नोटबंदी का सीधा असर सब्जी मंडियों पर, एक रुपये किलो में भी नहीं बिक रहा टमाटर

दरअसल, हरी साग-सब्जियों को कोल्ड स्टोरेज में रखना काफी महंगा पड़ता है. वहीं, खेत-खलियानों से थोक बाजार में पहुंचने और फिर चिल्लर बाजार में आने पर ये साग सब्जियां बासी हो जाती हैं और उनके सड़ने गलने का खतरा बढ़ जाता है. लिहाजा किसान तो किसान साग-सब्जी बेचने वाला भी इन्हें तत्काल ठिकाने लगाने के लिए बेहद कम दामों में बेच रहे हैं.

Advertisement
इस साल ज्यादा हुई सब्जियों की पैदावार इस साल ज्यादा हुई सब्जियों की पैदावार

अंजलि कर्मकार / सुनील नामदेव

  • रायपुर,
  • 16 दिसंबर 2016,
  • अपडेटेड 11:48 PM IST

छत्तीसगढ़ में नोटबंदी के बाद साग-सब्जियों के दामों में गिरावट आई है. हालत ये है कि कई इलाकों में टमाटर सड़कों में फेंके जा रहे हैं, क्योंकि इन्हें एक रुपये किलो में भी कोई नहीं खरीद रहा. यही हाल दूसरी साग सब्जियों का है. लिहाजा लागत मूल्य पर यह बेची जा रही हैं.

दरअसल, हरी साग-सब्जियों को में रखना काफी महंगा पड़ता है. वहीं, खेत-खलियानों से थोक बाजार में पहुंचने और फिर चिल्लर बाजार में आने पर ये साग सब्जियां बासी हो जाती हैं और उनके सड़ने गलने का खतरा बढ़ जाता है. लिहाजा किसान तो किसान साग -सब्जी बेचने वाला भी इन्हें तत्काल ठिकाने लगाने के लिए बेहद कम दामों में बेच रहे हैं.

Advertisement

छत्तीसगढ़ में के दाम आसमान से सीधे जमीन पर आ गिरे हैं. ये नजारा अंबिकापुर के लुंड्रा इलाके का है. इस इलाके में टमाटर की पैदावार जम कर होती है. नोटबंदी के चलते थोक बाजारों में साग-सब्जियों की आवक घटी है. इसकी मार टमाटर पर भी पड़ी है. किसानों का हाल ये है कि एक रुपये किलो में भी टमाटर नहीं बिक पा रहा है. दूसरी ओर इसे रखने के लिए ना उनके पास कोल्ड स्टोरेज हैं और ना ही और कोई सुविधा. नतीजतन किसानों ने टमाटर को सड़को में फेंकना शुरू कर दिया है.

यही हाल दूसरी साग-सब्जियों का है, लेकिन वो में बिक रही है. अंबिकापुर से लेकर रायपुर तक साग-सब्जी उत्पादक इलाकों का यही हाल है. बाजार में चिल्हर पैसों का टोटा हैं. लिहाजा लोगों ने साग-सब्जियों की खरीददारी कम कर दी है. इस बार सब्जियों की बम्पर पैदावार हुई है. इसके चलते साग-सब्जियों की आवक नहीं घट रही है.

Read more!
Advertisement

RECOMMENDED

Advertisement
Latest News in Hindi »