुल गांधी की शपथ ग्रहण समारोह में भागीदारी ने काफी ध्यान आकर्षित किया. विजय ने राहुल गांधी को 'भाई' कहकर संबोधित किया, जो यह दिखाता है कि वो राष्ट्रीय स्तर पर बीजेपी के खिलाफ विपक्षी दलों के साथ अच्छे राजनीतिक संबंध बनाने का प्रयास कर रहे हैं. इस तरह विजय ने सत्ता बचाने और अपने भविष्य के राजनीतिक मार्ग को सुरक्षित रखने की ज़रूरत को देखते हुए बीजेपी के खिलाफ रुख अपनाया है.
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सत्ता पर काबिज होने के पहले दिन विजय ने तमिलनाडु के उन मतदाताओं का आत्मविश्वास बढ़ाने वाला था, जो बीजेपी विरोधी हैं. बीजेपी विरोधी दलों पर जोर और पेरियार स्मारक का उनका दौरा, ये संकेत हैं कि विजय द्रविड़ राजनीतिक परंपरा को पूरी तरह नकारने के रास्ते पर नहीं हैं. राज्य में कोई भी पेरियार के बिना सियासत नहीं कर सकता. विजय को भी पेरियार की जरूरत है, लेकिन बैसाखी से सहारे बनी सरकार को विजय कितने दिन चला पाएंगे?
बैसाखी पर टिकी है विजय की सरकार
तमिलनाडु चुनाव में टीवीके सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी, जिसे 108 सीटें मिली है. हालांकि, बहुमत का नंबर 118 है. ऐसे में विजय ने तीन बार सरकार बनाने का दावा पेश किया, लेकिन राज्यपाल ने उनके दावे को ठुकरा दिया. इस बीच पर्दे के पीछे डीएमके ने भी सरकार बनाने के लिए अपनी गुप्त प्रक्रिया शुरू कर दी थी, लेकिन AIADMK के साथ बात नहीं बनी सकी. इसके बाद डीएमके प्रमुख एमके स्टालिन ने विजय को 6 महीने का वक्त दे रहे हैं.
स्टालिन के तेवर के बाद ही IUML और VCK ने सार्वजनिक रूप से विजय की पार्टी को अपना समर्थन देने का ऐलान कर दिया. इसके बाद कांग्रेस, लेफ्ट, IUML और वीसीके के समर्थन से भले ही विजय ने सरकार बना ली हो, लेकिन उन्हें गठबंधन सरकार चलाने में आने वाले स्वाभाविक दबावों का सामना करना पड़ेगा.
तमलनाडु में विजय सरकार का जैसे-जैसे समय आगे बढ़ेगा, उन्हें अपने गठबंधन सहयोगियों की ओर से लगातार मांगों का सामना करना पड़ सकता है. ऐसे में उन्हें अपने चुनावी वादों को पूरा करने में कठिनाइयां आ सकती हैं। इस आशंका का आधार यह तथ्य है कि विजय की पार्टी के अधिकांश नेता पहली बार विधायक बने हैं और इस श्रेणी में स्वयं विजय भी शामिल हैं. इसके विपरीत सहयोगी दलों के विधायक सियासी रूप से अनुभवी दिग्गज हैं, जो टीवीके पर दबाव बनाने के लिए दांव चल सकते हैं.
जोसेफ विजय ने दिखा दिए अपने तेवर
विजय भले ही सियासी पिच पर नए खिलाड़ी हों, लेकिन राजनीति को बाखूबी समझते हैं. यही वजह है कि विजय अपने शपथ ग्रहण समारोह के दौरान मंच से ही अपने तेवर दिखा दिए हैं. उन्होंने दो टूक शब्दों में कहा कि राज्य सरकार के भीतर सत्ता का केंद्र केवल वही और सिर्फ वही होंगे. उन्होंने यह स्पष्ट किया कि उनकी प्रत्यक्ष भागीदारी के बिना कुछ भी नहीं होगा.
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मुख्यमंत्री विजय ने इस बात पर भी जोर दिया कि यदि सरकार की सफलताओं का श्रेय उन्हें मिलना है, तो उसकी फेल होने की जिम्मेदारी भी उन्हें ही उठानी होगी. उनके लिए केवल वही जवाबदेह होंगे. इस संदेश के माध्यम से मुख्यमंत्री ने प्रभावी ढंग से यह बता दिया कि वह अपने गठबंधन सहयोगियों के दबाव में आकर कोई भी कदम उठाने के लिए विवश नहीं होंगे बल्कि, वह जो भी पहल करेंगे, उसे सभी संबंधित पक्षों के साथ परामर्श और सहयोग से करेंगे.
डीएमके की सियासत का कैसे करेंगे काउंटर
हालांकि, डीएमके भले ही सत्ता से बाहर हो गई हो, लेकिन राजनीति दांव पेच करने का मौका नहीं छोड़ेगी. राज्य की राजनीति पर डीएमके प्रमुख एम के स्टालिन का काफी हद तक नियंत्रण बना हुआ है.उनका तर्क इस तथ्य पर आधारित है कि हाल के चुनावों में DMK का प्रदर्शन खराब रहा और खुद स्टालिन को भी हार का सामना करना पड़ा. इसके बाद भी डीएमके के गठबंधन के सहयोगी दलों के सहारे विजय की सरकार बनी है, जिसे स्टालिन कभी भी अपने पाले में ला सकते हैं.
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डीएमके ने सरकार गठन के मामले में TVK पर दबाव डाला, उससे यह संकेत मिलता है कि आगे का रास्ता तय करना और प्रशासन का सुचारू संचालन सुनिश्चित करना विजय के लिए कोई आसान काम नहीं होगा. विजय को वामपंथी दलों और कांग्रेस का समर्थन मिला है, हालांकि, यही दल कई वर्षों तक DMK के गठबंधन सहयोगी रहे थे और कांग्रेस पार्टी का भी ऐसा ही इतिहास रहा है.
राष्ट्रीय राजनीति में विशेष रूप से 'इंडिया' नामक बीजेपी-विरोधी गठबंधन के भीतर कोई बदलाव होता है, तो उसका असर तमिलनाडु में भी पड़ना तय है. इस पृष्ठभूमि में भविष्य में सभावित रूप से राजनीतिक अस्थिरता या विधायकों की 'हॉर्स-ट्रेडिंग' जैसी स्थितियों का सामना करना पड़ सकता है. डीएमके ही नहीं बल्कि AIADMK भी विजय की टीवीके को बहुत दिनों तक सत्ता में बने हुए नहीं देखना चाहती है. ऐसे में सियासी शह-मात का खेल विजय के साथ चलता रहेगा?
कुबूल अहमद