ठंड शुरू होते ही जवानों पर मंडराने लगा 'दोहरा खतरा', जवानों को हुआ मलेरिया

ठंड शुरू होते ही बढ़ा खतरनाक मच्छरों का प्रकोप, बस्तर में एनोफिलीज और वाइबेक्स मच्छरों ने ली है कई जवानों की जान. हाट बाजारों में साग-सब्जियों के साथ मच्छरों से बचाव की वस्तुओं की भी होने लगी है बिक्री.

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अस्पताल में भर्ती जवान अस्पताल में भर्ती जवान

कौशलेन्द्र बिक्रम सिंह / सुनील नामदेव

  • रायपुर,
  • 31 अक्टूबर 2017,
  • अपडेटेड 6:11 PM IST

छत्तीसगढ़ में पुलिस और केंद्रीय सुरक्षाबलों के जो जवान बस्तर में तैनात हैं उन पर इन दिनों नक्सलियों से ज्यादा उन मच्छरों का खतरा मंडरा रहा है जो उन्हें सीधे बिस्तर में सुला देते हैं. इनके डंक मारने से शुरू हुआ सामान्य बुखार तेजी से बढ़ता है और फिर मल्टिपल ऑर्गन फेल्योर को अंजाम देकर मरीज की जान तक ले लेता है. इससे बचने का सिर्फ एक ही उपाय है. जैसे ही बुखार आए तुरंत डॉक्टर की शरण में जाएं. वरना अंजाम खरनाक हो सकता है.

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ठंड के शुरूआती दौर अक्टूबर माह से लेकर फरवरी के आखिरी माह तक जंगल में दाखिल होने वाले पुलिस और केंद्रीय सुरक्षाबलों पर दोहरा खतरा मंडराता है. एक तो नक्सलियों से आमना-सामना और उनके द्वारा बिछाई गई बारूदी सुरंगों से बच निकलना. दूसरा जंगल के भीतर कदम बढ़ाते वक्त मच्छरों से अपनी सुरक्षा करना. बस्तर के जंगलों में लगभग आधा दर्जन किस्म के मच्छर हैं. यहां एक सेमी लंबे-चौड़े से लेकर एक इंच तक मच्छर हैं. इनमें से एनोफिलीज और बाइबेक्स मच्छर सबसे खतरनाक है. जबकि एडोनिक्स प्रजाति का मच्छर भी बीते कुछ वर्षों में तेजी से पनप रहा है. यह मच्छर डेंगू फैलाने में भी सहायक होता है. यदि किसी शख्स को इस मच्छर ने दिनभर में दो-तीन बार डंक मार दिया और उसे बुखार आया. इस दौरान आने वाले छह घंटे के भीतर उसे एंटीडोज नहीं मिला तो मरीज की जान तक चली जाती है.

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डॉक्टरों के मुताबिक इनका डंक इतना विषैला होता है कि शरीर का तापमान तेजी से बढ़ता है. अनियंत्रित बुखार मल्टीऑर्गन फेल्योर की स्थिति बना देता है. इससे ब्रेन, किडनी और लीवर प्रभावित होने से मरीज की मृत्यु हो जाती है.

बस्तर में अक्टूबर, नवंबर, दिसंबर, जनवरी और फरवरी माह सुरक्षाबलों पर भारी गुजरते हैं. इस माह की 28 तारीख तक से प्रभावित पुलिस और केंद्रीय सुरक्षाबलों के 206 जवानों का इलाज बस्तर के मेडिकल कॉलेज व दो सरकारी अस्पतालों में हुआ है. इसके अलावा और भी कई जवान हैं जिनका इलाज यूनिट में तैनात डॉक्टरों ने किया. इन जवानों को बैरक में ही आराम मिलने से उन्हें अस्पताल में दाखिल कराने की नौबत नहीं आई.

वरिष्ठ डॉक्टर संदीप दवे की मुताबिक फैलीसिफेलम और एडोनिक मच्छरों के शिकार ज्यादातर जवान उनके पास इलाज कराने के लिए आते हैं. डॉक्टर दवे बताते हैं कि ज्यादातर जवान सामान्य बुखार को गंभीरता से नहीं लेते. जब बुखार अचानक तेजी से बढ़ता है तब तक उन्हें अस्पताल में दाखिल कराने में अक्सर देरी हो जाती है. यहीं केस बिगड़ता है और मरीज की स्थिति मल्टीऑर्गन फेल्योर तक पहुंच जाती है.

फिलहाल पुलिस और केंद्रीय सुरक्षाबलों के अफसरों ने अपने जवानों को सतर्क कर दिया है. बैरकों के आस-पास साफ सफाई पर जोर दिया जा रहा है. कई तरह के भी डलवाए जा रहे हैं. दूसरी ओर हाट बाजारों में साग-सब्जियों के अलावा दुकानदार मच्छरों को शरीर से दूर रखने वाली क्रीम, लोशन, तेल और महकने वाली जड़ी-बूटियों को भी मुहैया करा रहे हैं. बस्तर के जंगलों में छोटे-छोटे हाट बाजार लगते हैं. स्थानीय लोग अपने खेत खलियानों और घरों में उपजने वाली सब्जियों को बेचते हैं. अधिक आमदनी हो इसके लिए अब ये छोटे व्यापारी साग-सब्जियों के साथ वस्तुएं भी बेचते नजर आते हैं.

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