पश्चिम बंगाल से लेकर असम, केरल और तमिलनाडु सहित पांच राज्यों के चुनाव नतीजे भले ही बीजेपी के पक्ष में रहे. असम में बीजेपी सत्ता की हैट्रिक लगाने में कामयाब रही तो बंगाल में ममता बनर्जी के मजबूत किले को ध्वस्त कर पहली बार सरकार बनाने में सफल रही है.
देश के पांच राज्यों के चुनाव में बीजेपी की बल्ले-बल्ले हो रही है और क्षत्रपों की हार की सुर्खियां बटोरी हैं, लेकिन आंकड़ों की परतों के नीचे एक ऐसी कहानी दबी है, जो भविष्य की राजनीति का रुख बदल सकती है. यह कहानी है कांग्रेस के पुनरुत्थान की, जिसे सबसे बड़े सियासी गेनर के तौर पर देखा जा रहा है. इसीलिए पांच राज्यों के चुनावी हार में कांग्रेस की जीत छिपी हुई है.
2026 के चुनावी महासमर का सबसे दिलचस्प पहलू 'साइलेंट शिफ्ट' है, जो कांग्रेस को आने वाले समय में एक बार फिर राजनीति की धुरी बना सकती है. राजनीतिक विश्लेषक कांग्रेस के लिए 'रणनीतिक जीत' मान रहे हैं, क्योंकि सत्ता से ज्यादा पार्टी ने अपनी खिसकी हुई 'जमीन' को वापस पाने का मौका दे दिया है, जो कभी उसका गढ़ हुआ करती थी. ऐसे में 'हार' के इस शोर के बीच कांग्रेस इस चुनाव की 'सबसे बड़ी रणनीतिक गेनर' बनकर उभरी है.
केरल में कांग्रेस की 10 साल बाद वापसी
केरलम में कांग्रेस दस साल बाद सत्ता में वापसी करने में सफल रही है. कांग्रेस की अगुवाई वाले यूडीएफ ने प्रचंड बहुमत के साथ सत्ता में वापसी की है तो लेफ्ट के नेतृत्व वाले एलडीएफ को करारी मात खानी पड़ी है. केरलम के नतीजों ने एक बार फिर साबित कर दिया कि दक्षिण भारत में कांग्रेस का किला अभेद्य है, जहां बीजेपी के लिए भी सियासी जमीन पथरीली बनी हुई है. इस तरह दक्षिण में कर्नाटक और तेलंगाना के बाद केरलम में कांग्रेस की सरकार होगी.
राहुल गांधी और प्रियंका गांधी के 'वायनाड प्रभाव' और जमीनी स्तर पर संगठन की मजबूती ने केरलम को कांग्रेस के लिए एक सुरक्षित चारागाह बना दिया है. बीजेपी की तमाम कोशिशों के बाद भी केरलम ने 'तिरंगे' पर ही भरोसा जताया, जो कांग्रेस के राष्ट्रीय मनोबल के लिए टॉनिक जैसा है. 2021 में पांच राज्यों में एक भी राज्य में कांग्रेस नहीं जीत सकी थी, लेकिन इस बार लेफ्ट का किला धराशाही करने में सफल रही.
बंगाल में 'खोई हुई विरासत' की वापसी
पांच राज्यों के चुनावों का सबसे बड़ा 'एक्स-फैक्टर' बंगाल और तमिलनाडु रहे. इन दोनों ही राज्य में कांग्रेस ने भले ही सरकार न बनाई हो, लेकिन उसने वह सियासी स्पेस कब्जा मौका मिल गया है जो दशकों पहले उसके हाथ से फिसल गया था. बंगाल में कांग्रेस दो सीटें जीतने में कामयाब रही है, जबकि 2021 में उसका खाता तक नहीं खुल सका था. इसके अलावा बंगाल में कांग्रेस को 3 फीसदी वोट शेयर भी हो गया है. बंगाल में तृणमूल कांग्रेस (TMC) के कमजोर होने से जो 'विपक्ष का खाली स्थान' पैदा हुआ है, उसे भरने के लिए अब कांग्रेस सबसे स्वाभाविक विकल्प है.
