सुप्रीम कोर्ट ने गृहस्थी और जीवन निर्माण में हाउसवाइफ के योगदान को लेकर एक बहुत बड़ा और ऐतिहासिक फैसला सुनाया है. अदालत ने कहा है कि एक गृहिणी के किए जाने वाले घरेलू काम और परिवार की देखभाल की सेवाओं का अपनी एक अहमियत होती है. इस अहमियत को किसी भी कीमत पर नजरअंदाज नहीं किया जा सकता.
अपने फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि एक गृहणी का योगदान सिर्फ उसके परिवार तक ही सीमित नहीं होता है. वो देश के मानव संसाधन और राष्ट्र निर्माण में भी बेहद अहम भूमिकाएं निभाती हैं. इसलिए, उन्हें सिर्फ 'होममेकर' कहने के बजाय 'नेशन बिल्डर' कहा जाना चाहिए.
जस्टिस संजय करोल की अध्यक्षता वाली बेंच ने ये अहम फैसला दिया है. सुप्रीम कोर्ट ने टिप्पणी की कि शादी का मतलब घर में नौकरानी लाना नहीं है. घर के जितने भी कामकाज होते हैं, वो पति और पत्नी दोनों की साझा जिम्मेदारी हैं.
अदालत ने महिलाओं के करियर के अधिकार पर भी बड़ी बात कही. सुप्रीम कोर्ट के मुताबिक, अगर कोई पत्नी अपने पेशेवर करियर (जैसे डॉक्टर या किसी पद पर) को आगे बढ़ाना चाहती है और अपने बच्चे के लिए एक स्थिर माहौल सुनिश्चित करती है, तो इसे पतियों या ससुराल वालों की भावनाओं को आहत करने वाला कदम नहीं कहा जा सकता.
कोर्ट ने कहा कि इसे पत्नी की तरफ से की गई क्रूरता भी नहीं माना जा सकता है. महिला की अपनी व्यक्तिगत पहचान शादी के बाद कभी खत्म नहीं होती.
पारिवारिक संपत्ति में समान अधिकार
अदालत ने ये भी माना है कि गृहणियां घर के लिए अपना बेशकीमती समय देती हैं और कई तरह के त्याग करती हैं. इसी आधार पर उन्हें संयुक्त रूप से खरीदी गई पारिवारिक संपत्तियों में भी पति के समान अधिकार हासिल होते हैं.
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि पत्नी और गृहिणी का योगदान सिर्फ घरेलू कामकाज तक सीमित नहीं है. वो बच्चों के पालन-पोषण, परिवार के विकास, नई पीढ़ी को तैयार करने और समाज के निर्माण में केंद्रीय भूमिका निभाती हैं. इसलिए, उनके इस काम को आर्थिक और सामाजिक दोनों ही नजरिए से उचित मान्यता मिलनी चाहिए.
दुर्घटना में मौत पर मुआवजे के लिए नई गाइडलाइन
वहीं, हाउसवाइफ की सड़क दुर्घटना में मौत या घायल होने पर मुआवजे के दावों को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने एक नई गाइडलाइन जारी की है. अदालत ने कहा कि जब किसी हादसे के कारण कोई परिवार अपनी गृहिणी की घरेलू देखभाल और सेवाओं से वंचित हो जाता है, तो मुआवजा तय करते समय उनके इस योगदान का आकलन करना बेहद जरूरी है.
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इसी मकसद से सुप्रीम कोर्ट ने 'घरेलू देखभाल के नुकसान' का न्यूनतम मूल्य 30,000 रुपए प्रति माह तय किया है. कोर्ट ने बताया कि मुआवजे के दावों में 'भविष्य की कमाई' और परिवार और देश के विकास में महिला के 'भविष्य के योगदान' की गणना करने के नियमों में उसके इस घरेलू योगदान को जरूरी से शामिल किया जाना चाहिए.
हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीशों को निर्देश, समय पर मिले न्याय
बेंच ने कहा कि ये सिद्धांत पहले दिए गए फैसलों में तय स्टैंडर्ड के अतिरिक्त है. सुप्रीम कोर्ट ने देश के सभी हाई कोर्ट के मुख्य न्यायाधीशों से उम्मीद जताई है कि वो खुद ऐसे मामलों की निगरानी करें. इससे मोटर दुर्घटना मुआवजा दावों का निपटारा समय सीमा के भीतर तेजी से हो सकेगा.
संजय शर्मा