पांच दिन में ही अंतर्धान हो गए बाबा बर्फानी! दर्शन के लिए कतार में 3 लाख यात्री

अमरनाथ गुफा में प्राकृतिक रूप से बनने वाला पवित्र हिम शिवलिंग केवल 4 दिनों में 90% से अधिक पिघल गया है, जबकि यात्रा 57 दिनों तक चलनी थी. इसके पीछे क्या कारण हैं?

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अमरनाथ गुफा में पवित्र शिवलिंग 90 फीसदी तक पिघल गया है अमरनाथ गुफा में पवित्र शिवलिंग 90 फीसदी तक पिघल गया है

aajtak.in

  • नई दिल्ली,
  • 07 जुलाई 2026,
  • अपडेटेड 11:17 PM IST

अमरनाथ गुफा में प्राकृतिक रूप से बनने वाला पवित्र हिम शिवलिंग सिर्फ 4 दिनों में ही पिघल गया है. ये यात्रा कुल 57 दिनों तक चलनी थी, लेकिन अभी सिर्फ 4 दिन ही बीते हैं कि इतनें में खबर आई है कि अमरनाथ गुफा के पवित्र शिवलिंग का आकार बेहद कम रह गया है. बाबा बर्फानी का ये हिमलिंग अभी से ही 90 प्रतिशत से ज़्यादा पिघल गया.

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क्या है हिमलिंग पिघलने के कारण?

इसके पीछे कई कारण बताए जा रहे हैं. जैसे ज्यादा गर्मी, हिमालय क्षेत्र का तापमान बढ़ना, मौसम के पैटर्न में बदलाव होना और जलवायु परिवर्तन यानी क्लाइमेट चेंज. इन सारे कारणों के बीच एक बड़ा कारण और है. वह है प्रकृति की कीमत पर सुविधाओं और विकास का विस्तार करना. आज से एक दशक पहले तक अमरनाथ यात्रा आसान नहीं होती थी और यात्रा का मार्ग भी बहुत मुश्किल होता था, लेकिन इसके बाद सुविधाओं के नाम पर अमरनाथ यात्रा के मार्ग में विकास पहुंचने लगा.

गुफा मार्ग पर सुविधाएं बढ़ीं तो भीड़ भी बढ़ी

गुफा तक जाने वाले रास्तों को चौड़ा किया गया. यात्रा के मार्ग में अस्थायी टेंट और दुकानों की संख्या बढ़ाई गई और जो लंगर व्यवस्था चलती है, वो गुफा के नजदीक तक पहुंच गई. ये विकास यहीं नहीं रुका. हाल ही में अमरनाथ यात्रा के लिए रोपवे प्रोजेक्ट को मंजूरी दी गई और इसी के साथ शेषनाग और पंजतरणी के बीच सुरंग बनाने पर भी चर्चा हो रही है. ये वो विकास है, जो अमरनाथ यात्रा के दौरान श्रद्धालुओं को बेहतर सुविधाएं तो दिला सकता है.

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क्यों प्रभावित हो रही है पहाड़ों की 'प्रकृति'

लेकिन एक बार सोचकर देखिए कि अगर इस 'विकास' के कारण अमरनाथ गुफा के आसपास की प्रकृति प्रभावित होती है और उसके कारण गुफा में बनने वाला शिवलिंग 4 दिन में ही पिघल जाता है तो ऐसे विकास का क्या फायदा होगा. सिर्फ 9 दिन पहले 29 जून को जब अमरनाथ गुफा में प्रथम पूजा हुई थी, तब पवित्र बर्फ से बने शिवलिंग का आकार 12 फीट था. उस वक्त इस प्रथम पूजा में जम्मू कश्मीर के उप-राज्यपाल मनोज सिन्हा शामिल हुए थे और इसके 4 दिन बाद 3 जुलाई से अमरनाथ यात्रा की शुरुआत हुई थी. 

3 जुलाई से ही सिमटने लगा था आकार

जो पहला जत्था 3 जुलाई को अमरनाथ गुफा में पहुंचा, उसका कहना है कि पवित्र शिवलिंग का आकार उसी दिन पिघलकर सिमटने लगा था, लेकिन 6 जुलाई को स्थिति और गंभीर हुई. और यही 'शिवलिंग' 90 प्रतिशत से ज्यादा पिघलकर सिर्फ 1 फीट से भी कम का रह गया और ऐसा नहीं है कि ये पहली बार हुआ.

साल 2018 में यही पवित्र शिवलिंग यात्रा के सिर्फ 29 दिनों में पिघल गया था. 2020 में जब कोविड आया, तब भी ये 38 दिनों में पिघल गया था. 2022 में 28 दिनों में पिघल गया था और साल 2024 में सिर्फ 1 हफ्ते में पिघल गया था. इस बार भी ऐसा लगता है कि ये शिवलिंग 1 हफ्ते में पूरी तरह पिघल जाएगा और इसका बड़ा कारण है अमरनाथ गुफा में बढ़ती श्रद्धालुओं की संख्या और उनके लिए बढ़ती सुविधाएं.

