बीजेपी में विलय को NO... तो क्या इसलिए कट गया उपेंद्र कुशवाहा के बेटे का टिकट?

बीजेपी के कुछ नेताओं का यह भी तर्क है कि बिहार में सम्राट चौधरी के नेतृत्व में कुशवाह समुदाय को पहले ही मजबूत राजनीतिक प्रतिनिधित्व मिल चुका है. ऐसे में अलग से उपेंद्र कुशवाह को अतिरिक्त राजनीतिक हिस्सेदारी देने की जरूरत नहीं है.

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बिहार की राजनीति में हलचल मची हुई है. (Photo: PTI( बिहार की राजनीति में हलचल मची हुई है. (Photo: PTI(

हिमांशु मिश्रा

  • पटना,
  • 13 जून 2026,
  • अपडेटेड 12:35 PM IST

बिहार की राजनीति में एनडीए के भीतर एक नया सियासी संकेत देखने को मिला है. राष्ट्रीय लोक मोर्चा (RLM) के अध्यक्ष और राज्यसभा सांसद उपेंद्र कुशवाह के बेटे और बिहार सरकार में मंत्री दीपक प्रकाश को विधान परिषद नहीं भेजे जाने को बीजेपी का कड़ा राजनीतिक संदेश माना जा रहा है.

दीपक प्रकाश फिलहाल बिहार सरकार में मंत्री हैं लेकिन वे विधानसभा या विधान परिषद किसी भी सदन के सदस्य नहीं हैं. ऐसे में उनके मंत्री पद के भविष्य को लेकर सवाल उठने लगे हैं. हालांकि बीजेपी के सूत्रों का कहना है कि संवैधानिक प्रावधानों के तहत कोई भी व्यक्ति बिना किसी सदन का सदस्य बने छह महीने तक मंत्री रह सकता है.

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सूत्रों के मुताबिक, बीजेपी लंबे समय से राष्ट्रीय लोक मोर्चा के बीजेपी में विलय की पक्षधर रही है. बताया जाता है कि पार्टी ने उपेंद्र कुशवाह को अपनी पार्टी का विलय करने का सुझाव दिया था लेकिन उन्होंने इससे इनकार कर दिया. इसके बाद बीजेपी की ओर से यह प्रस्ताव भी दिया गया कि दीपक प्रकाश को बीजेपी के टिकट पर विधान परिषद भेजा जा सकता है, लेकिन कुशवाह इसके लिए भी तैयार नहीं हुए क्योंकि इससे उनके बेटे का बीजेपी सदस्य बनना तय था.

राजनीतिक हलकों में चर्चा है कि उपेंद्र कुशवाह अपनी पार्टी की स्वतंत्र पहचान बनाए रखना चाहते हैं. वहीं, बीजेपी के भीतर एक वर्ग का मानना है कि केवल चार विधायकों वाली पार्टी को पहले ही पर्याप्त प्रतिनिधित्व मिल चुका है. विधानसभा चुनाव के बाद बीजेपी ने उपेंद्र कुशवाह को राज्यसभा भेजा था और अब कुछ नेताओं का तर्क है कि एक राज्यसभा सीट और एक विधान परिषद सीट दोनों देना उचित नहीं होगा.

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उपेंद्र कुशवाह की पार्टी के भीतर भी असंतोष की चर्चा है. विधानसभा चुनाव में पार्टी के चार विधायक जीते थे, जिनमें उनकी पत्नी भी शामिल हैं. बाद में बेटे दीपक प्रकाश को मंत्री बनाए जाने से अन्य विधायकों में नाराजगी बढ़ने की बात कही जा रही है. विरोधी इसे परिवारवाद का उदाहरण बताकर सवाल उठा रहे हैं.

बीजेपी के कुछ नेताओं का यह भी तर्क है कि बिहार में सम्राट चौधरी के नेतृत्व में कुशवाह समुदाय को पहले ही मजबूत राजनीतिक प्रतिनिधित्व मिल चुका है. ऐसे में अलग से उपेंद्र कुशवाह को अतिरिक्त राजनीतिक हिस्सेदारी देने की जरूरत नहीं है.

हालांकि उपेंद्र कुशवाह अपने पुराने समझौते का हवाला दे रहे हैं. विधानसभा चुनाव से पहले हुए सीट बंटवारे में राष्ट्रीय लोक मोर्चा को छह सीटें और बीजेपी के हिस्से से विधान परिषद की एक सीट देने की बात तय हुई थी. कुशवाह इसी समझौते को याद दिला रहे हैं.

अब नजर इस बात पर है कि दीपक प्रकाश मंत्री पद पर कितने समय तक बने रह पाते हैं. राजनीतिक गलियारों में यह भी चर्चा है कि अगले साल राज्यपाल कोटे से होने वाले विधान परिषद के मनोनयन में उनका नाम शामिल हो सकता है लेकिन तब तक उनके मंत्री पद का क्या होगा, यह सवाल बना हुआ है.

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फिलहाल, बेटे को विधान परिषद न भेजने के फैसले को एनडीए के भीतर उपेंद्र कुशवाह के लिए एक स्पष्ट राजनीतिक संदेश के तौर पर देखा जा रहा है.

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