आयात-निर्यात में भारी गिरावट, बढ़ती कीमतें... मिडिल ईस्ट संकट का भारत पर सीधा असर

मिडल-ईस्ट के युद्ध का भारत पर गहरा असर पड़ रहा है. ये भारत की ईंधन आपूर्ति में कटौती कर रहा है, उसकी निर्यात कमाई को कम कर रहा है, व्यापार मार्गों को बाधित कर रहा है और उसकी अर्थव्यवस्था पर दबाव डाल रहा है.

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होर्मुज बंद होने से भी भारत प्रभावित हुआ है. (File Photo: ITGD) होर्मुज बंद होने से भी भारत प्रभावित हुआ है. (File Photo: ITGD)

पल्लवी पाठक

  • नई दिल्ली,
  • 17 अप्रैल 2026,
  • अपडेटेड 7:09 PM IST

मिडिल-ईस्ट युद्ध ने न सिर्फ भारत के आयात में रुकावट डाली है, बल्कि इसने भारत की निर्यात कमाई में भी सेंध लगाई है. मार्च 2026 के आंकड़े अहम गंतव्यों में भारी गिरावट दिखाते हैं. भारत के सबसे बड़े व्यापारिक भागीदारों में से एक, UAE को होने वाला निर्यात मार्च 2025 के मुकाबले में 61.93% गिर गया है.

सऊदी अरब में 45.67% की गिरावट आई है और नीदरलैंड 51.28 नीचे रहा. जबकि ब्रिटेन में 13.51% की गिरावट दर्ज की गई. यहां तक कि भारत के सबसे बड़े निर्यात गंतव्य, अमेरिका को होने वाले निर्यात में भी 20.95% की कमी आई है.

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मार्च 2026 में भारत का कुल निर्यात साल-दर-साल आधार पर 7.44% गिर गया. कम निर्यात का मतलब है भारत में कम विदेशी मुद्रा का आना. ये चिंता की बात है, खासकर इसलिए क्योंकि आयात की लागत बढ़ रही है.

आंकड़े बता रहे हैं सच्चाई

PIB के मुताबिक, मार्च 2026 में इराक से भारत का आयात साल-दर-साल आधार पर 64.3% गिर गया. यूएई से आयात 61.93%, कतर से 47.89% और सऊदी अरब से 45.67% कम हुआ है. हर एक खाड़ी देश जिससे भारत तेल खरीदता है, वहां बड़े पैमाने पर नकारात्मक बदलाव हुए हैं और ये छोटी गिरावटें नहीं हैं.

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खाड़ी देशों पर भारत की निर्भरता

सेंटर फॉर मॉनिटरिंग इंडियन इकोनॉमी (CMIE) के मुताबिक, रूस भारत का सबसे बड़ा ऑयल सप्लायर है, जो आयात के एक चौथाई से थोड़ा ज्यादा हिस्सा रखता है. खाड़ी देश इसके करीब ही हैं.

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इराक 14.34%, यूएई 13.72%, सऊदी अरब 12.54% और कतर 6.4% की सप्लाई करता है. कुवैत, ओमान, बहरीन और ईरान भी भारत को सप्लाई करते हैं. कुल मिलाकर, मिडिल-ईस्ट, भारत की पेट्रोलियम जरूरतों के 50% से ज्यादा की सप्लाई करता है. ये भारत को इस क्षेत्र की उथल-पुथल के लिए बहुत संवेदनशील बनाता है.

ब्रेंट क्रूड में उछाल

28 फरवरी को ईरान पर अमेरिका और इजरायल के हमलों के बाद ब्रेंट क्रूड 120 प्रति बैरल डॉलर के करीब पहुंच गया था. ईरान ने जवाब में स्ट्रेट ऑफ होर्मुज पर पाबंदी लगा दी और खाड़ी के पड़ोसी देशों पर हमले किए. इन हमलों ने कतर में गैस सुविधाओं को भी नुकसान पहुंचाया और सऊदी अरब की 'सटोरप' (SATORP) रिफाइनरी को निशाना बनाया, जिससे आपूर्ति संकट गहरा गया.

हालांकि, अब राहत के कुछ छोटे संकेत मिल रहे हैं. 17 अप्रैल को ब्रेंट क्रूड गिरकर करीब 98 प्रति बैरल डॉलर पर आ गया है, जिसमें लगभग 1.12% की गिरावट आई है. युद्ध शुरू होने के बाद से ये पहली बड़ी गिरावट है.

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अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMF) ने चेतावनी दी है कि संघर्ष और बढ़ने से वैश्विक अर्थव्यवस्था मंदी की ओर जा सकती है. शांति वार्ता जारी है लेकिन अभी भी नाजुक स्थिति में है. ईरान ने लाल सागर के व्यापार को भी बंद करने की धमकी दी है, जब तक कि अमेरिका अपनी नौसैनिक ,नाकेबंदी नहीं हटा लेता. हालांकि, ईरान ने लेबनान-इजरायल में सीजफायर के बाद स्ट्रेट ऑफ होर्मुज खोल दिया है.

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