महाराष्ट्र की राज्यसभा सीट को लेकर चल रही सियासी चर्चा के बीच आखिरकार एनसीपी (अजित पवार गुट) ने नया दांव खेला है. पार्टी ने वरिष्ठ नेता छगन भुजबल के नाम पर सहमति नहीं बनने के बाद राजेंद्र जैन को राज्यसभा उपचुनाव के लिए उम्मीदवार बना दिया है. खास बात यह है कि पहले पार्टी भुजबल को दिल्ली भेजना चाहती थी, लेकिन उनकी एक शर्त पूरे मामले में अड़चन बन गई. ऐसे में अब राजेंद्र जैन के नाम पर मुहर लगना महाराष्ट्र की राजनीति में नई चर्चा का विषय बन गया है.
राज्यसभा की यह सीट सुनेत्रा पवार के इस्तीफे के बाद खाली हुई थी. सुनेत्रा पवार ने महाराष्ट्र की राज्य राजनीति पर ज्यादा फोकस करने के लिए पद छोड़ा था. इसके बाद पार्टी नए चेहरे की तलाश में जुट गई थी. सबसे पहले चर्चा छगन भुजबल के नाम की चली. पार्टी चाहती थी कि अनुभवी नेता होने के नाते भुजबल को राज्यसभा भेजा जाए.
भतीजे को मंत्री बनाने की शर्त पर अड़े थे भुजबल
हालांकि मामला तब अटक गया, जब भुजबल ने अपने भतीजे समीर भुजबल को महाराष्ट्र कैबिनेट में जगह देने की शर्त रख दी. सुत्रों के मुताबिक, मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस इस मांग को लेकर दिल्ली तक पहुंचे, लेकिन केंद्रीय नेतृत्व ने इसे मंजूरी नहीं दी. कहा गया कि सिर्फ एक व्यक्ति के लिए कैबिनेट विस्तार नहीं किया जा सकता. इसके बाद भुजबल ने राज्यसभा जाने से इनकार कर दिया और मंत्री पद छोड़ने की इच्छा भी नहीं जताई.
इसके बाद भुजबल ने खुलकर अपनी नाराजगी भी जाहिर की. उन्होंने कहा कि यह कहना सही नहीं होगा कि बीजेपी ने उनके प्रस्ताव को खारिज कर दिया. पार्टी को फैसला लेने के लिए और समय चाहिए था. उन्होंने यह भी कहा कि वह पार्टी के संस्थापक सदस्यों में रहे हैं और लंबे समय तक शरद पवार के साथ काम किया है, फिर उनके साथ अलग व्यवहार क्यों किया जा रहा है. हालांकि,
भुजबल ने बिना नाम लिए पार्टी के कुछ नेताओं पर भी निशाना साधा. उन्होंने कहा कि कई नेताओं के बच्चे सरकार में मंत्री हैं और केंद्र में भी जिम्मेदारी संभाल रहे हैं, फिर उनके मामले में अलग रवैया क्यों अपनाया गया. अपनी बात खत्म करते हुए भुजबल ने कहा, 'मैं कबड्डी का खिलाड़ी हूं, शतरंज का नहीं'.
भुजबल के पीछे हटने के बाद अमरावती की पूर्व सांसद नवनीत राणा को लेकर भी सियासी कयास लगाए जा रहे थे. हाल ही में सुनेत्रा पवार से उनकी मुलाकात के बाद इन चर्चाओं को हवा मिली थी. हालांकि, पार्टी के भीतर ही उनके नाम को लेकर भारी विरोध शुरू हो गया, जिसके बाद लीडरशिप ने उस विचार को तुरंत ठंडे बस्ते में डाल दिया. आखिर में पार्टी ने राजेंद्र जैन पर भरोसा जताया. जैन भंडारा-गोंदिया क्षेत्र से दो बार विधान परिषद सदस्य रह चुके हैं और करीब दो दशक से पार्टी संगठन में सक्रिय हैं. उन्होंने शीर्ष नेताओं की मौजूदगी में अपना नामांकन भी दाखिल कर दिया.
राजनीतिक गलियारों में इसे प्रफुल्ल पटेल की बड़ी जीत के तौर पर देखा जा रहा है. राजेंद्र जैन को प्रफुल्ल का करीबी माना जाता है और लंबे समय से वह विदर्भ क्षेत्र में उनके राजनीतिक कामकाज को संभालते रहे हैं. ऐसे में पार्टी के इस फैसले ने एक बार फिर यह संकेत दिया है कि एनसीपी के भीतर प्रफुल्ल पटेल की पकड़ अब भी मजबूत बनी हुई है.
ऋत्विक भालेकर