करीब 47 साल बाद लक्षद्वीप में शराब की रेगुलेटेड बिक्री का रास्ता खुल गया है. यहां 1979 के बाद से शराब पर प्रतिबंध था. 97 प्रतिशत मुस्लिम आबादी वाले इस केंद्र शासित प्रदेश में केंद्र सरकार ने लक्षद्वीप प्रोहिबिशन रेगुलेशन को रद्द कर दिया है. इसके साथ ही अब लाइसेंस प्राप्त दुकानों और एजेंसियों के जरिए शराब की बिक्री की अनुमति दी जाएगी.
लंबे समय तक लागू रहे शराबबंदी कानून के तहत कवरत्ती और बंगाराम द्वीपों में सरकारी बार और चुनिंदा टूरिस्ट रिसॉर्ट्स को छोड़कर पूरे द्वीप समूह में शराब की बिक्री और सेवन पर कड़ी रोक थी. हालांकि, अब यह व्यवस्था बदल चुकी है. 5 जून को लागू किए गए नए नियमों के साथ लक्षद्वीप में शराब को लेकर पूरी नीति का ढांचा बदल गया है.
नया लक्षद्वीप एक्साइज रेगुलेशन, 2026 शराबबंदी व्यवस्था की जगह एक लाइसेंसिंग फ्रेमवर्क लेकर आया है. इसके तहत शराब के निर्माण, भंडारण, आयात, निर्यात, परिवहन, खरीद, बिक्री और सेवन को नियंत्रित किया जाएगा. सरकारी कॉर्पोरेशन और एजेंसियों को भी शराब के आयात और खुदरा बिक्री के लिए लाइसेंस लेने की अनुमति दी गई है.
हालांकि, सरकार ने यह भी स्पष्ट किया है कि यह पूरी तरह खुला शराब बाजार नहीं होगा. शराब से जुड़े टैक्स काफी ऊंचे रखे गए हैं. इंडियन मेड फॉरेन लिकर (IMFL) और विदेशी शराब पर 400 प्रतिशत एक्साइज ड्यूटी, बीयर पर 200 प्रतिशत और वाइन पर 80 प्रतिशत कर लगाया गया है. दिल्ली में शराब पर 25 प्रतिशत वैट लागू है.
नए कानून के तहत लक्षद्वीप के प्रशासक को व्यापक अधिकार दिए गए हैं. वे शराब की खरीद, बिक्री, सेवन और भंडारण पर सीमाएं तय कर सकते हैं. जरूरत पड़ने पर पूरे लक्षद्वीप या उसके किसी हिस्से में शराब पर रोक भी लगा सकते हैं. इसके साथ ही 21 वर्ष से कम आयु के लोगों को शराब बेचना पूरी तरह प्रतिबंधित रहेगा.
लक्षद्वीप द्वीप समूह में कुल 36 द्वीप हैं, जिनमें से केवल 10 पर आबादी रहती है. इनमें अगत्ती, अमिनी, एंड्रोट, बित्रा, चेतलाट, कदमत, कल्पेनी, कवरत्ती, किल्टन और मिनिकॉय प्रमुख हैं. यहां आने वाले भारतीय और विदेशी पर्यटकों को विशेष परमिट लेना होता है. विदेशी पर्यटक फिलहाल अगत्ती, बंगाराम और कदमत द्वीपों तक ही सीमित हैं.
लक्षद्वीप में शराब पर बैन क्यों लगाया गया?
लक्षद्वीप में 97 प्रतिशत आबादी मुसलमानों की है, जो भारत के किसी भी राज्य या केंद्र शासित प्रदेश में मुस्लिम आबादी का सबसे बड़ा अनुपात है. इसके अलावा यहां की बड़ी आबादी अनुसूचित जनजाति यानी एसटी श्रेणी में भी आती है. यहां की कुल आबादी 64,473 में 61,120 लोग, यानी करीब 95 प्रतिशत, अनुसूचित जनजाति वर्ग से संबंधित हैं.
यही वजह थी कि साल 1979 में यहां शराबबंदी लागू की गई थी. प्रशासन का तर्क था कि द्वीपों की अधिकांश आबादी मुस्लिम है और इस्लाम में शराब का सेवन प्रतिबंधित माना जाता है. इसके बाद लक्षद्वीप भारत के उन चुनिंदा क्षेत्रों में शामिल हो गया, जहां गुजरात, बिहार और पूर्वोत्तर के कुछ राज्यों की तरह शराब की बिक्री पर प्रतिबंध था.
दशकों तक इस कानून को बनाए रखा गया. प्रशासकों का कहना था कि यह स्थानीय सामाजिक और सांस्कृतिक परिस्थितियों के अनुरूप है. राजनीतिक दलों और सामुदायिक संगठनों ने भी शराब की उपलब्धता बढ़ाने के प्रस्तावों का विरोध किया. उनका तर्क था कि यह प्रतिबंध स्थानीय सांस्कृतिक और धार्मिक परंपराओं की रक्षा करता है.
