नवी मुंबई स्थित जवाहरलाल नेहरू पोर्ट (JNPT) भारत का सबसे बड़ा कंटेनर पोर्ट है. आम दिनों में यहां सैकड़ों ट्रकों की आवाजाही रहती है. लेकिन मौजूदा दौर में यहां ट्रक ड्राइवर्स की कमी की बात सामने आ रही है. इसके कारण पोर्ट पर परेशानी का सामना करना पड़ रहा है. असल स्थिति को समझने के लिए मैं JNPT रोड स्थित दिघोडे गांव में BLR लॉजिस्टिक्स के गोदाम पहुंचा. इसके मालिक अशोक गोयल ने बताया कि वेस्ट एशिया में चल रहे संघर्ष के दौरान आयातित कंटेनरों की संख्या में करीब 14 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई. इसी बीच अप्रैल से प्रवासी ट्रक चालक अपने होम स्टेट की ओर लौटने लगे. मई के मध्य तक स्थिति ऐसी हो गई कि एलपीजी आपूर्ति और ड्राइवरों की कमी के कारण करीब 40 हजार कंटेनर बंदरगाह और उससे जुड़े यार्डों में फंस गए.
इसका असर आयातकों पर भी पड़ा और उन्हें भारी नुकसान उठाना पड़ा. केंद्र सरकार के हस्तक्षेप के बाद JNPT प्रशासन और ट्रांसपोर्टरों ने मिलकर लंबित कंटेनरों की संख्या 16 जून तक घटाकर 19 हजार कर दी. हालांकि स्थिति में सुधार हो रहा है, लेकिन ट्रांसपोर्टरों का कहना है कि अभी भी लगभग 30 प्रतिशत चालक वापस नहीं लौटे हैं. लंबी कतारों और बढ़ती ईंधन लागत के कारण उन्हें भारी आर्थिक नुकसान हो रहा है.
अशोक गोयल बताते हैं कि 'हमारे ट्रक हर महीने लगभग 15 हजार ट्रिप करते हैं. पिछले कुछ महीनों में आयात का काम बढ़ा है, लेकिन इसके बावजूद हमें घाटा हो रहा है. कंटेनरों को पोर्ट से निकालना हमारा काम नहीं है, लेकिन अनुरोध पर हमने अपने ट्रक लगाए और एक सप्ताह में करीब 1,000 कंटेनर हटाने में मदद की. लॉजिस्टिक्स क्षेत्र की कई कंपनियों ने बैकलॉग कम करने में सहयोग दिया.'
उन्होंने कहा, 'हमारा काम कंटेनर के कंटेनर फ्रेट स्टेशन (CFS) पहुंचने के बाद शुरू होता है. वहां से हम उन्हें देशभर में पहुंचाते हैं. लेकिन बढ़ती भीड़ के कारण एक ट्रक को एक किलोमीटर की दूरी तय करने में दो घंटे लग रहे हैं. कई चालक 12-12 घंटे तक सड़क पर फंसे रहते हैं और उन्हें खाना तक नहीं मिल पाता. पिछले वर्षों में जून तक लगभग सभी चालक लौट आते थे, लेकिन इस बार खराब परिस्थितियों के कारण 30 प्रतिशत चालक अभी भी वापस नहीं आए हैं.'
गोयल ने बताया कि उनके 800 ट्रकों में से करीब 70 खड़े हैं. 'हमें बाहर से ट्रक किराये पर लेने पड़ रहे हैं, जिसके लिए अतिरिक्त पैसा देना पड़ता है. दूसरी तरफ आयातकों के साथ हमारी दरें सालभर के लिए तय होती हैं. ईंधन की कीमतें बढ़ रही हैं. एक खाली कंटेनर लोड करने में ही आठ घंटे लग जाते हैं. जहां मुझे हर सप्ताह 10 लाख रुपये का मुनाफा होना चाहिए, वहां मैं 5 लाख रुपये का नुकसान झेल रहा हूं. इसी वजह से अब कोई ट्रांसपोर्टर नए ट्रक खरीदने के बारे में नहीं सोच रहा.'
JNPT रोड पर जाम में फंसे कुछ ट्रक चालकों से भी मैंने बात की. प्रवासी चालक राम यादव ने कहा, 'मेरी बचत खत्म हो रही थी इसलिए गांव से वापस आना पड़ा. लेकिन मेरे राज्य के कई चालक लौटना ही नहीं चाहते. जो लौट भी रहे हैं, वे JNPT में काम करने के इच्छुक नहीं हैं. हमें 10 हजार रुपये मासिक वेतन और 300 रुपये दैनिक भत्ता मिलता है. एलपीजी संकट के कारण खाने-पीने की चीजें महंगी हो गई हैं. हम घर पैसे भी नहीं भेज पा रहे हैं.'
उत्तर प्रदेश के रहने वाले चालक अब्दुल मुकील ने कहा, 'लंबे जाम से स्थानीय लोग परेशान हैं और कई बार हमारे ट्रकों पर पत्थर भी फेंके जाते हैं. कंटेनर फ्रेट स्टेशन तक पहुंचने में चार से आठ घंटे लग जाते हैं. महंगाई और खराब कामकाजी परिस्थितियों के कारण यूपी के कई चालक वापस नहीं लौटे हैं.'
दिघोडे से लगभग 30 मिनट की दूरी पर स्थित जेएनपीए के प्रशासनिक भवन, शेवा रोड पर मेरी अगली मुलाकात JNPA के चीफ जनरल मैनेजर (ट्रैफिक) गिरीश थॉमस से हुई.
उन्होंने बताया, 'पिछले कुछ महीनों से हमने देखा कि टैंकर और कंटेनर तो बड़ी संख्या में आ रहे थे, लेकिन उन्हें आगे नहीं भेजा जा रहा था. इसकी मुख्य वजह श्रमिकों और चालकों की कमी थी. गर्मियों में सामान्य तौर पर 15 से 20 प्रतिशत प्रवासी कामगार अपने घर जाते हैं, लेकिन इस बार असम और पश्चिम बंगाल के चुनावों तथा बढ़ती महंगाई के कारण यह संख्या कहीं अधिक रही. इसी वजह से मई के मध्य तक करीब 40 हजार कंटेनर लंबित हो गए.'
थॉमस ने कहा, 'स्थिति सुधारने के लिए हमने टैंकरों के लिए ग्रीन कॉरिडोर जैसी कई व्यवस्थाएं शुरू कीं, जिससे लंबित कंटेनरों की संख्या घटकर 19 हजार रह गई है. अब हालात धीरे-धीरे सामान्य हो रहे हैं. मार्च और मई के बीच इस वर्ष JNPT पर पिछले साल की तुलना में 14.5 प्रतिशत अधिक आयातित कंटेनर पहुंचे हैं. इतनी बड़ी वृद्धि असामान्य है और इसी कारण कंटेनर फ्रेट स्टेशनों पर देरी देखने को मिल रही है.'
मुस्तफा शेख