'जो भगवान अयप्पा के भक्त नहीं वो सबरीमला की परंपरा को कैसे दे सकते हैं चुनौती...', SC का केंद्र से सवाल

सुप्रीम कोर्ट में सबरीमला मंदिर विवाद पर नौ जजों की बेंच ने धर्म और कानून के बीच बहस जारी रखी. केंद्र सरकार से सवाल पूछे गए कि गैर-भक्त कैसे मंदिर की परंपराओं को चुनौती दे सकते हैं.

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सुप्रीम कोर्ट में सबरीमाला मंदिर में महिलाओं के प्रवेश मामले में सुनवाई जारी है सुप्रीम कोर्ट में सबरीमाला मंदिर में महिलाओं के प्रवेश मामले में सुनवाई जारी है

aajtak.in

  • नई दिल्ली,
  • 08 अप्रैल 2026,
  • अपडेटेड 8:13 PM IST

सुप्रीम कोर्ट में सबरीमला विवाद और धर्म बनाम कानून को लेकर बहस जारी है. बुधवार को सुनवाई का दूसरा दिन रहा, जहां नौ जजों की बड़ी बेंच इस पूरे मामले की सुनवाई कर रही है. दिनभर चली इस बहस में पक्ष-विपक्ष से तमाम दलीलें पेश की गईं और तर्क रखे गए. इस दौरान सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार से अहम सवाल किया कि जो लोग भगवान भगवान अयप्पा के भक्त नहीं हैं, वे केरल के सबरीमला मंदिर की परंपराओं को कैसे चुनौती दे सकते हैं?

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बुधवार को सुनवाई का दूसरा दिन रहा
नौ जजों की इस पीठ में भारत के मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत, न्यायमूर्ति बी वी नागरत्ना, एम एम सुंदरेश, अहसानुद्दीन अमानुल्लाह, अरविंद कुमार, ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह, प्रसन्ना बी वराले, आर महादेवन और जॉयमाल्या बागची शामिल हैं.

कौन थे सबरीमला के मूल याचिका कर्ता
सुप्रीम कोर्ट ने धार्मिक स्वतंत्रता के दायरे पर सात सवाल तय किए हैं. इनमें एक अहम सवाल यह है कि क्या कोई ऐसा व्यक्ति, जो किसी धार्मिक संप्रदाय या समूह से संबंधित नहीं है, जनहित याचिका (PIL) दाखिल कर उस संप्रदाय की प्रथा को चुनौती दे सकता है. सुनवाई के अंत में न्यायमूर्ति बी वी नागरत्ना ने सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता से पूछा कि सबरीमला मामले में मूल याचिकाकर्ता कौन थे? उन्होंने कहा, “आपकी दलील से यह स्पष्ट होता है कि मूल याचिकाकर्ता भक्त नहीं थे. किसी भी भक्त ने इस प्रथा को चुनौती नहीं दी. फिर ये याचिकाकर्ता कौन हैं?”

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इस पर तुषार मेहता ने जवाब दिया कि मूल याचिकाकर्ता इंडियन यंग लॉयर्स एसोसिएशन नामक वकीलों का संगठन है. न्यायमूर्ति नागरत्ना ने कहा, “वे भक्त नहीं हैं. स्पष्ट करें कि क्या भगवान अयप्पा का कोई भक्त इस मामले में रिट याचिका दाखिल कर सकता है? अगर कोई गैर-भक्त, जो इस मंदिर से जुड़ा नहीं है, चुनौती देता है, तो क्या अदालत ऐसी याचिका स्वीकार कर सकती है?”

उन्होंने आगे कहा कि ट्रायल कोर्ट में अगर किसी एसोसिएशन की ओर से मुकदमा दायर किया जाता है, तो सबसे पहले सिविल प्रक्रिया संहिता के तहत यह देखा जाता है कि क्या उसमें कोई कारण (cause of action) है या नहीं. यदि कारण नहीं है, तो याचिका खारिज कर दी जाती है.

PIL स्वीकार करने में सतर्क हो गई हैं अदालतें
मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने कहा कि ऐसे मामलों में उन्होंने अक्सर 'ज्यूडिशरी सिस्टम के इनविजिबल विक्टिम' टर्म का इस्तेमाल किया है. तुषार मेहता ने इसे 'मौन बहुमत और मुखर अल्पसंख्यक के बीच की लड़ाई' बताया. उन्होंने कहा कि जनहित याचिका (PIL) की शुरुआत Bandhua Mukti Morcha v. Union of India जैसे मामलों में हुई थी, जब आम लोगों के पास अदालत तक पहुंच के साधन नहीं थे. अब ई-फाइलिंग जैसी सुविधाओं के कारण कोई भी व्यक्ति सीधे अदालत तक पहुंच सकता है.

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उन्होंने यह भी कहा कि आज कई PIL 'मोटिवेटेड' होती हैं और इनके पीछे अन्य लोग होते हैं. इस पर मुख्य न्यायाधीश ने कहा कि अदालतें खुद भी PIL स्वीकार करने में काफी सतर्क हो गई हैं. 'हमने इसके लिए मानदंड तय किए हैं और हर दिन हम यह जांचते हैं कि याचिका में वास्तविक मुद्दा है या नहीं. उन्होंने जोड़ा कि 2006 से 2026 तक के दौरान स्थिति बदली है और अब अदालत ज्यादा सावधानी बरतती है,. 

क्या है सबरीमला का विवाद
सितंबर 2018 में सुप्रीम कोर्ट की पांच जजों की संवैधानिक पीठ ने 4:1 के बहुमत से फैसला सुनाते हुए 10 से 50 वर्ष की महिलाओं के सबरीमाला मंदिर में प्रवेश पर लगे प्रतिबंध को असंवैधानिक करार दिया था. इसके बाद 14 नवंबर 2019 को तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश रंजन गोगोई की अध्यक्षता वाली पीठ ने 3:2 के बहुमत से इस मुद्दे को बड़े संविधान पीठ के पास भेज दिया. अदालत ने तब विभिन्न धर्मों में महिलाओं के साथ भेदभाव और धार्मिक स्वतंत्रता के व्यापक सवाल तय किए थे, जिन्हें तथ्यों के आधार पर ही अंतिम रूप से तय किया जा सकता है.

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