ठंड बढ़ने के साथ उत्तर भारत की हवा में घुलने लगा 'जहर'

पिछले एक महीने के भीतर हवा में पीएम-2.5 की मात्रा में सात गुनी बढ़ोत्तरी हुई है. यही हाल उत्तर भारत के बाकी इलाकों में भी है. जहां हवा की गुणवत्ता ठंड बढ़ने के साथ खराब होने लगी है.

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उत्तर भारत में लगातार बदल रहा मौसम (PTI) उत्तर भारत में लगातार बदल रहा मौसम (PTI)

दीपू राय

  • नई दिल्ली,
  • 23 अक्टूबर 2020,
  • अपडेटेड 4:10 PM IST
  • दिल्ली समेत उत्तर भारत में बदलने लगी हवा
  • ठंड बढ़ने के साथ ही मुश्किल हुआ सांस लेना

दिल्ली समेत उत्तर भारत के ज्यादातर इलाकों की हवा खतरनाक स्तर तक प्रदूषित हो गई है. प्रदूषण के लिए सबसे खतरनाक माना जाने वाले कण पीएम-2.5 की मात्रा दिल्ली के आसपास के इलाकों में 144 माइक्रोग्राम प्रति मीटर क्यूब तक पहुंच गया है. पिछले एक महीने के भीतर हवा में पीएम-2.5 की मात्रा में सात गुनी बढ़ोत्तरी हुई है. यही हाल उत्तर भारत के बाकी इलाकों में भी है. जहां हवा की गुणवत्ता ठंड बढ़ने के साथ खराब होने लगी है.

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सैटेलाइट से लिए गए आंकड़े बताते हैं कि पिछले एक महीने में जैसे-जैसे तापमान में कमी होती गई है हवा में पीएम-2.5 की मात्रा बढ़ती गई है. 23 सितंबर को दिल्ली और आसपास के इलाकों में पीएम-2.5 का औसत स्तर 25 के आसपास था जो अगले एक हफ्ते में 40 पर पहुंचा और फिर पंद्रह दिन बाद यानी सोलह अक्टूबर को यह 59 के स्तर पर पहुंच गया. लेकिन सबसे तेज बढ़ोतरी पिछले एक हफ्ते में हुई है, एक हफ्ते में पीएम-2.5 का स्तर 144 पर पहुंच गया है.

आमतौर पर हवा की शुद्धता एयर क्वालिटी इंडेक्स यानी एक्यूआई के जरिए नापी जाती है. पीएम-2.5 के साथ ओजोन, कॉर्बन मोनो-ऑक्साइड, सल्फर डाईऑक्साइड और नाइट्रोजन डाईऑक्साइड जैसे गैस की हवा में मौजूदगी के आधार पर तैयार किए गए सूचकांक से हवा की गुणवत्ता का अंदाजा लगया जाता है. इस पौमाने पर भी दिल्ली समेत उत्तर भारत की हवा लगातार खराब हो रही है.
शुक्रवार को दिन में 1 बजे दिल्ली में AQI का स्तर 200 था, जो बेहद खतरनाक स्तर है. लखनऊ (189) और पटना (166) में भी हवा दिल्ली जैसी जहरीली नहीं है लेकिन यहां भी विश्व स्वास्थय संगठन के निर्धारित मानक 25 से ज्यादा है.  

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उत्तर भारत में प्रदूषण के हालात

हालांकि इसमें सबसे खतरनाक पीएम-2.5 को माना जाता है. पीएम-2.5 की मात्रा वाहनों और पराली के अलावा हवा की गति और तापमान पर निर्भर करता है. ठंड के मौसम की शुरुआत के साथ पीएम-2.5 के महीन कण बाकी भारत के मुकाबले हिमालय से लगे मैदानी इलाको में पसरने लगते हैं. हवा में नमी ज्यादा होने से ये जमीन के करीब जमा हो जाते हैं जिससे सांस लेने में मुश्किल होती है. फेफड़ों में रक्त का संचार ठीक से नहीं होता है और कुछ लोगों को दिल का दौरा भी पड़ सकता है.

 

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