पश्चिम बंगाल में टीएमसी (TMC) की करारी हार और बीजेपी की जीत के बीच, कांग्रेस ने अपनी सीट के साथ वोट शेयर में इजाफा किया है. ममता बनर्जी के कमजोर होते ही वह धर्मनिरपेक्ष मतदाता, जो कभी 'हाथ' का साथ छोड़कर वो दोबारा से घर वापस लौट सकता है.
कांग्रेस मुस्लिम बेल्ट में अपनी सियासी पकड़ को मजबूत करने का मौका मिल गया है, जो कभी लेफ्ट के साथ तो 15 साल से ममता बनर्जी के साथ जुड़ा हुआ है. बंगाल की सत्ता परिवर्तन के बाद बीजेपी बनाम कांग्रेस का मैदान बन सकता है, क्योंकि लेफ्ट कमजोर और ममता बनर्जी कब तक अपने कुनबे को समेटकर रख पाती हैं.
द्रविड़ राजनीति के आगे तमिल की सियासत
तमिलनाडु में करीब छह दशक से सत्ता से बाहर है. द्रविड़ मुनेत्र कड़गम (DMK) के खिलाफ उपजी सत्ता विरोधी लहर और 'थलापति' विजय के उदय के बीच, कांग्रेस ने अपनी एक स्वतंत्र पहचान बनाई है. दशकों के बाद तमिलनाडु की सियासत द्रविड़ राजनीति से बाहर निकल रही है. तमिलनाडु में विजय को मौका देने का मतलब साफ है कि मतदाता अब पारंपरिक चेहरों से इतर नए विकल्पों को मौका दे रही है.
दक्षिण भारत के तमिलनाडु की सियासत में बड़ा उलटफेर है. तमिलनाडु में 'द्रविड़ राजनीति'(DMK-AIADMK) के दशकों पुराने वर्चस्व के लिए सबसे बड़ा खतरा साबित है, जो कांग्रेस को तमिल की सियासत में उभरने का मौका बन सकती है.
द्रविड़ सियासत की वजह से ही कांग्रेस सत्ता से बाहर हुई और दोबारा वापसी नहीं कर सकी और कांग्रेस सिर्फ एक 'जूनियर पार्टनर' के तौर पर रही है, लेकिन अब जिस तरह विजय की पार्टी को समर्थन देने का ऐलान किया है, उससे साफ है कि मतदाता फिर से एक 'राष्ट्रीय पार्टी' के रूप में कांग्रेस की ओर उम्मीद से देख रहा है.
असम में 'धार्मिक ध्रुवीकरण' के अंत का आगाज
असम के नतीजे कांग्रेस के लिए किसी जैकपॉट से कम नहीं हैं. यहां बीजेपी भले ही सत्ता की हैट्रिक लगाने में कामयाब रही हो, लेकिन कांग्रेस ने बदरुद्दीन अजमल (AIUDF) की राजनीति का अंत कर दिया है. लंबे समय से असम में मुस्लिम वोट बैंक अजमल और कांग्रेस के बीच बंटा रहता था, जिसका सीधा फायदा बीजेपी को मिलता था, लेकिन 2026 में अल्पसंख्यक मतदाता पूरी तरह कांग्रेस के पाले में आ गए.
बदरुद्दीन अजमल की हार ने असम के भविष्य की राजनीति को 'बाइपोलर'(दो ध्रुवीय) बना दिया है. अब बीजेपी के सामने कोई 'वोट कटवा' दल नहीं बचा है, जिससे कांग्रेस की राह आसान नजर आ रही है. कांग्रेस को मुस्लिम वोटों को खोने का डर नहीं होगा और वो अब बीजेपी के वोटबैंक में सेंधमारी के लिए खुलकर खेल सकती है?
कांग्रेस कैसे बन गई असली 'गेनर'?
पांच राज्यों के चुनाव नतीजे ने ममता बनर्जी और बदरुद्दीन अजमल जैसे नेताओं के कमजोर होने से कांग्रेस अब विपक्षी 'INDIA' ब्लॉक की सबसे अहम रोल में आ गई है. अब क्षेत्रीय दल कांग्रेस की शर्तों पर राजनीति करेंगे. पिछले कई दशक से कांग्रेस के लिए सबसे बड़ी समस्या यह थी कि वह क्षेत्रीय दलों (TMC, DMK) की 'पिछलग्गू' बनकर रह गई थी. 2026 के इन चुनाव नतीजों ने कांग्रेस को एक नया 'स्पेस' दिया है.