हालांकि, यह प्रतिबंध कभी पूरी तरह लागू नहीं था. पर्यटकों और सरकारी अधिकारियों के लिए कुछ विशेष छूट पहले से मौजूद थीं. खासकर कवरत्ती और बंगाराम द्वीपों के रिसॉर्ट्स में शराब उपलब्ध रहती थी. इससे प्रशासन को प्रतिबंध के व्यापक ढांचे को बनाए रखते हुए पर्यटकों की जरूरतें पूरी करने का मौका मिलता था.
लक्षद्वीप में शराब के नियम क्यों बदले गए?
इस बड़े बदलाव के पीछे सबसे प्रमुख वजह पर्यटन को माना जा रहा है. केंद्र सरकार लंबे समय से लक्षद्वीप को टूरिज्म डेस्टिनेशन के रूप में विकसित करने की कोशिश कर रही है. लेकिन शराब पर सख्त प्रतिबंध की वजह से लक्षद्वीप हिंद महासागर के अन्य लोकप्रिय पर्यटन स्थलों, विशेष रूप से मालदीव, की तुलना में पिछड़ रहा था.
जनवरी 2024 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के लक्षद्वीप दौरे ने भी इस दिशा में नई गति दी. प्रधानमंत्री ने अपने दौरे की तस्वीरें साझा की थीं, जिनमें वे स्थानीय लोगों से बातचीत करते, समुद्र तटों का आनंद लेते और स्नॉर्कलिंग करते दिखाई दिए थे. इसे लक्षद्वीप को विदेशी पर्यटन स्थलों के विकल्प के रूप में पेश करने की एक महत्वपूर्ण पहल माना गया.
इंडिया टुडे को मिले आंकड़ों के अनुसार, लक्षद्वीप में पर्यटकों की संख्या 2020 में केवल 3,875 थी, जो 2024 में बढ़कर 68,328 तक पहुंच गई. यह लगभग 47 प्रतिशत की वृद्धि है. सबसे बड़ा उछाल प्रधानमंत्री मोदी के जनवरी 2024 के दौरे के बाद दर्ज किया गया. केंद्र सरकार ने पर्यटन को बढ़ावा देने के लिए कई साल पहले से प्रयास शुरू कर दिए थे.
साल 2020 में प्रशासक प्रफुल खोड़ा पटेल की नियुक्ति के बाद शराबबंदी में ढील देने की प्रक्रिया तेज हुई. साल 2021 में प्रशासन ने बंगाराम द्वीप से आगे बसे हुए अन्य द्वीपों के पर्यटन स्थलों तक शराब सेवा का विस्तार करने का प्रस्ताव रखा था. हालांकि, इस प्रस्ताव का स्थानीय राजनीतिक दलों, सामुदायिक संगठनों और आम लोगों ने विरोध किया.
शराब से पाबंदी हटाने का विरोध क्यों हो रहा?
विरोध करने वालों का कहना था कि शराब की आसान उपलब्धता से नशे की लत बढ़ सकती है. इसके साथ ही कानून-व्यवस्था पर असर पड़ सकता है. इसके बावजूद प्रशासन नियंत्रित शराब व्यवस्था की दिशा में आगे बढ़ता रहा. साल 2023 में शराब की बिक्री के लिए लाइसेंसिंग फ्रेमवर्क का प्रस्ताव रखने वाला ड्राफ्ट एक्साइज रेगुलेशन जारी किया गया.
इसी साल फरवरी में चेतलाट और बित्रा द्वीप स्थित सरकारी बंगलों को लाइसेंस प्राप्त स्थलों के रूप में अधिसूचित किया गया, जहां परमिट धारकों को शराब परोसी जा सकती थी. शराबबंदी को लेकर बहस अक्सर धार्मिक नजरिए से भी देखी जाती रही है, क्योंकि इस्लाम में शराब पीने पर स्पष्ट रोक है. हालांकि जम्मू-कश्मीर में लंबे समय से शराब उपलब्ध है.
वहीं मालदीव समेत कई मुस्लिम-बहुल देशों में भी निर्धारित क्षेत्रों और पर्यटन जोन में शराब की बिक्री की अनुमति है. साल 1979 के कानून को समाप्त करने के साथ केंद्र सरकार ने यह संकेत दिया है कि लक्षद्वीप में पर्यटन और हॉस्पिटैलिटी के विस्तार की उसकी योजनाओं के लिए शराब पर पूरी तरह प्रतिबंध अब व्यवहारिक विकल्प नहीं माना जा रहा.
शौनक सान्याल