जब आम आदमी पार्टी के दो-तिहाई राज्यसभा सांसदों ने अपने विधायी दल का बीजेपी में विलय करने की घोषणा की, तो ये उनकी पार्टी के शीर्ष नेतृत्व के लिए कोई चौंकाने वाली खबर नहीं थी. बल्कि वो पहले से ही इस झटके के लिए तैयार थे.
लेकिन उस लिस्ट में एक नाम- संदीप पाठक का था जो सबसे अलग था. पाठक के भगवा पार्टी में शामिल होने पर अपनी भावनाओं को व्यक्त करते हुए, 'आप' के एक वरिष्ठ नेता ने मुझे बताया, 'मैंने अपने सपने में भी कभी नहीं सोचा था कि संदीप AAP का साथ छोड़ सकते हैं. बीजेपी में शामिल होना तो दूर की बात है.'
पाठक 'आप' के भीतर बीजेपी के खिलाफ सबसे मुखर आवाजों में से एक रहे हैं. स्वभाव से पर्दे के पीछे रहकर काम करने वाले पाठक ने 2022 से एक सख्त संगठनात्मक व्यक्ति के रूप में अपनी पहचान बनाई थी.
संदीप पाठक सिर्फ और सिर्फ राजनीतिक रणनीति जानते थे, और जब चुनावी योजनाओं को हकीकत में बदलने की बात आती थी, तो वो बेहद कठोर हो जाते थे. वो आंकड़ों, सर्वेक्षणों और क्रियान्वयन के माहिर खिलाड़ी थे. वो कभी केजरीवाल के 'चाणक्य' या 'आप' के अपने 'अमित शाह' थे.
संगठन के सबसे भरोसेमंद व्यक्ति रहे पाठक
2025 की शुरुआत तक, 'आप' में पाठक का बोलबाला था. आबकारी नीति मामले के कारण 'आप' प्रमुख की गैर-मौजूदगी में, वो संगठन के सबसे भरोसेमंद व्यक्ति की भूमिका निभा रहे थे और हरियाणा के लिए कांग्रेस के साथ सख्त मोलभाव जैसे मुद्दों को संभाल रहे थे. लेकिन 2025 ने उन्हें 'आप' प्रमुख और पार्टी की रणनीति से दूर कर दिया. ये एक ऐसा झटका था जिससे वो उबर नहीं पाए.
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राघव चड्ढा का विद्रोह और उनका बीजेपी में शामिल होना दीवार पर लिखी इबारत की तरह साफ था. 'आप' को करीब से ट्रैक करने वाले व्यक्ति के रूप में, मेरा मानना था कि चड्ढा प्रकरण का अगला चैप्टर अगस्त 2026 में होगा. लेकिन ये सौदा तय हुआ और अप्रैल की एक तपती दोपहर में इस 'विलय' को अंजाम दिया गया, जब लोगों को दिल्ली में इस 'खेला' की कम ही उम्मीद थी.
पीएम मोदी ने अभी पश्चिम बंगाल के पनिहाटी में अपनी रैली समाप्त की थी और दिल्ली में पंजाब में बीजेपी को मिलने वाली मजबूती की चर्चाएं शुरू हो गई थीं.
पिछले 24 घंटों में क्या हुआ
घटनाक्रम से वाकिफ सूत्रों ने मुझे बताया कि शुक्रवार दोपहर को बीजेपी में शामिल होने वाले सात 'आप' सांसदों में से एक ने 23 अप्रैल को 'आप' के एक शीर्ष नेता से मुलाकात की थी. चर्चा लंबी चली थी. स्रोत ने बताया, 'कुछ आप नेताओं के पाला बदलने की योजना की साफ आहट मिल रही थी. ये सांसद उस चर्चा का हिस्सा थे कि क्या हो सकता है.'
लेकिन 'आप' नेतृत्व को ये भनक तक नहीं थी कि ये सांसद खुद भी भगवा पार्टी में शामिल होने वाली सूची में शामिल थे. गौरतलब है कि 15 अप्रैल को अशोक मित्तल के ठिकानों पर ईडी (ED) ने छापेमारी की थी. 'आप' ने राघव चड्ढा पर इस छापेमारी के लिए बीजेपी नेतृत्व के साथ मिलकर साजिश रचने का आरोप लगाया था.
विक्रमजीत साहनी एक बिजनेसमैन हैं और उनके पाला बदलने से बहुतों को हैरानी नहीं हुई. खासकर मित्तल-ईडी प्रकरण के बाद. स्वाति मालीवाल 6 फ्लैगस्टाफ रोड पर हुए कथित थप्पड़ कांड के बाद से ही बागी तेवर अपनाए हुए थीं.
हरभजन सिंह ने नहीं उठाया फोन
हालांकि, चंडीगढ़ की ओर से एक विशिष्ट नेता के लिए स्थिति संभालने की कुछ कोशिशें की गई थीं. इन कोशिशों से वाकिफ सूत्रों ने बताया कि क्रिकेटर और 'आप' सांसद हरभजन सिंह से संपर्क करने की कई कोशिशें की गईं. लेकिन 'चंडीगढ़ से किए गए उन कॉल्स' का कोई जवाब नहीं मिला.
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पाठक का मामला 'आप' के भीतर कई लोगों को परेशान कर रहा है. हालांकि, 'आप' के एक वरिष्ठ नेता ने कहा, 'दिल्ली 2025 की जंग के दौरान उनकी रणनीतियों की पोल खुल गई थी. उन्हें बड़े-बड़े वादे करने और उन्हें पूरा न कर पाने की आदत थी. दिल्ली में तथाकथित संगठनात्मक विस्तार के उनके दावों की पोल तब खुली जब खुद आप प्रमुख ने उनसे कड़े सवाल पूछे थे.'
इस नेता ने ये भी कहा कि इन्हीं कारणों से दिल्ली की लड़ाई के दौरान उन्हें फैसले लेने की प्रक्रिया से दूर कर दिया गया था.
महीने भर में 'आप' ने खो दिए दिग्गज नेता
'आप' अब राज्यसभा में अपने मुख्य सचेतक (Chief Whip) एनडी गुप्ता के जरिए पाठक, चड्ढा और अशोक मित्तल के खिलाफ दल-बदल विरोधी कानून के तहत कार्रवाई करने की योजना बना रही है. क्या इसका कोई सकारात्मक परिणाम निकलेगा, ये साफ नहीं है, लेकिन जो तय है वो ये है कि 'आप' ने महज 30 दिनों के भीतर अपने राष्ट्रीय संगठन महासचिव, केजरीवाल के सबसे चहेते (Blue eyed boy) और राज्यसभा में उपनेता, सभी को खो दिया है.
अमित भारद्वाज