कांग्रेस ने लिए मौका है कि साबित करे कि वह बीजेपी के 'सांस्कृतिक राष्ट्रवाद' के सामने 'संवैधानिक राष्ट्रवाद' को खड़ा कर सकती है और वोट भी पा सकती है. इन चुनावों ने सुस्त पड़े कांग्रेस कार्यकर्ताओं में नई जान फूंक दी है. उत्तर से दक्षिण तक पार्टी का कैडर अब 'डिफेंसिव' नहीं, बल्कि 'ऑफेंसिव' मोड में है. राजनीति में कभी-कभी एक कदम पीछे हटना, लंबी छलांग की तैयारी होती है.
2026 के विधानसभा चुनाव कांग्रेस के लिए वही 'लंबी छलांग' साबित होने वाले हैं. पार्टी ने अपनी पुरानी जमीन वापस पा ली है,क्षेत्रीय सहयोगियों को अपनी ताकत दिखा दी है और केरल जैसा महत्वपूर्ण राज्य अपनी झोली में डाल लिया है.अगर आप सिर्फ 'सत्ता' को जीत मानते हैं, तो बीजेपी जीती है, लेकिन अगर आप 'भविष्य की संभावनाओं' को जीत मानते हैं, तो कांग्रेस ने बाजी मार ली है. 2029 का महासमर अब और भी रोमांचक होने वाला है, क्योंकि उसे सियासी तौर पर उभरने का मौका मिल गया है.
बीजेपी बनाम कांग्रेस की बिछेगी बिसात
तमिलनाडु में गठबंधन के बावजूद कांग्रेस ने अपनी स्ट्राइक रेट में सुधार किया है. अब कांग्रेस दिल्ली में 'जूनियर पार्टनर' के बजाय एक 'निर्णायक शक्ति' के रूप में सौदेबाजी करने की स्थिति में है. पांच चुनावों में राहुल गांधी की 'भारत जोड़ो न्याय यात्रा 2.0' का असर साफ दिखा. कांग्रेस ने जिन मुद्दों जाति जनगणना, बेरोजगारी और संविधान बचाओं, को उठाया था, वे अब केवल चुनावी नारे नहीं रहे, बल्कि एक राष्ट्रीय विमर्श बन गए हैं.
कांग्रेस अब 'सॉफ्ट हिंदुत्व' के बजाय अपनी मूल 'सेकुलर और समावेशी' विचारधारा पर आक्रामक है, जिसने उसे बीजेपी के सामने एकमात्र वैचारिक विकल्प के रूप में स्थापित कर दिया है. 2026 के नतीजों ने एक बात साफ कर दी है कि ममता बनर्जी या अन्य क्षेत्रीय नेता राष्ट्रीय स्तर पर मोदी को चुनौती देने वाले 'एकमात्र चेहरे' नहीं हो सकते.
क्षेत्रीय दलों के अपने-अपने गढ़ों में कमजोर पड़ने के बाद, अब 2029 के लिए 'INDIA' गठबंधन का नेतृत्व निर्विवाद रूप से कांग्रेस और राहुल गांधी के पास आ गया है. इन हारों ने कांग्रेस को मौका दिया है कि वह उन राज्यों में नए और युवा नेतृत्व को आगे लाए, जहां पुराने चेहरे बोझ बन चुके थे.
इतिहास गवाह है कि जब-जब क्षेत्रीय दल धराशायी हुए हैं, कांग्रेस ने फीनिक्स पक्षी की तरह वापसी की है. 2026 के नतीजों ने बीजेपी को सत्ता तो दी, लेकिन कांग्रेस को 'संजीवनी' दी है. कांग्रेस ने साबित कर दिया है कि अब केवल एक 'पार्टी' नहीं, बल्कि बीजेपी के खिलाफ एकमात्र 'पैन-इंडिया' ताकत है. क्षेत्रीय दलों की राजनीति सिमटने से आगे की सियासी लड़ाई कांग्रेस बनाम बीजेपी की जंग बन सकती है?
कुबूल अहमद