'सांसदों को संविधान ने दी है आजादी, नियमों से नहीं कुचल सकते', लोकसभा में बोले मनीष तिवारी

लोकसभा में स्पीकर ओम बिरला के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव पर बोलते हुए मनीष तिवारी ने कहा कि यह किसी व्यक्ति के खिलाफ लाया गया प्रस्ताव नहीं है. यह प्रस्ताव सदन की फंक्शनिंग को करेक्ट करने के लिए लाया गया है.

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कांग्रेस सांसद ने सदन में बताया अविश्वास प्रस्ताव की जरूरत क्यों पड़ी (Photo: Screengrab) कांग्रेस सांसद ने सदन में बताया अविश्वास प्रस्ताव की जरूरत क्यों पड़ी (Photo: Screengrab)

aajtak.in

  • नई दिल्ली,
  • 10 मार्च 2026,
  • अपडेटेड 8:03 PM IST

लोकसभा में स्पीकर ओम बिरला के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव पर चर्चा के दौरान चंडीगढ़ से कांग्रेस के सांसद मनीष तिवारी ने कहा कि एक लाइन में इसका सार यही है कि यह सदन जितना सरकार का है, उतना ही विपक्ष का भी है. उन्होंने कहा कि संविधान के निर्माताओं ने बहुत ध्यान से शब्द का उपयोग करते हुए अध्यक्ष और उपाध्यक्ष के चयन की बात की है, चुनाव की नहीं. रूल सात और आठ के तहत हमने उसे चुनाव में परिवर्तित कर दिया.

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मनीष तिवारी ने कहा कि संविधान निर्माताओं की मंशा थी कि स्पीकर और डिप्टी स्पीकर चयनित किए जाएं. सभी को एक ही तरीके से देखना, ये भी उसमें था. उन्होंने कहा कि धारा 94 पर संविधान सभा में बहस हुई, इस बात पर थी कि अगर किसी कारणवश से स्पीकर को अपना इस्तीफा देना पड़ा तो वह किसे देना चाहिए. कामत साहब एक प्रस्ताव लेकर आए थे कि राष्ट्रपति को देना चाहिए. उसे खारिज कर दिया गया. मनीष तिवारी ने कहा कि आपने छह वर्षों से डिप्टी स्पीकर का चयन ही नहीं किया है.

उन्होंने कहा कि संविधान के साथ खिलवाड़ होगा, तो इसका नकारात्मक असर संवैधानिक संस्थाओं पर पड़ेगा. संविधान ने स्पीकर-डिप्टी स्पीकर को कोई विशेष दर्जा नहीं दिया है. मनीष तिवारी ने कहा कि इसके विपरीत जो सांसद हैं, उन्हें धारा 105 के तहत संविधान ने बहुत विशेष दर्जा दिया गया है. उन्होंने कहा कि अगर सांसदों को संविधान सभा विशेष दर्जा नहीं देना चाहती थी, तो धारा 105 लाने की क्या जरूरत थी. रूल्स ऑफ प्रॉसीजर फ्रीडम ऑफ स्पीच को कम नहीं कर सकते.

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मनीष तिवारी ने कह कि नियमों का इस्तेमाल संविधान की ओर से सांसदों को मिली आजादी को कुचलने में आप नहीं कर सकते. उन्होंने कहा कि धारा 102 में है कि सांसद जो भी अपने मत का उपयोग करते हैं, उसकी कोई अदालत समीक्षा नहीं कर सकती. जो पत्रकार रिपोर्ट करते हैं कार्यवाही की, उसके खिलाफ कोई मानहानि का दावा नहीं हो सकता. कांग्रेस सांसद मनीष तिवारी ने कहा कि सांसदों को जो जरूरी लगता है देश के सामने रखना, उसे प्रमाणित करने की जरूरत नहीं है.

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उन्होंने कहा कि इसका सीधा मतलब है कि सदस्यों को बहुत विशेष दर्जा संविधान ने दिया है. उस विशेष दर्जे में मूलभूत बात है, वो ये है कि किसी भी सदस्य की फ्रीडम ऑफ स्पीच पर कोई रोक नहीं लगा सकता. उसके ऊपर आसन भी रोक नही लगा सकता. मनीष तिवारी ने कहा कि यह संवैधानिक स्थिति है. संविधान निर्माताओं ने संसद को यहां तक अधिकार दिया कि सदन की किसी भी कार्यवाही को कोई अदालत संज्ञान में नहीं ले सकती. उन्होंने कहा कि ये अधिकार संविधान ने न्यायपालिका को भी नहीं दिया. हम न्यायालय की कार्यवाही पर यहां बहस नहीं करते, यह कर्टसी है. संविधान में ऐसी कोई रोक नहीं है.

