Farmers protest: तीन कृषि कानून....टिकैत के आंसू और पीएम मोदी का बड़ा फैसला, ऐसा रहा किसान आंदोलन

Farmer protest: आज 26 नवंबर है. आज ही के दिन पिछले वर्ष किसान आंदोलन की शुरुआत हुई थी. यानी आज किसान आंदोलन को एक साल पूरा हो गया है. इस एक साल के दौरान किसान और सरकार के बीच वार्ताओं के दौर भी चले. हिंसा के दौर भी चले. लेकिन किसान आंदोलन खत्म नहीं हुआ.

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One Year of Kisan Andolan One Year of Kisan Andolan

aajtak.in

  • नई दिल्ली,
  • 26 नवंबर 2021,
  • अपडेटेड 10:38 AM IST
  • किसान आंदोलन का आज एक साल पूरा
  • किसान आंदोलन ने देखे कई बदलाव, लड़ाई जारी

आज 26 नवंबर है. आज ही के दिन पिछले वर्ष किसान आंदोलन की शुरुआत हुई थी. यानी आज किसान आंदोलन को एक साल पूरा हो गया है. इस एक साल के दौरान किसान और सरकार के बीच वार्ताओं के दौर भी चले. हिंसा के दौर भी चले. लेकिन किसान आंदोलन खत्म नहीं हुआ.

कैसे शुरू हुआ था किसान आंदोलन?

पिछले साल केंद्र सरकार द्वारा बनाए गए तीनों कृषि कानूनों के बाद ही किसान आंदोलन की शुरुआत हो गई थी. जब तीन नवंबर को पंजाब और हरियाणा में किसान संघों ने दिल्ली चलो का आह्वान किया, इसके बाद 26 और 27 नवंबर 2020 को इन राज्यों से बड़ी संख्या में किसान दिल्ली की अलग-अलग सीमाओं की तरफ बढ़े. लेकिन किसानों को दिल्ली में घुसने से रोका गया. सिंघू बॉर्डर पर आंसू गैस के गोले छोड़े गये. पुलिस और किसानों का आमना सामना हुआ और फिर किसानों ने दिल्ली के बॉर्डरों पर ही आंदोलन शुरू कर दिया.

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वो हिंसा जिसने खत्म सा कर दिया था आंदोलन

देखते ही देखते गाजीपुर बॉर्डर पर राकेश टिकैत समेत पश्चिम यूपी के नेताओं ने अपना डेरा जमा लिया और किसानों की संख्या में इजाफा होने लगा. इसके बाद केंद्र और किसानों के बीच बातचीत का दौर शुरू हो गया था. पहली बातचीत अक्टूबर 2020 को हुई. इसके बाद एक दिसंबर को किसान नेता और मंत्री फिर बैठे. तीसरी बैठक तीन दिसंबर को हुई. पांच दिसंबर को चौथे दौर की बैठक हुई. लेकिन आठ दिसंबर को जब पांचवी वार्ता भी पेल हो गई तो किसानों ने भारत बंद किया. 22 जनवीर 2021 को किसानों और सरकार के बीच 11वें दौर की और आखिरी बातचीत हुई. सरकार से बातचीत के बीच ही किसान संगठनों ने 26 जनवरी को रैली निकालने का ऐलान किया. जिसके बाद 26 जनवरी को लालकिला और आईटीओ समेत दिल्ली के कई इलाकों में जो हिंसा हुई, उसे दुनिया ने देखा.

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टिकैत के आंसू और आंदोलन का पुनर्जन्म

इसी दौरान लालकिले पर धार्मिक झंडा भी फहराया गया..जिसे लेकर काफी विवाद हुआ. 26 जनवरी की हिंसा के बाद लगने लगा कि आंदोलन शायद खत्म हो जाएगा. इस बीच कुछ किसान संगठनों ने भी अपने आप को आंदोलन से पीछे कर लिया. लेकिन 28 जनवरी को भारतीय किसान यूनियन के नेता राकेश टिकैत के आंसुओं ने आंदोलन को और तेज कर दिया. अगली सुबह यानी 29 जनवरी को पूरा माहौल ही बदल गया. रात में ही किसान गाजीपुर बॉर्डर पहुंचने लगे. जिसके बाद पुलिस प्रशासन ने गाजीपुर बॉर्डर पर सड़कों पर कीलें गाड़ दीं. ताकि किसानों के ट्रैक्टर दिल्ली की सीमा में ना घुसने पाएं.

पीएम मोदी का बड़ा फैसला

इसी बीच किसानों के लगातार विरोध के बाद पूरा मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा. तीनों कृषि कानूनों पर रोक लगाने का आदेश दिया गया. इस मामले में कमेटी भी बनाई गई. सरकार ने डेढ़ साल के लिए कानूनों को निलंबित भी कर दिया. लेकिन किसान अड़े रहे. इस दौरान आंदोलन में शामिल करीब सात सौ किसानों की मौत भी हुई जिसमें लखीमपुर खीरी की घटना भी शामिल है, जहां केंद्रीय गृह राज्यमंत्री अजय मिश्रा टेनी के बेटे पर प्रदर्शनकारी किसानों को अपनी कार से कुचलने का आरोप है.

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इस एक साल में किसानों ने काफी कुछ सहा है. लेकिन ये आंदोलन सरकार के लिए भी सिरदर्द बना रहा. आखिरकार पीएम मोदी को तीनों कृषि कानून रद्द करने का ऐलान करना पड़ा. अब कृषि कानूनों को संसद में तिलांजलि देना बाकी है. लेकिन किसान आंदोलन अभी भी जारी है. क्योंकि अब बात सिर्फ कृषि कानूनों तक सीमित नहीं है.

किसान नेता राकेश टिकैत ने कहा है कि एक साल में किसान ने कुछ नहीं खोया है बल्कि एकजुटता पाई है. टिकैत ने कहा है कि हमें तो एमएसपी पर गारंटी चाहिए, किसान को सीधा फायदा एमएसपी की गारंटी से होगा, वह (सरकार) दे नहीं रहे और फिर बहस छेड़ रहे हैं कि किसान नहीं मान रहे. राकेश टिकैत ने कहा है कि आंदोलन ठीक जा रहा है, यह खेत से संसद की ओर जा रहा है, यह खेत में चलेगा और मजबूती से आगे बढ़ेगा.

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