दिल्ली हाई कोर्ट ने सोमवार को सभी वीडियो हटाने के आदेश जारी किए है. अदालत ने दिल्ली के एक डॉक्टर और फिल्ममेकर के खिलाफ कोर्ट की अवमानना का नोटिस जारी किया. इन वीडियो में सोशल मीडिया पर वीडियो पोस्ट किए गए थे, जिसमें एक मौजूदा हाई कोर्ट जज पर साकेत बिल्डिंग के मालिक के खिलाफ अवैध कंस्ट्रक्शन की शिकायत खारिज करने का आरोप लगाया गया था.
साकेत की ये बिल्डिंग 30 मई को गिरी थी, जिसमें 6 लोगों की मौत हो गई थी और कई लोग घायल हो गए थे. हाई कोर्ट की जस्टिस नीना बंसल कृष्णा और जस्टिस मधु जैन की वेकेशन बेंच ने दिल्ली हाई कोर्ट बार एसोसिएशन (DHCBA) की अर्जी पर ये आदेश जारी किए.
गूगल, यूट्यूब, मेटा, लिंक्डइन, ट्विटर और दूसरे सोशल मीडिया इंटरमीडियरी को निर्देश देते हुए, HC बेंच ने ये भी सवाल किया कि ऐसे 'बेतुके और भड़काऊ वीडियो' अपलोड करने की इजाजत क्यों दी गई.'
अदालत ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स पर उठाए सवाल
कोर्ट ने पूछा, 'हो क्या रहा है कि मीडिया पूरी तरह से पावरफुल हो गया है, लेकिन इन प्लेटफॉर्म पर भी जिम्मेदारी है. जब आपको ऐसे बेतुके वीडियो के बारे में पता चलता है तो आप खुद से उन्हें हटा क्यों नहीं देते? एक बार जब ये आपके ध्यान में आ जाए. क्या कोई रोक है? क्या इंटरमीडियरी के पास उन्हें हटाने की कोई पावर या जिम्मेदारी नहीं है?'
कोर्ट के सामने पेश हुए DHCBA के प्रेसिडेंट, सीनियर एडवोकेट हरिहरन ने काकर के अपलोड किए गए वीडियो की ट्रांसक्रिप्ट से हमारे हिस्से पढ़े. इसमें उन्होंने MCD के उस एफिडेविट को मंजूर करने के लिए हाई कोर्ट को दोषी ठहराया है जिसमें दावा किया गया था कि वहां कोई गैर-कानूनी कंस्ट्रक्शन नहीं चल रहा था.
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क्या है पूरा मामला?
30 मई को साकेत में जो बिल्डिंग गिरी थी, उसमें कथित तौर पर गैर-कानूनी एक्सटेंशन किया जा रहा था. इसमें मालिक ने कथित तौर पर पहले से ही गैर-कानूनी बिल्डिंग में दो और फ्लोर बनवाए थे. स्थानीय लोगों ने आरोप लगाया था कि गैर-कानूनी कंस्ट्रक्शन की शिकायत पुलिस और हाई कोर्ट में की गई थी.
हाई कोर्ट की सुनवाई के दौरान, MCD ने एक एफिडेविट फाइल किया कि साइट पर कोई गैर-कानूनी कंस्ट्रक्शन नहीं चल रहा था. कोर्ट ने इस बात को स्वीकार कर लिया और शिकायत खारिज कर दी.
हालांकि, वीडियो में काकर ने उस हाई कोर्ट जज का नाम लिया जिसने ऑर्डर पास किया था और उन्हें '6 नौजवानों की हत्या' के लिए दोषी ठहराया. वीडियो में ज्यूडिशियरी और MCD के बीच मिलीभगत और भ्रष्टाचार के आरोप भी लगाए गए और दावा किया गया कि जज ने रिश्वत ली थी और MCD के वकीलों के बहकावे में थे.
DHCBA ने सीनियर एडवोकेट हरिहरन के जरिए दलील दी कि 30 मई को भयानक बिल्डिंग गिरने के बाद, 2 जून को कपिल कक्कड़ ने एक वीडियो अपलोड किया, जिसमें पुलिस, MCD और हाई कोर्ट के जजों को '6 नौजवानों की हत्या के पीछे का अपराधी' बताया गया. वो बार-बार हाई कोर्ट के जज को गैर-कानूनी कंस्ट्रक्शन चलने देने के लिए 'हत्यारा' कहता है. ये पूरी तरह से बेइज्जती है.
सीरीज को प्रमोट करने के लिए रचा षडयंत्र
बार एसोसिएशन ने ये भी दलील दी कि ऐसे कई वीडियो अलग-अलग सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर अपलोड किए गए हैं और उनका मकसद उनकी अपनी फिल्म सीरीज को पब्लिसाइज करना था. हरिहरन ने कहा, 'इन वीडियो का इस्तेमाल उनकी अपनी फिल्म सीरीज ब्लैक जस्टिस को प्रमोट करने के लिए किया जा रहा है, जो YouTube पर है. उनका सोशल मीडिया मूवी लिंक हर वीडियो के साथ एम्बेड किया गया है.'
बार की ओर से पेश सीनियर एडवोकेट राकेश टिकू ने भी दलील दी कि कोर्ट को ऐसे वीडियो को तुरंत हटाने के लिए कुछ गाइडलाइंस तय करनी चाहिए. टिकू ने दलील दी, 'वीडियो अपलोड करने से पहले किसी तरह की प्री-सेंसरशिप होनी चाहिए.'
गूगल, मेटा और दूसरे प्लेटफॉर्म्स के वकीलों ने कोर्ट को बताया कि URLs शेयर होने और कोर्ट का ऑर्डर पास होने के बाद वो वीडियो हटा देंगे और हैंडल्स को तुरंत ब्लॉक कर देंगे. मेटा के वकील ने कहा, 'अगर हम खुद से ऐसा करते हैं तो हमें नोटिस जारी करने और फिर ब्लॉक करने के प्रोसेस से गुजरना होगा. लेकिन अगर कोर्ट का ऑर्डर है तो हम तुरंत टेकडाउन कर सकते हैं.'
'कोर्ट को बदनाम करने के लिए साजिश...'
कोर्ट ने फिलहाल सभी सोशल मीडिया इंटरमीडियरीज को आपत्तिजनक वीडियो हटाने और कपिल कक्कड़ के सोशल मीडिया हैंडल को ब्लॉक करने का निर्देश दिया है. बेंच ने ये भी कहा, 'हमें ये मानना होगा कि पब्लिक मेमोरी बहुत कम होती है. ये कोई असली मामला नहीं है. ये आरोप सिर्फ कोर्ट को बदनाम करने के लिए लगाया जा रहा है, हम बस उम्मीद करते हैं कि पब्लिक इस वीडियो पर भरोसा नहीं करेगी.'
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सरकार की ओर से पेश ASG चेतन शर्मा ने कोर्ट को ये भी बताया कि IT इंटरमीडियरी रूल्स के मुताबिक सोशल मीडिया इंटरमीडियरीज को फ्लैग किए गए वीडियो को 2 घंटे के अंदर हटाना होता है और इंटरमीडियरीज को खुद से वीडियो हटाने की इजाजत देने पर विचार-विमर्श चल रहा है.
अनीषा माथुर