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नेता प्रतिपक्ष को रोकना फ्रीडम ऑफ स्पीच के खिलाफ 

मनीष तिवारी ने कहा कि राष्ट्रपति के अभिभाषण पर धन्यवाद प्रस्ताव पर बहस हो रही थी, तब नेता प्रतिपक्ष अपनी बात रखने के लिए खड़े हुए. उन्होंने कहा कि नेता प्रतिपक्ष ने एक मैग्जीन को कोट किया, जो पब्लिश्ड है और पब्लिक डोमेन में है. विपक्ष के नेता को वह पढ़ने नहीं दिया गया. यह किस तरह का लोकतंत्र है. मनीष तिवारी ने कहा कि नेता प्रतिपक्ष एक छपे हुए रसाले के आर्टिकल के अंश पढ़कर सुनाना चाह रहे थे. उस पर इतनी आपत्ति. यह फ्रीडम ऑफ एक्सप्रेशन की अवहेलना है.

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उन्होंने कहा कि नेता प्रतिपक्ष को एक दर्जा दिया गया है. इस सदन की परंपराएं देखी हैं, नेता प्रतिपक्ष जब इशारा भी कर देते थे, उनका माइक ऑन हो जाता था. मनीष तिवारी ने कहा कि सुषमा स्वराज नेता प्रतिपक्ष थीं, वह छोटा इशारा भी कर देती थीं, तब कोई रोकता नहीं था. सदन का कोई वरिष्ठ सदस्य बोलना चाहता था, पूरी आजादी दी जाती थी. उन्होंने कहा कि आडवाणी जी बोलना चाहते थे, मुझे याद है कि एक काम रोको प्रस्ताव पर उन्होंने बहस शुरू की और मैं जवाब दे रहा था. आडवाणी जी कुछ बोलने के लिए खड़े हुए, मैंने यील्ड किया.

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सत्तापक्ष-विपक्ष आमने सामने रहे, लेकिन भिड़ंत नहीं हुई

मनीष तिवारी ने कहा कि आज कोई बात कहे और वह सरकार के अनुकूल न हो, तो माइक बंद कर दिया जाता है. ये किस तरह की परंपरा डाली जा रही है. उन्होंने कहा कि इस सदन में कई बार बहुत तनाव रहा. सत्ता पक्ष और विपक्ष कई बार एक-दूसरे के सामने रहे, लेकिन कभी ऐसा नहीं हुआ कि भिड़ंत हो गई हो. यह कहना कि महिला सदस्य प्रधानमंत्री पर हमला करना चाहती थीं, चेयर को माफी मांगनी चाहिए. मनीष तिवारी ने कहा कि यहां बहुत चर्चा हुई कि सदन को बाधित किया जाता है. 15वीं लोकसभा में राज्यसभा के नेता प्रतिपक्ष अरुण जेटली ने कहा था कि डिसरप्शन पार्लियामेंट्री प्रैक्टिस है.

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उन्होंने कहा कि हर रोज हंगामा होता था और एक बार शीतकालीन सत्र पूरी तरह धुल गया था. एक रिपोर्ट आई थी, जिसे संसदीय समिति ने खारिज कर दिया था. पूरा शीतकालीन सत्र धुल गया, लेकिन एक सांसद को सस्पेंड नहीं किया गया. मनीष तिवारी ने कहा कि अगस्त 2012, मॉनसून सेशन पूरी तरह धुल गया और एक भी दिन काम नहीं हुआ. एक भी सांसद को निलंबित नहीं किया गया. ये इस सदन की परंपरा रही है. इस पर पीठासीन दिलीप सैकिया ने कहा कि सभा की ओर से प्रस्ताव आया, उसे पारित किया. तब मैं चेयर पर था.

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यह प्रस्ताव किसी व्यक्ति के खिलाफ नहीं, फंक्शनिंग के लिए

मनीष तिवारी ने इस पर कहा कि प्रस्ताव सभा की ओर से नहीं आता, ट्रेजरी बेंच से आता है. उन्होंने कहा कि सदन में जब कुछ अराजक तत्व घुस आए, हमने सरकार से स्टेटमेंट मांगा था कि इतना बड़ा सिक्योरिटी ब्रीच कैसे हो गया. सारे विपक्षी सांसदों को उठाकर बाहर फेंक दिया गया. हमारी पीड़ा क्या है. मनीष तिवारी ने कहा कि जो पहली लोकसभा थी, वह 135 दिन चली थी. 17वीं लोकसभा केवल 55 दिन चली. यह प्रस्ताव किसी व्यक्ति के खिलाफ नहीं है, यह हाउस की इंस्टीट्यूशनल फंक्शनिंग को करेक्ट करने के लिए है.

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