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बढ़ती जा रही है अमरनाथ यात्रियों की संख्या

आज से दो दशक पहले तक ज्यादा से ज्यादा 1 लाख श्रद्धालु ही बाबा बर्फानी के दर्शन कर पाते थे. लेकिन जैसे-जैसे सुविधाएं बढ़ने से यात्रा आसान हुई, वैसे-वैसे श्रद्धालुओं की भीड़ बढ़ने लगी. साल 2003 में 1 लाख 70 हजार लोग अमरनाथ यात्रा पर पहुंचे थे, लेकिन 2011 और 2012 में यही आंकड़ा 6 लाख से ज्यादा पहुंच गया. 

साल 2016 में जब आतंकवादी बुरहान वानी मारा गया, तब श्रद्धालुओं की संख्या ढाई लाख से कम हो गई, लेकिन साल 2022 के बाद से इसमें फिर बढ़ोतरी हुई और पिछले साल 4 लाख 10 हजार लोगों ने अमरनाथ यात्रा की थी.

कभी 22 फीट तक होता था शिवलिंग का आकार

बड़ी बात ये है कि पहले जब कम श्रद्धालु आते थे, तब शिवलिंग का आकार 18 से 22 फीट होता था, लेकिन अब ये शिवलिंग अधिकतम 12 फीट का होता है और ये भी समय से पहले पिघल जाता है. इसका बड़ा कारण यही है कि लगभग 18 हजार फीट की ऊंचाई पर जहां अमरनाथ गुफा मौजूद है, वहां तापमान तेजी से बढ़ रहा है. ऐसा जलवायु परिवर्तन और ग्लोबल वॉर्मिंग के कारण भी हो रहा है और ऐसा लोगों की भीड़ बढ़ने से भी हो रहा है.

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आज से दो दशक पहले तक अमरनाथ यात्रा का रास्ता पूरी तरह प्राकृतिक होता था. वहां मिट्टी और चट्टान के रास्ते होते थे और लोगों के लिए इतनी ऊंचाई पर अमरनाथ गुफा तक पहुंचना आसान नहीं होता था, लेकिन बाद में धीरे धीरे सबकुछ बदलने लगा. उदाहरण के लिए पंचतरणी से गुफा तक का रास्ता पत्थरों वाला और ग्लेशियर के पानी के साथ बहने वाला प्राकृतिक रास्ता था.

लेकिन अब इसी रास्ते में सोलर स्ट्रीट वाली लाइटें, विश्राम स्थल, बिजली की लाइनें, JCB जैसी मशीनें और पहाड़ काटकर रास्ता चौड़ा करने का काम हुआ है, जिसके कारण इस जगह की प्रकृति में कई बदलाव आए हैं. इन बदलावों का असर ये है कि जहां पहले आसपास के सभी पहाड़ बर्फ से लदे होते थे, वही पहाड़ आज मिट्टी से भरे और सूखे नजर आने लगे हैं.

ऐसा इसलिए हुआ है क्योंकि इस इलाके की प्रकृति तेजी से बदल रही है और यहां इंसानों की भीड़ बढ़ने से स्थिति ये है कि लोग बिना गर्म कपड़ों के भी अमरनाथ गुफा तक पहुंच पा रहे हैं.

सुविधाजनक हुआ रास्ता

10 साल पहले जब लोग अमरनाथ यात्रा पर जाते थे तो उन्हें थर्मल कपड़े, फुल स्लीव जैकेट, भारी जूते, टोपी और दस्ताने पहनने पड़ते थे. और ये इसलिए भी जरूरी होता था क्योंकि ये पूरा इलाका बर्फ से ढका रहता था, लेकिन अब जब इस इलाके में ज्यादा ठंड नहीं बची है तो लोग बिना गर्म कपड़ों के भी यात्रा करते हुए दिख रहे हैं.

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महागुणस टॉप पर भी बढ़ा तापमान

यही नहीं जिस महागुणस पर्वत को लेकर ये मान्यता है कि भगवान शिव ने अपने पुत्र गणेशजी को यहीं छोड़ा था, वो महागुणस टॉप भी पहले बर्फ से ढका रहता था, लेकिन अब वहां का औसत तापमान भी बढ़ गया है. ये हिमालय क्षेत्र में हो रहा है, जिसके कारण अमरनाथ गुफा के आसपास के 10 ग्लेशियर भी पिघलने लगे हैं.

सरल भाषा में कहें तो जिस तरह फ्रीज में जमी बर्फ को बाहर रखने पर वो पिघलने लगती है, ठीक उसी तरह से बर्फ के विशाल ग्लेशियर भी ज्यादा गर्मी और तापमान के कारण पिघलने लगते हैं. अभी अमरनाथ में यही हो रहा है. 

अमरनाथ गुफा के हिमलिंग में हो रहा ये बदलाव सोचने पर मजबूर कर रहा है. अगर आज ये हिमलिंग एक हफ्ते में पिघल रहा है तो भविष्य में ग्लोबल वॉर्मिंग के कारण हो सकता है कि ये शिवलिंग बने ही नहीं... 

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